"राष्ट्रगौरव महाराणा प्रतापसिंह -एक अपराजित योद्धा "

 

"राष्ट्रगौरव महाराणा प्रतापसिंह --एक अपराजित योद्धा''


लेखक : श्री जयपालसिंह गिरासे


प्रकाशक : नोशन प्रेस पब्लिकेशन, चेन्नई (तमिलनाडु)


भाषा : हिंदी


कुल  पृष्ठसंख्या  : ३३६


मूल्य : ३९९  /- (शिपिंग चार्जेस एक्स्ट्रा)


ISBN NO :  978-1-64919-951-5


(C) Jaypalsingh Girase


आप सभी को बताते हुए अत्यंत हर्ष का अनुभव हो रहा है की , श्री जयपालसिंह गिरासे  द्वारा हिंदी भाषा में लिखित 'राष्ट्रगौरव महाराणा प्रतापसिंह---एक अपराजित योद्धा !' यह ग्रन्थ पाठकों के लिए लम्बी प्रतीक्षा के बाद उपलब्ध  हो गया है।  

मुग़ल साम्राज्यवाद के खिलाफ अपनी प्रजा का  साथ लेकर जनयुद्ध खड़ा करनेवाले तथा विपरीत परिस्थितियों में भी कड़ा संघर्ष कर अपराजित रहते हुए मृतवत राष्ट्र में नवप्राणों का संचार कर जन -जन को मातृभूमि की स्वतंत्रता के लिए प्रेरित करनेवाले वीरशिरोमणि महाराणा प्रतापसिंह हर पीढ़ी में विश्व के सभी स्वाभिमानी और स्वतंत्रताप्रेमी नागरिकों के लिए  प्रात :स्मरणीय है।  

राष्ट्रकवि पं. रामसिंहजी  सोलंकी ने महाराणा प्रतापसिंहजी के गौरव का बखान करते हुए यह कहा था :--

"जात -धरम तज वरग मन; वृद्ध -शिशु-नर-नारिह।

जद -जद भारत जुंझसि,पाथल जय थारिह।।"

 - अर्थात: हे प्रताप, जब-जब भारत वर्ष पर विपदा की स्थिति आएगी तब -तब भारत वर्ष के आबाल-वृद्ध तथा नर-नारी अपने जाति -धर्म-पंथ-प्रान्त की संकुचित भावना से ऊपर उठकर केवल तुम्हारे नाम का जयजयकार करेगी !

-        'या तो कार्य सिद्ध होगा या मृत्यु का वरन किया जायेगा ' महाराणा प्रतापसिंह का यह भीषण प्रण उस काल के क्रांतिकारी स्वर्णिम इतिहास का गौरव लिखने के लिए कलम को सदैव प्रेरित करता है। राष्ट्र के सत्व-स्वत्व और स्वाभिमान की रक्षा के लिए भीषण कष्टों का सामना कर लगातार २५ साल तक साम्राज्यवादी शक्ति के साथ कड़ा संघर्ष करनेवाले राष्ट्रगौरव महाराणा प्रतापसिंह जी का चरित्र केवल भारत राष्ट्र के लिए ही नहीं अपितु समस्त संसार के स्वतंत्रता और स्वाधीनता प्रेमी नागरिकों के लिए आज भी स्फूर्ति का स्रोत है।

-       जब भारत की कई हिन्दू-मुस्लिम शासकों  ने साम्राज्यवादी मुघल सल्तनत के सामने अपनी सार्वभौमिकता खो दी थी तब उसी प्रतिकूल संक्रमणकाल के दौरान महाराणा प्रतापसिंह मेवाड़ की धरती पर प्रखर विरोध का केंद्र बने रहे तथा सिमित संसाधन होकर भी गुरिल्ला और छापामार युद्धतंत्र का अवलंब कर अपनी स्वतंत्रता और सार्वभौमिकता को कायम रखा। विश्व के इतिहास में यह अनोखा उदाहरण होगा जहाँ अपने राजा के साथ -साथ प्रजा ने भी वनवास तथा कष्टप्रद जीवन व्यतीत किया। स्वभूमि विध्वंस जैसे कठोर कदम उठाकर मुघल रणनीति को परास्त करनेवाली सामरिक रणनीति आज भी सामरिक शास्रों के अध्ययन कर्ता तथा संशोधकों का ध्यान आकृष्ट करती है।

-       

 महाराणा के इसी शौर्य से परिपूर्ण , कुशल रणनीतिकार और प्रजाहितैषी व्यक्तित्व को सुलभ भाषा के माध्यम से शब्दांकित करने का लेखक श्री जयपालसिंह गिरासे द्वारा प्रस्तुत ग्रन्थ में प्रयास किया गया है। श्री जयपालसिंहजी ने मेवाड़ धरा के हर एक स्थल पर प्रत्यक्ष जाकर प्रमाणों के साथ अध्ययन किया है।  मेवाड़ राजपरिवार तथा विभिन्न ठिकानेदार परिवारों से प्रत्यक्ष चर्चा कर उन्होंने सन्दर्भ जुटाए है।  मूल राजस्थानी लोकसाहित्य, विभिन्न ख्यात साहित्य, प्रशस्तियाँ , ऐतिहासिक दस्तावेज, शिलालेख, ताम्रपट्ट ,पट्टे -परवाने , दरबारी दस्तावेज , मुग़ल कालीन ग्रन्थ तथा समकालीन इतिहास से संबंधित हिंदी, अंग्रेजी , फ़ारसी तवारीखे , विभिन्न समीक्षा ग्रंथों, स्मरणिकाएँ , शोधप्रबंधों आदि  ग्रंथों का अध्ययन कर कालक्रम को सुगम और सुसंगत कर प्रस्तुत ग्रन्थ को लिखा गया है।  महाराणा प्रतापसिंह के जीवनकाल के बारे में कई प्रचलित किवदंतियों को टालकर एक राष्ट्रप्रेरक चरित्र को उजागर करने का लेखक ने प्रयास किया है।    प्रस्तुत ग्रन्थ के अंत में महाराणा प्रतापसिंह के जीवनक्रम , हल्दी घाटी युद्ध , सहयोगी साथी तथा परिवार के सदस्यों की विस्तृत जानकारी स्वतंत्र परिशिष्टों के रूप में दी गयी है।  आशा है यह ग्रन्थ पाठकों को निश्चित रूप से पसंद आएगा।

'मुग़ल-मेवाड़ संघर्ष' को 'साम्राज्यवाद के खिलाफ जनयुद्ध'  के रूप में वर्णित कर ग्रन्थ की रचना उत्तमोत्तम बनाने का प्रयास लेखक ने किया है।  अनगिनत संघर्षों के इतिहास की बखान करते समय संयत तथा मर्यादित भाषा का प्रयोग लेखक ने किया है। प्रताप  की युद्धकुशलता और सामरिक रणनीति का  अत्यंत सटीक- समर्पक भाषा में वर्णन तो किया ही है लेकिन साथ-साथ प्रताप की दूरदर्शिता , प्रजावत्सलता , सादगी , धर्मनिरपेक्षता, मानवतावादी दृष्टिकोण और प्रशासनिक गुण आदि पहलुओं पर भी सोदाहरण प्रकाश डाला है।

      प्रस्तुत ग्रन्थ का आमुख  मेवाड़ के लिए  शत्रु से लोहा लेकर प्राणोत्सर्ग करनेवाले वीर झाला मान के वंशज तथा महाराणा मेवाड़ परिवार के अत्यंत करीबी और विश्वसनीय व्यक्तित्व श्री प्रतापसिंह झाला (तलावदा , उदयपुर) ने लिखी है।  लगभग २९ पृष्ठों की व्यापक आमुख (प्रस्तावना) में गुहिल --बाप्पा रावल के काल से अर्थात मेवाड़ राज्य की स्थापना से लेकर महाराणा प्रतापसिंह के काल तक विभिन्न ऐतिहासिक घटनाओं का संक्षेप में परामर्श लेकर कई तथ्यों का सप्रमाण पुष्टिकरण किया है। 

      ग्रन्थ में ४३ स्वतंत्र प्रकरण है जिनमे ४ सूचि है। ग्रन्थ की आकर्षक छपाई , निर्दोष मुद्रण और अंतरंग की रचना आदि के लिए नोशन प्रेस की टीम ने अंतर्राष्ट्रीय मानकों का अवलंब किया है।  ग्रन्थ में कुल ३३६ पृष्ट है तथा साइज़ 5.5 x 8.5  की है।  ग्रन्थ के मुखपृष्ठ का प्रकार पेपरबैक है तथा ग्लॉस लैमिनेटेड है।   ग्रन्थ के अंदर के पृष्ट 70 GSM Seshai NS प्रकार के है।  

     राष्ट्र में स्वाधीनता तथा सार्वभौमिकता की प्रेरणा निरंतर जीवित रखनेवाले महाराणा प्रतापसिंह जैसे अपराजित योद्धा की संघर्षमयी कहानी पाठक जरूर पढ़े।  यह मेरा विशेष सुझाव है।

 


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