"कार्यवा साधयेयम; देह वा पातयेयम..!" या तो कार्य सिद्ध होगा या मृत्युका वरन ! प्रणवीर महाराणा प्रताप का यह भीषण प्रण आज भी याद रहता है ! कार्यरत रहने की प्रेरणा देता है! देश...पंथ...प्रान्त..भाषा...जैसे भेद भुलाकर ....नवसमाज के पुनरुथान के सदहेतु ....रचनात्मक कार्य के द्वारा नई दिशा देना हम हमारा कर्त्तव्य समझते है! हमारी यह धारणा है की,सुसंघटित और सुसंस्कृत समाज ही राष्ट्र की नवनिर्माण की गति को आगे बढाता है! हम गौरवशाली अतीत पे श्रद्धा रखते है......संघर्षमयी वर्त्तमान पर विश्वास करते है...और उज्वल भविष्य के बारे में आशा रखते है!
क्षत्रिय समाज के गौरवशाली इतिहास...संस्कृति...हमारी विरासत तथा साहित्य से हमें विशेष लगाव है ! राजपूत समाज के कई राष्ट्रीय समारोह, अंतर्राष्ट्रीय परिषद् तथा उपक्रमों भी में हमने हिस्सा लिया है! कलम की सहायता से विभिन्न पत्रिका में लेखन...सञ्चालन और संपादन का कार्य भी हम करते है! हमने भारत के कई राज्यों की यात्रा की है !---> जयपालसिंह विक्रमसिंह गिरासे { सिसोदिया }
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