हमीरगढ़ की यादगार सफ़र.....!



         रोज की भाग-दौड़ की जिंदगी से कुछ पल या दिन अगर कही पसंदीदा जगह पर जाकर बिताने का सुनहरा अवसर मिलता हो तो ''ना'' कौन कहेगा..? लोग ''सफ़र'' के लिए जाते है.....सफ़र के मजे भी लेते है......तरीका और सोच अलग-अलग होती है ...हर सफ़र जिंदगी का एक यादगार लम्हा भी बन जाती है...! सफ़र हमें भी बेहद पसंद है और आज-तक की जिंदगी इस देश के विभिन्न जगहों पर घुमते ही बीती हुई है! लेकिन हर सफ़र का कही कोई ना कोई उद्देश जरुर रहा है! कोलेज के दिनों छात्र आन्दोलन से जुड़े रहने से ऐसे अवसर प्राप्त होते थे! अधिवेशन अगर प्रयाग में होता था तो उत्तर प्रदेश के कई धार्मिक,प्राकृतिक एवं ऐतिहासिक स्थल के जरुर दर्शन हो जाते थे! देश के विभिन्न कोने में जाने के कई सुनहरे अवसर हमें इस बहाने से भी मिले! कभी छुट्टी के दिनों किसी भी पसंदीदा स्थल की यात्रा का आयोजन हो जाता था! रेल के सफ़र का मजा कुछ और ही मिलता था! केवल पचीस साल की उम्र में ही भारत के चार धाम में से दो , सप्त नदिया ,बारह में से नौ ज्योतिर्लिंग के दर्शन , सात राज्य की सफ़र हम ने पूरी कर दी थी! इतिहास में विशेष रूचि होने से और संशोधन कार्य के बहाने राजस्थान और देश के अन्य प्रान्तों की ऐतिहासिक धरोहर का सफ़र करने का मौका कई बार मिला! संघटन के कार्य --विस्तार हेतु भी कई जगह हम आज-तक पहुच पाए!


      हमीरगढ़ की यात्रा भी बड़ी सुन्दर और चिर-स्मरणीय रहेगी! शब्दों में इसका वर्णन कर इस यात्रा के अनुभव एवं आनंद को सिमित नहीं किया जा सकता ! राव श्री युगप्रदिप सिंहजी हमीरगढ़ जी और श्री विनोद पंडित जी के निमंत्रण से हम ने हमीरगढ़ की यात्रा का कार्यक्रम बनाया! साथी कुंवर अतुलसिंह, कुंवर अमितसिंह,कुवर संदीपसिंह और कुंवर विश्वजीत सिंह भी इस यात्रा में हमारे साथ शरीक हुए! इंडिका गाड़ी से हमारी यात्रा शिरपुर से दोपहर ठीक बजे से शुरू हुई ....सेंधवा,धामनोद,धार,नागदा,रतलाम,नीमच,मंदसौर से गुजरते हुए ठीक रात के बजे हम वीरभूमि चित्तोड़ पहुचे....वहा पूर्व नियोजन के अनुसार हम सबने विश्राम किया! प्रात: वीरभूमि चित्तोडगढ की प्राचीर से उगते सूर्यनारायण जी का दर्शन कर हम ने ठिकाना हमीरगढ़ की और प्रस्थान किया! महाराज सा राव श्री जी के निर्देश के अनुसार आदरणीय श्री विनोद जी हाय-वे पर हमारी प्रतीक्षा कर रहे थे! उन्हें साथ लेकर हमारी गाड़ी हमीरगढ़ की और चल दी! सिसोदिया परिवार के रणबांकुरे ठाकुरों की इस पवित्र धरती को प्रणाम कर .....प्रात:स्मरणीय महाराणा प्रताप सिंहजी के तृतीय बंधू वीर श्री विरमदेव जी को कृतज्ञता की भावना से याद कर.....उन्ही के वंशजो की इस धरती को वंदन करने हम और हमारे साथी जा रहे थे.....मन में विलक्षण उल्हास और हर्ष की भावना पनप रही थी ......जैसे ही गाड़ी रफ़्तार से दौड़ रही थी हमारा मन इतिहास की गलियों में ;गौरवशाली विरासत की वादियों में खो रहा था! मध्ययुगीन काल का "भाखरौल'' ठिकाना जो महाराणा हमीर जी की याद में आज हमीरगढ़ नाम से जाना जाता है! हमीरगढ़ मेवाड़ के १६ उमराव और ३२ ठिकानों में से एक है! विरमदेव के वंशज होने से वे विरमदेवोत कहलाते है! वीर श्री विरमदेव जिन्होंने मुग़ल बादशाह अकबर के खिलाफ चल रहे स्वतंत्रता रणसंग्राम के कठिन समय में महाराणा के परिवार और वंशजो की रक्षा की थी! श्री विरमदेव जी के कंधोंपर यह जिम्मेदारी रख महाराणा शत्रु से दो हाथ कर रहे थे! विरमदेव जी के वही वंशज कई पीढ़ियों तक चित्तोड़ की किलेदारी भी निभाते रहे! सन १७६६ में भाखरौल की स्थापना हुई थी! सन १८२३ में इस कसबे का महाराणा हमीरसिंह ( द्वितीय ) के नाम से हमीरगढ़ रखा गया था ! राव धीरत सिंहजी हमीरगढ़ के संस्थापक थे! जिन्हें मेवाड़ राज्य में फासी की सजा देने का अधिकार; ८४ गावों की जागीरी(जो आखरी दौर में १२ गाव तक सिमित हो गयी थी) ; गढ़ चित्तोड़ की किलेदारी एवं क्षेत्र में सैनिकी तथा न्यायिक अधिकार बहाल किया गया था! हमीरगढ़ की जागीर में सेंकडो एकड़ जमीं अस्पताल;स्कुल;धर्मशाला,मकान;कचहरी बनाने .....खेती करने हेतु श्री राव सा ने दान में दी है! आज भी उनकी हवेलियों में दो स्कुल चल रही है! अपने निजी खर्चे से वे एक भव्य गोशाल भी बनवा रहे है! विद्वान्, गो-ब्राह्मन का सन्मान वहा नित्य होता आया है! इलाखे के कई मंदिरों को उन्होंने आश्रय भी दिया है!  वर्तमान में भी २५० प्लाट गरीब लोगों को मकान बनवाने दान में दिए गए है! आधा गाव तो उन्ही का ही है! उनके पिताश्री स्वर्गीय राव श्री मानसिंह जी ने किसी किसान को डेढ़ एकड़ जमीं दान में दे दी थी......आज राव सा को वही जमीं औद्योगिक कार्य के लिए जरुरी थी! वह किसान विनम्रता से अपनी ज़मीन लौटने को तैयार था....लेकिन अपने वचन पर अडिग रहते हुए राव साहब ने आज के बाजार भाव के अनुसार उचित मूल्य देकर वह ज़मीन फिर से स्वीकृत की! राव साहब के इस आचरण से फिर से एकबार वह महान क्षत्रिय परंपरा पुनरुज्जीवित हुई!


    आज वही गौरवशाली विरासत के रखवाले परिवार को ......श्री विरमदेव जी के वंशजो से मिलने हम जा रहे थे! जैसे ही गाव को प्रारंभ हुवा , हमारा ध्यान समाप्त हुवा और हम वास्तव में पहुंचे.....श्री विनोद जी हमें हमीरगढ़ गाव के बारे में बताते जा रहे थे.....हमारे साथी सुनते जा रहे थे....उनके हर एक शब्द को अपनी स्मृति में संरक्षित करते जा रहे थे! अब हमीरगढ़ के महलों के पास गाड़ी पहुच गयी .....प्राचीन ऐतिहासिक द्वार से हम ने अन्दर की और प्रवेश किया....महल के बाहर ही छोटे बन्ना श्री हर्षप्रदिप सिंहजी(राव श्री हमीरगढ़ जी के छोटे भाई) अपने साथियों के साथ हमारी प्रतीक्षा कर रहे थे! सुहास्य-वदन से फूलमालाए पहनाकर उन्होंने हम सबका स्वागत किया.....हमीरगढ़ ठिकाने की आतिथ्यशिलता का एक सुन्दर और शानदार दर्शन हुवा! दरिखाने में हमारी पहली बैठक हुयी.....जहा यात्रा के बारे में चर्चा हुई.....बाद में राव श्री युगप्रदिप सिंहजी का दरिखाने में आगमन हुवा..... राव श्री युग प्रदीप सिंहजी एक विलक्षण प्रभावशाली व्यक्तित्व है! पहली नजर में ही उन्हें देखकर हर कोई प्रभावित हो जाता है! ऊँचा कद, रोबदार मुछे, और किसी मल्ल की तरह शरीर...! जन्म नाम भरतसिंह था...लेकिन पिताश्री स्व.रावत मानसिंह जी के कहने पर उनका शुभ नाम युग प्रदीप सिंह रखा गया था!


    उनके साथ वार्तालाप एवं अल्पाहार का सौभाग्य प्राप्त हुवा! शिरपुर शहर एवं अन्य जगहों पर हुए विभिन्न समारोह/आन्दोलन/सामाजिक उपक्रम के बारे में उन्होंने बड़े रूचि के साथ चर्चा की! राष्ट्रीय आन्दोलन एवं संघटन की रुपरेखा के बारे में भी चर्चा हुई! राव साहब के साथ कई विषयों पर चर्चा हुई!


    राजपरिवार में जन्म लेकर.....इतनी बड़ी विरासत पाकर भी एक विलक्षण सादगी,विनयशीलता,विनम्रता की झलक हमें उनके व्यक्तित्व में मिल रही थी! इसी दौरान हमीरगढ़ ठिकानो में सम्मिलित विभिन्न गावों से वहा के ग्रामीण विवाह के निमंत्रण देने दरिखाने रहे थे ...स्वयं राव साहब उन ग्रामिनोंका विनय के साथ स्वागत कर रहे थे...उनका मुजरा ,नजराना और विवाह के निमंत्रण का स्वीकार कर रहे थे.....उन सबको नाश्ता और चाय का आग्रह भी कर रहे थे!


     आज उन्हें देर रात तक कई जगहों पर जाकर विभिन्न विवाह समारोह में सम्मिलित भी होना था! अपने खास आदमियों को निर्देश देकर हमसे विदा होकर वे चल दिए.......बाद में मनोनीत नियोजन एवं राज शिष्टाचार के अनुसार श्री विनोद जी साथ ठिकाना हमीरगढ़ की गाड़ी से माँ चामुंडा के दर्शन के लिए हम चल पड़े! गाव के बाहर जंगल में एक ऊँचे पर्वत पर बना हुवा यह ऐतिहासिक मन्दिर इस नगरी का खास आकर्षण है! श्री विनोद जी ने मंदिर के इतिहास के बारे में परिचय दिया! माँ चामुंडा के दर्शन से ह्रदय में एक पवित्र सी लहर दौड़ने का आभास हुवा! श्री विनोद ने मंदिर के पुजारी जी को हमारा परिचय दिया....उन्होंने भी मंदिर प्रशासन की और से हम सबका स्वागत किया और आशीर्वाद भी दिया! वहा से हमारा काफिला बोरडा ग्राम की और निकल पड़ा जहाँ महाराज श्री किर्तिवर्धन सिंहजी राणावत जी के विवाह के शुभ अवसर पर मनुहार की रस्म थी ! गाव के बाहर मैदान में एक विशाल पेंडोल लगा हुवा था! समारोह के यजमान एवं बोरडा का शेखावत परिवार आतिथ्य की वर्षा कर रहे थे.....! पेंडोल के एक कोने में बने मंच पर पारंपरिक एवं आधुनिक संगीत की धुन पर सुन्दर नर्तकियां अपने विलोभनीय पदन्यास से उपस्थित अतिथियोंका मनोरंजन कर रही थी.....मनुहार के प्यालो से भरे टेबल विशेष आतिथ्य कर रहे थे! जहाँ सुन्दर तरीके से रखे हुए मदिरसव के विभिन्न प्रकार इस वातावरण की गरिमा और भी बढ़ा रहे थे! रजवाड़ों के इस समारोह में भी विलक्षण विनम्रता एवं आतिथ्यशिलता हर एक चेहरे पर छाई हुई थी! जोधपुरी,जयपुरी,मेवाड़ी, मारवाड़ी पगड़िया और राजपूती पोशाख वातावरण की शोभा बढ़ा रहे थे ....चारो ओर इत्र और फूलों की खुशबु.......मधुर संगीत की धुन.... मंडरा रही थी! हमीरगढ़ राव श्री युगप्रदिप सिंहजी मंडप में उपस्थित अतिथियों से मिल रहे थे....सब से हमारा परिचय भी करवा रहे थे! जिनमे कई बड़े अफसर, राजनेता एवं विभिन्न ठिकानों के ठाकुर ,रजवाड़े थे ! उन्ही में से राजस्थान के वरिष्ठ कांग्रेस नेता , भूतपूर्व कृषि मंत्री एवं राजस्थान विधान सभा के पूर्व उपाध्यक्ष श्री देवेन्द्रसिंह जी बद्लियास जी भी थे जिन्होंने विशेष आस्था से बातचीत कर हमें और भी प्रभावित कर दिया ! महाराष्ट्र के सामाजिक रीतिरिवाजों के प्रति , समाज के प्रति विशेष आस्था से वार्तालाप कर रहे थे! वहा से श्री राव साहब अन्य जगहों पर अपनी उपस्थिति दर्ज करने हम से विदा लेकर चल दिए !उन्हें अपने जागीर के गावों में होनेवाली हर एक शादी में उपस्थिति दर्ज करना जरुरी होता है! भगवन गणेश जी के आशीर्वाद के बाद विरम देवोत राव का आशीर्वाद वहा मूल्यवान माना जाता है!मेवाड़ घराने का जनाना जब भी कभी बाहर जाता था तब विरम देवोत राव या उनके घराने से कोई भी व्यक्ति जब तक डोली के पास नहीं जाते थे तब-तक मेवाड़ की रानी या राजकुमारी डोली के बहार अपना कदम नहीं रखती थी! कितना अटूट है यह विश्वास....जो महाराणा प्रताप जी के समय से भाई विरम देवोत के वंशज निभाते आये है ! कैसा है यह अनोखा सन्मान....! वहा मनुहार का प्याला और खाना खाकर सबसे विदा होकर विश्राम के लिए निकले! फिर शुरू हुई चित्तोड़ की यात्रा..... जहाँ हमारी कुलस्वामिनी बाण माता जी का दर्शन जो करना था! ठिकाना हमीरगढ़ की गाड़ी को देख लोग विनय के साथ खम्मा घन्नी कर रहे थे! जनता के ह्रदय में हमीरगढ़ राव के प्रति विशेष आस्था और आदर है.....प्रेम और लगाव है....जो हम स्वयं अनुभव कर रहे थे......! किसी मंत्री को भी इतना सन्मान नहीं मिलता जो जनता हमीरगढ़ राव को देती है!


         चित्तोड़ से हम हमीरगढ़  की और वापस आये ! वहां से खुली जिप में बैठकर रात्रि के विश्राम के लिए ऊँची चोटी पर स्थित हमीरगढ़ किले पर गए! वहा श्री राजमाता माईसा आनंद्कुंवर बा जी और महाराणी सौ. दिव्यकुंवर बाईसा जी का दर्शन हुवा! राजमाता जी सिरोही के झाला परिवार से है और महाराणी सा आगरिया के राठोड परिवार से ! आप के विनयशीलता ने हमें और भी प्रभावित कर दिया! राजकुमारी पयेश्वरी कुमारी और लावन्यप्रिया कुमारी अपनी मधुर मुस्कान लिए वहा खेल-कूद में व्यग्र थे! किले से राजपरिवार महलों की और चला गया! अब किले पर बाकि थे हम, हमारे साथी, श्री विनोद पंडित जी, श्री देवीलाल पुरोहित जी, श्री गोपालसिंह, श्री महेंद्रसिंह दरोगा, श्री रणजीतसिंह राठोड, श्री फिरोज मुह्हमद डायर, श्री भेरुलाल वैष्णव, श्री बाबूसिंह आदि ! यह सब साथी सभी कार्यों में एवं कृतियों में विशेष रूप से प्रवीण है और रात-दिन साये की तरह श्री राव हमीरगढ़ की सेवा में उपस्थित रहती है! जो हमेशा साथ रहते है तो उन्हें "साथी'' शब्द से पुकारना ही सार्थ और यथार्थ सिद्द होगा!


     रात के अँधेरे में हम किले का सफ़र कर रहे थे! श्री विनोद पंडित जी हमें किले के हर अंगों का परिचय दे रहे थे! किले के अन्दर राव साहब की एक घोड़ी है! जो किले के भीतर मुक्त रूप से घुमती है! अगर कोई उसके सामने गया तो उसकी खैर नहीं! विलक्षण तेज है यह घोड़ी! पुरोहित बनना के इशारों को बखूबी समझती है! वहा श्री राव साहब की एक कुत्तिया भी मौजूद रहती है जिसका नाम है ''सूजी'' जो ग्रेट दें प्रजाति की क्रोस -ब्रीड है! किले के अंतर्द्वार से हम सबसे पहले पुरोहित देवीलाल जी अन्दर गए और उन्होंने उस अबलख घोड़ी का लगाम अपने हाथों में ले लिया! उसे बांध दिया गया फिर हम अन्दर की और टहलने लगे! इतिहास के झरोखे के बाहर जाकर भी कई चर्चाये हुई! किले पर रोमांचक सफ़र का अनुभव कर हम किलेपर बने रहे नविन महलों की और गए जहा हमारा रात का खाना एवं विश्राम तय था! हम सबने रात का खाना खाया! फिर एक बुर्ज पर कुर्सिय राखी गयी जहाँ देर रात तक हमारी चर्चाये जारी रही! देर रात श्री राव हमीरगढ़ जी किसी देहात से वापस लौट आये ....वे अपने महलों में जाकर सीधे किले पर गए.....वहा हम फिर बातचीत करने बैठ गए! हम सुबह जल्दी लौटने वाले है तो चर्चा करने के लिए वे थके होने के बावजूद भी किले पर गए थे! वे भी हमारे साथ किले पर बने महल में ही सो गए!


     प्रात: दूर के मंदिर की घंटी बज रही थी! महाशिवरात्रि का दिन था! भगवन एकलिंग जी का नामस्मरण कर हम तैयार हो गए! एक बार फिर श्री राव हमीरगढ़ के साथ विशेष वार्तालाप को प्रारंभ हुवा....जिस वार्तालाप में श्री राव साहब जी ने हमें हमीरगढ़ के भुत, वर्तमान तथा भविष्यत् के बारे में जानकारी दी! हमारे विभिन्न कार्यक्रमों के अल्बम देखकर वे प्रभावित हो गए! शिरपुर आकर हमारे कार्यक्रम में जरुर उपस्थित रहने की इच्छा भी उन्होंने प्रकट की! भविष्य में सामाजिक संघटन के माध्यम से रचनात्मक समाज के नवनिर्माण के लिए अपने अनमोल विचारों के साथ हमें मार्गदर्शन भी किया तथा इस नेक कार्य के लिए अपने आशीर्वाद के साथ सहयोग का भी वादा किया! श्री राव साहब हमीरगढ़ वन सुरक्षा समिती के अध्यक्ष भी है! उन्ही की पहल से १०० हिरन हमीरगढ़ संक्चुरी में छोड़े गए है! आगे चल कर यह संक्चुरी विकसित हो और देश-विदेश के यात्री वहा की सफ़र का आनंद प्राप्त करे यह उनका सपना है! जिसे पूरा करने के लिए वे निरंतर कोशिश भी कर रहे है! उन्होंने हमें वहा के जंगल की भी सफ़र करवाई ! बाद में हमीरगढ़ संस्थान के विभिन्न हथियार भी हम ने देखे...! छोटे बन्ना सा जी ने हमें विभिन्न हथियारों का परिचय भी दिया! सामंती राजपरिवार में जन्म लेकर भी किसी आम नागरिक की तरह वे अपने कम में व्यग्र रहते है! निरंतर दूर-दूर के गावों की यात्राओं के, समारोह की व्यस्तता के बावजूद भी अपने कारोबार---खेती के लिए भी वक्त निकाल लेते है! पुरखों से प्राप्त विरासत में मिले महल और किले पर हेरिटेज पार्क बनाकर वहा देश-विदेश के टूरिस्ट को आकर्षित करने की भी उनकी योजना है! एन.जी. संस्था के द्वारा वे अपने जागीर के गावों के गरीब परिवार, बालक एवं महिलाओं के लिए विभिन्न रूप से कार्य आरम्भ करने वे चाहते है! अपने महल;गाडिया, घोड़े शाही शान के बावजूद भी विनयशीलता और सेवाभाव से उनके व्यक्तित्व का और भी गौरव बढ़ता है! हर रोज प्रात: समय में जागकर महल में स्थित कुलदेवी बाण माता जी की शाही तरीके से पूजा अर्चना नित्य होती है! पूजा के बाद घुड़सवारी, १००० डिप्स, रनिंग आदि कसरत कर अपने स्वास्थ्य को मजबूत रखते है! बाद में दरिखाने में उपस्थिति देकर लोगों से मिलना होता है! उनकी हर सुबह ऐसे ही प्रारंभ होती है!


         दोपहर में श्री राव साहब के साथ शिवरात्रि का पवित्र भोज का लाभ लेकर हम शिरपुर के लिए चल दिए! हमें विदाई देने के लिए स्वयं श्री राव साहब , छोटे बन्ना श्री हर्षप्रदीप सिंहजी ,श्री विनोद जी और सारे साथी मौजूद थे! हमीरगढ़ के महलों से बाहर निकलते वक्त वहा की अविस्मरनीय यादे अपने ह्रदय में साथ लिए हम शिरपुर की और चल पड़े.....! गाड़ी के शीशे में महलों के पास खड़े श्री रावसाहब का अलविदा कहता हाथ दिखाई दे रहा था! वह दो दिन मानो दस साल जैसे लग रहे थे! आँखे उनकी प्रतिमा को आश्वस्त कर रहे थे....हम फिर एकबार आयेंगे.....! अलविदा....हमीरगढ़....!!!


                                                                      (c) लेखक: श्री. ठा.जयपालसिंह विक्रमसिंह गिरासे (सिसोदिया)


                                              ५०, विद्याविहार कोलोनी, शिरपुर ,महाराष्ट्र


                                            मो. ०९४२२७८८७४०


                                                                                                                       http://jaypalg.blogspot.com/

आतिथ्यशील हमीरगढ़ !

हमीरगढ़ राव श्री युगप्रदिप सिंह जी विरमदेवोत की एक मुलाकात........!

मन री बात !

किसी राजपूत नेता या व्यक्ती द्वारा महाराज,महाराणी,कुंवर,ठाकूर,भंवर,श्रीमंत आदी विशेषणों का प्रयोग अगर होता हो तो वह तुरंत बन्द कर देना चाहिए...ऐसा युवराज राहुल गाँधी ने कहा है! (माफ़ कीजिये हमने न चाहते हुए भी उन्हें युवराज कह दिया...!) क्योंकि यह अधिकार केवल गाँधी-नेहरु परिवार तक ही अब सिमित रह गया है! उन्हें ही केवल पंडित जी, प्रियदर्शिनी आदि से नवाजा जा सकता है! राजपूत अब राजा नहीं है...उनके पास कोई रियासत नहीं है इसलिए उनका यह अधिकार{?} अब समाप्त कर दिया गया है ऐसी उद्घोषणा राहुल ने कर दी है....इस बात से हमें अब बेखबर रहने की कोई जरुरत नहीं है!

अब कुछ दिनों के बाद यह भी आदेश जनपथ से दिया जा सकता है .....की अब कोई अपने नाम के आगे अप्पा साहेब, नाना साहेब, दादा साहेब, आदरणीय,माननीय, श्रीमान जैसे शब्दों का विनियोग ना करे....क्योंकि जनता के पास इतना सन्मान नहीं होता है जो सिर्फ सियासत की बागडोर संभालने वाले नेताओं के ही पास होता है! आगे चल के कोई पगड़ी,साफा ना बांधे ....सिर्फ गाँधी टोपी पहने ऐसा भी आदेश (फतवा} निकल सकता है....हमें सावधान ही रहना होगा! (जब तक फैसला नहीं आ जाता तब तक कोई नई ना ख़रीदे...पैसा व्यर्थ हो जायेगा....!) आम आदमी के लिए जल्द ही एक ड्रेस कोड होगा....ताकि क्लासेस और मासेस में फर्क नजर आये! देश में महंगाई इतनी कर दी जाएगी की आम आदमी कोई गाड़ी ना खरीद सके....अगर खरीद हो ही गयी हो तो वह उसे चला ना सके.....यहाँ के रास्ते पर सिर्फ नेता या अमीरों की ही गाड़िया चलनी चाहिए....! अब संविधान ने जो आजादी हमें दी है, उसे भी रोक लगा दी जा सकती है, क्यों की सरकार के खिलाफ बोलना भी गलत माना जायेगा! (बाबा रामदेव का उदाहरण हमारे सामने है ही!)

चाहे हमारी परंपरा, सन्मान,इतिहास,रीती-रिवाज कुछ भी हो, गणतंत्र में आपकी दाल गलनेवाली नहीं है! यह जनता ने दिए हुए...बहाल किये हुए सन्मान जनक विशेषण है ....फिर भी हम उसका इस्तेमाल नहीं कर सकते है ...क्योंकि अब जनता वोट सिर्फ नेता को देती है! और नेता महान है....! नेता इस देश का भविष्य है! इस देश की रक्षा नेता के पुर्वजोने अपना खून बहाकर की है! राजपुतोंको जो सन्मान बिना कुर्सी का मिलता है...जो उन कुर्सिवाले नेताओं को नहीं मिलता है...इसलिए यह लोग हमारे विशेषणों को लेकर भी राजनीती कर सकते है! कभी इतिहास को लेकर,कभी राम को लेकर ,कभी महाराणाप्रताप या शिवाजी महाराज को लेकर उन लोगोने राजनीती भी कर ली! समाज में आपसी फुट भी डाल दी! देश को लुट भी लिया...राजपूतों के तमाम संस्थान विलीन कर दिए.....सीलिंग कानून लगाकर जमींदारों की भूमि निकाल ली गयी.......अब हमारे विशेषणों को हटाकर हमारी वह पहचान भी मिटा रहे है! शायद हमारे मुख ज्यादा तेजस्वी है...हमारी मुछे--दाढ़ी ज्यादा अच्छी दिखती है...इस वजह से नेता का प्रभाव कम हो जायेगा......पाबन्दी आ सकती है!

क्षत्रिय समाज ने इस राष्ट्र के लिए जो त्याग किया है...वह केवल शब्दों में लिखा नहीं जा सकता.. इतना महान है! क्षत्रिय राजाओ ने इस विश्व में अनगिनत आदर्श निर्माण किये.....उनके त्याग या योगदान के सामने आज के तथाकथित नेता धुल के समान है! हम उन नेतागिरी करनेवाले लोगों से अपील करना चाहते है की वे हमारे निम्नलिखित सवालों के जबाब दे.......!

क्या आज के राजनेता अपनी निजी(?) संपत्ति राष्ट्र के नाम समर्पित कर सकते है?

क्या आज के राजनेता अपनी जमीं भूमिहीन लोगों में बाट सकते है?

क्या आज के राजनेता क्षत्रिय राजाओं के भाती केवल ५ साल सत्ता के बाद वानप्रस्थ का स्वीकार कर समाज सेवा में जुट सकते है?

क्या आज के राजनेता अपने ख़राब चरित्र के लिए प्रायश्चित ले सकते है?

क्या आज के राजनेता किसी मामले में दोषी अपने ही परिवार के लोगों को सजा दिलवाने में आगे आ सकते है?

अगर इन सामंतवादी विशेषणों से आपको आपत्ति है तो क्या आप इस राष्ट्र में रहने वाले भिन्न-भिन्न समुदाय के लोगों के पोशाख....प्रार्थना....भाषा....व्यवहार...संस्कृति.....श्रद्धा .....स्वागत पर प्रयोग होनेवाले शब्द के प्रति भी आपत्ति जाता सकते है...?

अगर ऐसा करते है तो इस देश के तमाम नेता लोगों की तसबीर जनता अपने दिल के पास रखेगी और उनके आदर्श पर चलेगी! यह राष्ट्र में सही स्वरुप में रामराज्य का निर्माण हो जायेगा! उन विशेषणों के बारे में इतनी अस्पृश्यता मानने की जरुरत नहीं है! अगर कोई किसी से ठाकुर साहब कह पुकारे तो देश पर कोई आपत्ति नहीं आ जाती ! इससे देश का कोई नुकसान नहीं होता है! नेता की यह सोच भी उसकी अपरिपक्वता दिखलाती है!

यह बिलकुल ही संभव नहीं! क्षत्रिय राजा ने कभी सूर्योदय से पहले और सूर्योदय के बाद आक्रमण नहीं किया है! इन्होने तो बाबा रामदेव के साथ रात के वक्त जो व्यवहार किया है वह निंदा के पात्र है!

ठाकुर जयपालसिंह गिरासे

श्री क्षत्रिय वीर ज्योति मिशन 

"अंतर्राष्ट्रीय क्षत्रिय राजपूत संघ " की ओरसे अहमदाबाद में सामूहिक विवाह .......!

कल १२ अप्रैल को अहमदाबाद के निरांत चौकड़ी के पास "अंतर्राष्ट्रीय क्षत्रिय राजपूत संघ " की ओरसे सामूहिक विवाह का आयोजन संपन्न हुवा...! विशाल मंडप में ...वैदिक मंत्रनाओं के तथा मुख्य अतिथि के आशीष के साथ १० जोड़े विवाह के बंधन में जुड़ गए..! दूधेश्वर शक्तिपीठ के महंत तथा "अंतर्राष्ट्रीय क्षत्रिय राजपूत संघ " के संरक्षक श्री महंत नारायण गिरी जी स्वामी महाराज, भगवान जगन्नाथ मंदिर के प्रमुख महंत ,"अंतर्राष्ट्रीय क्षत्रिय राजपूत संघ " के राष्ट्रीय प्रचारक स्वामी शान्तं मोक्षं गिरी तथा कुंवर जितेन्द्रसिंह चौहान, राष्ट्रीय कोशाध्यक्ष श्री बलरामसिंह तोमर, राष्ट्रीय उपाध्यक्ष श्री जयपालसिंह गिरासे, राष्ट्रीय महासचिव श्री रत्नदीप सिसोदिया, महाराष्ट्र प्रदेश अध्यक्ष श्री सुभाषसिंह राजपूत, गुजरात प्रदेश अध्यक्ष श्री महेशसिंह कुशवाह, श्री रामप्रतापसिंह चौहान, श्री साहबसिंह सेंगर ,श्रीमती संतोष सिसोदिया, अहमदाबाद नगराध्यक्ष श्रीमती पुनमसिंह नगर, अहमदाबाद के प्रतिष्ठित नागरिक, वधु-वर पक्ष के रिश्तेदार, भोलासिंह चौहान, कमलसिंह तोमर,श्रीमती रीता सिंह, राष्ट्रीय प्रचारक श्री राजकुमारसिंह गहरवार, श्री राजेन्द्रसिंह गौर, श्री आर.पि.बडगुजर,आर.ए.सिंह, राजस्थान प्रदेश अध्यक्ष श्री भवानीसिंह शेखावत ,भूमसिंह देवड़ा आदि एवं स्थानिक कार्यकर्ता उपस्थित थे! प्रारंभ में सजी गाड़ियों में वर-वधु की बारात कुलदेवी दर्शन के लिए गयी! वहा से बारात मंडप में उपस्थित हुई.! विवाह समारोह का विधिवत उदघाटन हुवा.....विवाह संस्कार के बाद राजपुताना कलेंडर का विमोचन एवोम अथिति सन्मान का आयोजन किया गया! इस समय कुंवर जयपालसिंह गिरासे, कुवर जितेन्द्रसिंह चौहान ने उपस्थित जन-समुदाय को मार्गदर्शन किया! श्री महंत नारायण गिरिजी महाराज ने समस्त नव-परिणित जोड़ों को अपने आशीर्वाद प्रदान किये! संघटन की ओरसे इस विवाह में सम्मिलित हर जोड़े को संसार के लिए उपयुक्त सामुग्री जैसे कपाट,बर्तन,मंगलसूत्र,साड़ी,कपडे आदि उपहार में दिए गए! समारोह के बाद सभी उपस्थित समुदाय के लिए भोजन की सुन्दर व्यवस्था की गयी थी! गुजरात प्रदेश के अध्यक्ष श्री महेश सिंह कुशवाह ने कार्यक्रम का सञ्चालन किया!

शेर-ए-मारवाड़...........!

राजस्थान की धरा वीर प्रसविनी धरा मानी जाती है........कई वीर और वीरांगना यहाँ प्रसिद्द है! चलो आज हम एक अनोखे....नन्हे शेर की बात करते है जिसने दिल्ली के मुग़ल बादशाह को भी भयचकित कर दिया था!


बात उन दिनों की है जब औरंगजेब शिकार पर निकला था! अपने सैनिकों की सहायता से उन्होंने एक शेर को पकड़ा और पिंजरे में बन्द कर दिया! उस शेर को अपने साथ वह राजमहल ले आया और पास ही के बगीचे में रखा! दुसरे दिन चापलूसी करने वाले लोग दरबार में बादशाह की वीरता की तारीफ कर रहे थे! बादशाह ने भी उस शेर को पकड़ ने में कितनी म्हणत करनी पड़ी उस बात के बारे में बढ़ चढ़ कर बताया! सभी दरबारी लोग बादशाह की बात ध्यान से सुन रहे थे और बात पर तारीफ कर रहे थे! आखिर बादशाह ने दरबार में मौजूद लोगों से पूछा, "क्या आपने अपनी जिंदगी में इतना खूंखार शेर कभी देखा था?".......मौजूद लोगो ने बताया, "नहीं.... नहीं....!" कुछा लाचार लोग तो यहाँ तक कहने लगे की जहाँपना ने पकडे हुए शेर जैसा शेर आजतक किसी ने ना कभी देखा होगा या पकड़ा होगा! दरबार में बादशाह की जयजयकार गूंज रही थी! अचानक एक तेज आवाज से दरबार में सन्नाटा छा गया! सारे दरबारी आवाज की दिशा की तरफ देखने लगे! यह कौन गुस्ताखी कर रहा है.........बादशाह सलामत उसे जरुर सजा देंगे......दरबार में स्वामिभक्त सरदार धीमे आवाज में एक-दुसरे से कहने लगे.....! बादशाह सलामत ने भी उस दिशा की ओर अपनी नजर डाली........वह शख्स फिर बोले.....,"जहाँपना, आपके शेर से भी बढकर एक नन्हा शेर मेरे पास है! मेरे शेर के सामने आपका शेर कुछ भी नहीं!"

सारे दरबार में फिर से सन्नाटा छा गया.........वह शख्स था जोधपुर का भूतपूर्व राजा जसवंतसिंह ....! धूर्त औरंगजेब जसवंतसिंह के ऐलान से मन-ही-मन में लज्जित हो गया....! उसने भी जबाब में कह दिया,"देखते है राजाजी, हम भी आप के नन्हे शेर को देखना पसंद करेंगे! आप कल उसे यहाँ ले आओ, नन्हे शेर को इस खूंखार शेर के साथ पिंजरे में बन्द कर देखेंगे की किसका शेर ज्यादा शक्तिशाली है!"

दुसरे दिन राजा जसवंतसिंह अपने नन्हे शेर को लिए साथ शाही बाग़ की ओर चल दिए.......! शाही बाग़ में काफी भीड़ थी! हर एक शख्स राजा जसवंत के शेर को देखने उत्सुक था! स्वयं बादशाह भी.....! जब राजा जसवंत वहा पहुचे तो बादशाह ने पूछा, "बोलो राजाजी, कहा है आप का शेर? , साथ लाये हो या आपके शेर ने दम तोड़ दिया?" राजाजी ने अपने १४ साल के पुत्र पृथ्वीसिंह को बादशाह के सामने पेश कर कहा की यही है मेरा नन्हा शेर.......!

बादशाह के साथ-साथ उपस्थित जनसमुदाय विस्मय चकित हो गया! कुछ लोग डर गए......कुछ मन-ही-मन में आनंद ले रहे थे! बादशाह भी पत्थरदिल था! उसने तुरंत आदेश दिया की उस बालक को शेर के साथ पिंजरे में बन्द कर दिया जाये! पृथ्वीसिंह को पिंजरे के अन्दर छोड़ा गया.......वह शेर की आँखों में देख रहा था! पृथ्वी की तेज नजर से नजर मिलकर वह असली शेर भी एक जगह खड़ा हो गया! मानो वह शेर भी पृथ्वी के साहस की प्रशंसा कर रहा था! औरंगजेब ने अपने सैनिकों को आदेश दिया! कुछ सैनिक भाला लेकर उस शेर को उकसाने लगे! झल्लाए हुए शेर ने गर्जना की और झट से पृथ्वी को ओर जा झपटा! पृथ्वी भी तुरंत वहा से परे हो गया और उसने अपनी तलवार को म्यान से निकाली! उस वक्त राजा जसवंत सिंह ने पृथ्वी को आवाज देकर कहा की," बेटे निहत्ते शेर पर तलवार से वर करना राजपूत को शोभा नहीं देता.....!"

अपने वीर पिता के शब्द सुन उस वीर पुत्र ने भी अपनी तलवार फेक दी और अपने दोनों हाथों से शेर से लड़ने लगा! एक वीर बालक और एक खूंखार शेर की यह जंग बड़ी ही रोमांचक थी! देखते देखते उस वीर बालक ने शेर के मुह को फाड़ डाला......शेर वही ढेर हो गया! सारा माहोल तालिया और उस वीर बालक की जयजयकार से गूंज उठा! बादशाह भी भयचकित हो गया! लेकिन उस कंजूस बादशाह ने उस बालक के अपूर्व साहस के गौरव में केवल बधाई दी! कुछ भी इनाम उसे दिया नहीं गया! इनाम की परवाह किसे थी....! उस वीर बालक ने अपनी माँ का दूध और अपनी वीर प्रसविनी धरा मारवाड़ का गर्व और गौरव जो बढाया था! 

                                                                                            -------जयपालसिंह गिरासे

// क्षत्राणी //

// क्षत्राणी //
मै दुर्गा की जयेष्ट-पुत्री,क्षात्र-धर्म की शान रखाने आई हूँ !

मै सीता का प्रतिरूप ,सूर्य वंश की लाज रखाने आई हूँ!1!

मै कुंती की अंश लिए ,चन्द्र-वंश को धर्म सिखाने आई हूँ !
मै सावित्री का सतीत्त्व लिए, यमराज को भटकाने आई हूँ !२!

मै विदुला का मात्रत्व लिए, तुम्हे रण-क्षेत्र में भिजवाने आई हूँ !
मै पदमनी बन आज,फिर से ,जौहर की आग भड़काने आई हूँ !३!

मै द्रौपदी का तेज़ लिए , अधर्म का नाश कराने आई हूँ !
मै गांधारी बन कर ,तुम्हे सच्चाई का ज्ञान कराने आई हूँ !४!

मै कैकयी का सर्थीत्त्व लिए ,तुम्हे असुर-विजय कराने आई हूँ !
मै उर्मिला बन ,तुम्हे तम्हारे क्षत्रित्त्व का संचय कराने आई !५!

मै शतरूपा बन ,तुम्हे सामने खडी , प्रलय से लड़वाने आई हूँ!
मै सीता बन कर ,फिर से कलयुगी रावणों को मरवाने आई हूँ!६!

मै कौशल्या बन आज ,राम को धरती पर पैदा करने आई हूँ !
मै देवकी बन आज ,कृष्ण को धरती पर पैदा करने आई हूँ !७!

मै वह क्षत्राणी हूँ जो, महा काळ को नाच नचाने आई हूँ !
मै वह क्षत्राणी हूँ जो ,तुम्हे तुम्हारे कर्तव्य बताने आई हूँ !८!

मै मदालसा का मात्रत्त्व लिए, माता की माहिमा,दिखलाने आई हूँ !
मै वह क्षत्राणी हूँ जो ,तुम्हे फिर से स्वधर्म बतलाने आई हूँ !९!

हाँ तुम जिस पीड़ा को भूल चुके, मै उसे फिर उकसाने आई हूँ !
मै वह क्षत्राणी हूँ ,जो तुम्हे फिर से क्षात्र-धर्म सिखलाने आई हूँ !१०!

"जय क्षात्र-धर्म "
कुँवरानी निशा कँवर नरुका
श्री क्षत्रिय वीर ज्योति 

"राजा नहीं फकीर है; देश की तक़दीर है...!"

भूतपूर्व प्रधान मंत्री एवं  महान नेता दिवंगत श्री विश्वनाथ प्रताप सिंहजी ने अपने विचार एवं  कृतियों से एक मिसाल कायम की है! उन्हें समझने में कई आज भी कई  लोग असमर्थ रहे है !  संकीर्ण विचार या कृतियों से दूर रहकर एक राजा आधुनिक समय में अपनी प्रजा के लिए कैसे कदम उठा सकता है यह श्री वि.पि.सिंह ने कर दिखाया! हमारे साथी श्री डॉ (मेजर) हिमांशु सिंघजी श्री वि.पि.सिंह साहब के करीबी रहे है! उनके निधन के बाद डॉ.हिमांशु सिंह ने अखबारों में जो लेख लिखे थे उन्हें हम इस ब्लॉग पर अपने पाठकों के लिए पेश कर रहे है!