"राष्ट्रगौरव महाराणा प्रतापसिंह -एक अपराजित योद्धा "

 

"राष्ट्रगौरव महाराणा प्रतापसिंह --एक अपराजित योद्धा''


लेखक : श्री जयपालसिंह गिरासे


प्रकाशक : नोशन प्रेस पब्लिकेशन, चेन्नई (तमिलनाडु)


भाषा : हिंदी


कुल  पृष्ठसंख्या  : ३३६


मूल्य : ३९९  /- (शिपिंग चार्जेस एक्स्ट्रा)


ISBN NO :  978-1-64919-951-5


(C) Jaypalsingh Girase


आप सभी को बताते हुए अत्यंत हर्ष का अनुभव हो रहा है की , श्री जयपालसिंह गिरासे  द्वारा हिंदी भाषा में लिखित 'राष्ट्रगौरव महाराणा प्रतापसिंह---एक अपराजित योद्धा !' यह ग्रन्थ पाठकों के लिए लम्बी प्रतीक्षा के बाद उपलब्ध  हो गया है।  

मुग़ल साम्राज्यवाद के खिलाफ अपनी प्रजा का  साथ लेकर जनयुद्ध खड़ा करनेवाले तथा विपरीत परिस्थितियों में भी कड़ा संघर्ष कर अपराजित रहते हुए मृतवत राष्ट्र में नवप्राणों का संचार कर जन -जन को मातृभूमि की स्वतंत्रता के लिए प्रेरित करनेवाले वीरशिरोमणि महाराणा प्रतापसिंह हर पीढ़ी में विश्व के सभी स्वाभिमानी और स्वतंत्रताप्रेमी नागरिकों के लिए  प्रात :स्मरणीय है।  

राष्ट्रकवि पं. रामसिंहजी  सोलंकी ने महाराणा प्रतापसिंहजी के गौरव का बखान करते हुए यह कहा था :--

"जात -धरम तज वरग मन; वृद्ध -शिशु-नर-नारिह।

जद -जद भारत जुंझसि,पाथल जय थारिह।।"

 - अर्थात: हे प्रताप, जब-जब भारत वर्ष पर विपदा की स्थिति आएगी तब -तब भारत वर्ष के आबाल-वृद्ध तथा नर-नारी अपने जाति -धर्म-पंथ-प्रान्त की संकुचित भावना से ऊपर उठकर केवल तुम्हारे नाम का जयजयकार करेगी !

-        'या तो कार्य सिद्ध होगा या मृत्यु का वरन किया जायेगा ' महाराणा प्रतापसिंह का यह भीषण प्रण उस काल के क्रांतिकारी स्वर्णिम इतिहास का गौरव लिखने के लिए कलम को सदैव प्रेरित करता है। राष्ट्र के सत्व-स्वत्व और स्वाभिमान की रक्षा के लिए भीषण कष्टों का सामना कर लगातार २५ साल तक साम्राज्यवादी शक्ति के साथ कड़ा संघर्ष करनेवाले राष्ट्रगौरव महाराणा प्रतापसिंह जी का चरित्र केवल भारत राष्ट्र के लिए ही नहीं अपितु समस्त संसार के स्वतंत्रता और स्वाधीनता प्रेमी नागरिकों के लिए आज भी स्फूर्ति का स्रोत है।

-       जब भारत की कई हिन्दू-मुस्लिम शासकों  ने साम्राज्यवादी मुघल सल्तनत के सामने अपनी सार्वभौमिकता खो दी थी तब उसी प्रतिकूल संक्रमणकाल के दौरान महाराणा प्रतापसिंह मेवाड़ की धरती पर प्रखर विरोध का केंद्र बने रहे तथा सिमित संसाधन होकर भी गुरिल्ला और छापामार युद्धतंत्र का अवलंब कर अपनी स्वतंत्रता और सार्वभौमिकता को कायम रखा। विश्व के इतिहास में यह अनोखा उदाहरण होगा जहाँ अपने राजा के साथ -साथ प्रजा ने भी वनवास तथा कष्टप्रद जीवन व्यतीत किया। स्वभूमि विध्वंस जैसे कठोर कदम उठाकर मुघल रणनीति को परास्त करनेवाली सामरिक रणनीति आज भी सामरिक शास्रों के अध्ययन कर्ता तथा संशोधकों का ध्यान आकृष्ट करती है।

-       

 महाराणा के इसी शौर्य से परिपूर्ण , कुशल रणनीतिकार और प्रजाहितैषी व्यक्तित्व को सुलभ भाषा के माध्यम से शब्दांकित करने का लेखक श्री जयपालसिंह गिरासे द्वारा प्रस्तुत ग्रन्थ में प्रयास किया गया है। श्री जयपालसिंहजी ने मेवाड़ धरा के हर एक स्थल पर प्रत्यक्ष जाकर प्रमाणों के साथ अध्ययन किया है।  मेवाड़ राजपरिवार तथा विभिन्न ठिकानेदार परिवारों से प्रत्यक्ष चर्चा कर उन्होंने सन्दर्भ जुटाए है।  मूल राजस्थानी लोकसाहित्य, विभिन्न ख्यात साहित्य, प्रशस्तियाँ , ऐतिहासिक दस्तावेज, शिलालेख, ताम्रपट्ट ,पट्टे -परवाने , दरबारी दस्तावेज , मुग़ल कालीन ग्रन्थ तथा समकालीन इतिहास से संबंधित हिंदी, अंग्रेजी , फ़ारसी तवारीखे , विभिन्न समीक्षा ग्रंथों, स्मरणिकाएँ , शोधप्रबंधों आदि  ग्रंथों का अध्ययन कर कालक्रम को सुगम और सुसंगत कर प्रस्तुत ग्रन्थ को लिखा गया है।  महाराणा प्रतापसिंह के जीवनकाल के बारे में कई प्रचलित किवदंतियों को टालकर एक राष्ट्रप्रेरक चरित्र को उजागर करने का लेखक ने प्रयास किया है।    प्रस्तुत ग्रन्थ के अंत में महाराणा प्रतापसिंह के जीवनक्रम , हल्दी घाटी युद्ध , सहयोगी साथी तथा परिवार के सदस्यों की विस्तृत जानकारी स्वतंत्र परिशिष्टों के रूप में दी गयी है।  आशा है यह ग्रन्थ पाठकों को निश्चित रूप से पसंद आएगा।

'मुग़ल-मेवाड़ संघर्ष' को 'साम्राज्यवाद के खिलाफ जनयुद्ध'  के रूप में वर्णित कर ग्रन्थ की रचना उत्तमोत्तम बनाने का प्रयास लेखक ने किया है।  अनगिनत संघर्षों के इतिहास की बखान करते समय संयत तथा मर्यादित भाषा का प्रयोग लेखक ने किया है। प्रताप  की युद्धकुशलता और सामरिक रणनीति का  अत्यंत सटीक- समर्पक भाषा में वर्णन तो किया ही है लेकिन साथ-साथ प्रताप की दूरदर्शिता , प्रजावत्सलता , सादगी , धर्मनिरपेक्षता, मानवतावादी दृष्टिकोण और प्रशासनिक गुण आदि पहलुओं पर भी सोदाहरण प्रकाश डाला है।

      प्रस्तुत ग्रन्थ का आमुख  मेवाड़ के लिए  शत्रु से लोहा लेकर प्राणोत्सर्ग करनेवाले वीर झाला मान के वंशज तथा महाराणा मेवाड़ परिवार के अत्यंत करीबी और विश्वसनीय व्यक्तित्व श्री प्रतापसिंह झाला (तलावदा , उदयपुर) ने लिखी है।  लगभग २९ पृष्ठों की व्यापक आमुख (प्रस्तावना) में गुहिल --बाप्पा रावल के काल से अर्थात मेवाड़ राज्य की स्थापना से लेकर महाराणा प्रतापसिंह के काल तक विभिन्न ऐतिहासिक घटनाओं का संक्षेप में परामर्श लेकर कई तथ्यों का सप्रमाण पुष्टिकरण किया है। 

      ग्रन्थ में ४३ स्वतंत्र प्रकरण है जिनमे ४ सूचि है। ग्रन्थ की आकर्षक छपाई , निर्दोष मुद्रण और अंतरंग की रचना आदि के लिए नोशन प्रेस की टीम ने अंतर्राष्ट्रीय मानकों का अवलंब किया है।  ग्रन्थ में कुल ३३६ पृष्ट है तथा साइज़ 5.5 x 8.5  की है।  ग्रन्थ के मुखपृष्ठ का प्रकार पेपरबैक है तथा ग्लॉस लैमिनेटेड है।   ग्रन्थ के अंदर के पृष्ट 70 GSM Seshai NS प्रकार के है।  

     राष्ट्र में स्वाधीनता तथा सार्वभौमिकता की प्रेरणा निरंतर जीवित रखनेवाले महाराणा प्रतापसिंह जैसे अपराजित योद्धा की संघर्षमयी कहानी पाठक जरूर पढ़े।  यह मेरा विशेष सुझाव है।

 


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प्रात:स्मरणीय महाराणा प्रतापसिंहजी के जीवन पर अत्यंत सुन्दर तथा परिपूर्ण ग्रन्थ !



"राष्ट्रगौरव महाराणा प्रतापसिंह --एक अपराजित योद्धा''

लेखक : श्री जयपालसिंह गिरासे 

प्रकाशक : नोशन प्रेस पब्लिकेशन, चेन्नई (तमिलनाडु)

भाषा : हिंदी 

एकूण पृष्ट : ३३६ 

मूल्य :  ३९९ /- (शिपिंग चार्जेस के साथ) 

ISBN NO :  978-1-64919-951-5


        "राष्ट्रगौरव महाराणा प्रतापसिंह --एक अपराजित योद्धा''  इस हिंदी भाषा में  प्रकाशित ग्रन्थ  में मेवाड़ के महान सपूत तथा हर सदी में जन -जन को स्वाभिमान , सार्वभौमिकता  और स्वतंत्रता की प्रेरणा देनेवाले  प्रखर राष्ट्रभक्त हिंदुवा सूरज वीरशिरोमणि महाराणा प्रतापसिंहजी के जन्म से मृत्यु तक के समग्र घटना क्रमों का वर्णन है।   प्रस्तुत ग्रन्थ का प्रकाशन चेन्नई-सिंगापूर-मलेशिया  स्थित अंतर्राष्ट्रीय प्रकाशन संस्था 'नोशन प्रेस पब्लिकेशन' द्वारा किया गया है तथा विश्व के १६ प्रमुख  देशों में लगभग ३०००० से ज्यादा बुकस्टॉल्स और विभिन्न ऑनलाइन वेबसाइट्स के माध्यम से बिक्री के लिए उपलब्ध होगा।  किंडल बुक के माध्यम से अमेजॉन , फ्लिपकार्ट , नोशन प्रेस.कॉम , स्नैपडील आदि वेबसाइट्स पर भी यह ग्रन्थ उपलब्ध रहेगा।  प्रारम्भ में मेवाड़ के त्याग-तप-बलिदान से समृद्ध  गौरवशाली ऐतिहासिक पूर्वपीठिका का संक्षेप में  उल्लेख किया गया है जिससे महाराणा प्रतापसिंह के जीवनकाल में उभरे संघर्ष की पार्श्वभूमि समझना सुलभ होता है।  जिसमे सन १५६८ में चितौड़ पर मुघलों  द्वारा किये गए प्रलयंकारी आक्रमण, चितौड़ के तीसरे साके -जौहर  और महाराणा के द्वारा  अरावली के दुर्गम पहाड़ों को प्राकृतिक वनदुर्गों का स्वरुप देकर गुरिल्ला --छापामार युद्धतंत्र का प्रभावी अवलंब करना आदि घटनाएं भविष्य के कड़े संघर्ष को ध्वनित करती है। 
         महाराणा प्रतापसिंह ने अपने पूर्वजों के पगचिन्हों पर चलने का निश्चय किया तथा अपने इस प्रण को निभाने के लिए अत्यंत प्रतिकूल स्थिति में सिमित संसाधनों के साथ अनगिनत कष्टों का सामना कर अपनी प्रजा के ह्रदय में स्वतंत्रता और सार्वभौमिकता की जो असाधारण ऊर्जा भर दी जिसके चलते तत्कालीन विश्व की शक्तिशाली साम्राज्यवादी मुघल सल्तनत के साथ लगातार २५ साल तक भीषण संघर्ष किया। 
       मुघल शासक अकबर द्वारा महाराणा प्रताप सिंह को झुकाने के लिए साम-दाम-दंड-भेद के प्रयोग किये गए। आरम्भ में  जलाल खान कोरची , कुँवर  मानसिंह , राजा भगवंत दास और राजा टोडरमल को सन्धिवार्ता के लिए भेजा लेकिन अपने दादा राणा सांगा के काल से चले आ रहे इस संघर्षमयी परंपरा के मद्देनजर और अपनी मातृभुमि के सत्व -स्वत्व -स्वाभिमान और स्वाधीनता की रक्षा के लिए महाराणा प्रतापसिंह ने इन प्रस्तावों को ठुकरा दिया था।  मुघलों से किसी भी तरह का समझौता स्वयं के साथ-साथ मातृभुमि की स्वतंत्रता को भी नष्ट कर देनेवाला था इसलिए महाराणा प्रतापसिंह ने उसी भूमिका का निर्वहन किया जो अपेक्षित थी। 
        मूल भारतवासियों की स्वतंत्रता नष्ट कर उन्हें अंकित कर अपने साम्राज्य में विलीन करना और सम्पूर्ण भारतवर्ष में अपने साम्राज्य का निर्माण करना मुघल सल्तनत का मुख्य उद्देश्य था।  महाराणा प्रतापसिंह ने अपनी मेवाड़ की प्रजा तथा दुर्गम पहाड़ियों के आदिवासी समुदाय के ह्रदय में प्रखर राष्ट्रभक्ति की भावना का निर्माण किया।   धन-अस्र-शस्र और सैन्य बल आदि  संसाधन सिमित थे फिर भी स्वामीनिष्ठ साथीयों  और प्रजा का असाधारण सहयोग प्राप्त कर महाराणा प्रतापसिंह ने इस संघर्ष को ''साम्राज्यवाद के खिलाफ जनयुद्ध'' का स्वरुप दिया। सिरोही , ईडर, बांसवाड़ा ,बूंदी और डूंगरपुर जैसे  पडोसी शासको के साथ गठबंधन कर साम्राज्यवाद के खिलाफ लड़ने की प्रेरणा जीवित रखी।   स्वभूमि- विध्वंस के जरिये समतल इलाकों में खेती करना बंद कर दिया गया और  समस्त प्रजा अपने राजा के साथ दुर्गम पहाड़ों की शरण में चली गयी। प्रजा शांतिकाल में पहाड़ों में खेती करती थी और संघर्षकाल में सैनिक बन शत्रु का मुकाबला करती थी।  सांकेतिक आवाजों वाली गुप्त सांकेतिक भाषा का विकसन कर पहाड़ों में तथा शत्रु के प्रदेशो में गुप्तचरों का जाल बिछाया।  दुर्गम पहाड़ों में प्राकृतिक गुफाओं में आश्रय स्थान बनाये गए।   सभी बस्तिया खाली करवाई गयी जिससे दो फायदे हुए : या तो प्रजा शत्रु के भयंकर आक्रमणों से सुरक्षित रही और मुघल सेना को स्थानीय स्तर पर अनाज या घांस का मिलना दुर्लभ हो गया जिस प्रतिकूल स्थिति में उन्हें केवल दिल्ली या अजमेर से आनेवाली रसद पर निर्वहन करना बाध्य हो जाता था जो महाराणा के छापामार सैन्य टुकड़ियां  लूट लेती थी।  मुघल सेना पर घात लगाकर बैठे मेवाड़ के सैनिक अचानक हमले कर उनकी दयनीय अवस्था कर देते थे जिसकी वजह से बड़े से बड़े मुघल सेनानायक और उनकी तमाम रणनीतियाँ महाराणा प्रतापसिंह की रणनीति के सामने परास्त हो जाती थी। 
        महाराणा प्रतापसिंह  की शक्ति को परास्त करने के लिए कुँवर  मानसिंह , स्वयं मुघल बादशाह अकबर , शाहबाज खान ,जगन्नाथ कछवाहा , अब्दुर्रहीम खानखाना आदि के नेतृत्व में अस्र -शस्र -धन बल से सुसज्जित विशाल मुघल सेना ने कई बार प्रदीर्घ समय तक आक्रमण किये लेकिन किसी भी मुहीम को सफलता नहीं मिल सकी।  मेवाड़ के शासक अपराजित रहे। 
       महाराणा प्रतापसिंह के कार्यकाल में 'हल्दी घाटी का युद्ध' तथा 'दिवेर का युद्ध' अत्यंत महत्वपूर्ण माने जाते  है।   हल्दी घाटी के युद्ध में महाराणा प्रतापसिंह के रूप में एक प्रचंड आत्मशक्ति वाले  आक्रमक योद्धा का दर्शन होता है तो 'दिवेर के युद्ध ' में अपने बलाढ्य शत्रु के सभी इरादों को सदा के लिए ध्वस्त करनेवाले और शत्रु दल को भयकंपित कर देनेवाले  सुनियोजित रणनीतिकार नजर आते है। 
       महाराणा प्रतापसिंह प्रखर राष्ट्रभक्त , पराक्रमी योद्धा , प्रजावत्सल शासक के साथ-साथ कला -साहित्य के आश्रयदाता भी थे।  निसारदी (नसीरुद्दीन )नामक महान चित्रकार को उन्होंने आश्रय दिया था जिसने चावंड में प्राचीन रागमाला चित्रशैली का विकास किया।  वीर हकीमखान सूरी हल्दी घाटी के युद्ध के समय महाराणा के सेनापति थे जिन्होंने मुघल सेना के साथ लड़ते हुए अपने प्राणों की आहुति दी थी।  महान जैन मुनि हेमरतन सूरी को उन्होंने अपना गुरु माना था।  महाराणा प्रतापसिंह ने अपने पूर्वजों की तरह 'सब समाज को लिए साथ में ,आगे है बढ़ते जाना ' इस उक्ति के अनुसार मानवता धर्म का सदैव अनुपालन किया था।  पंडित चक्रपाणि मिश्र जैसे मूर्धन्य विद्वान के सहयोग से 'मुहूर्तमाला ', 'विश्ववल्लभ और 'राज्याभिषेक पद्धति' जैसे महान ग्रंथों का निर्माण करवा लिया। 
       महाराणा के इसी शौर्य से परिपूर्ण , कुशल रणनीतिकार और प्रजाहितैषी व्यक्तित्व को सुलभ भाषा के माध्यम से शब्दांकित करने का लेखक श्री जयपालसिंह गिरासे द्वारा प्रस्तुत ग्रन्थ में प्रयास किया गया है। श्री जयपालसिंहजी ने मेवाड़ धरा के हर एक स्थल पर प्रत्यक्ष जाकर प्रमाणों के साथ अध्ययन किया है।  मेवाड़ राजपरिवार तथा विभिन्न ठिकानेदार परिवारों से प्रत्यक्ष चर्चा कर उन्होंने सन्दर्भ जुटाए है।  मूल राजस्थानी लोकसाहित्य, विभिन्न ख्यात साहित्य, प्रशस्तियाँ , ऐतिहासिक दस्तावेज, शिलालेख, ताम्रपट्ट ,पट्टे -परवाने , दरबारी दस्तावेज , मुग़ल कालीन ग्रन्थ तथा समकालीन इतिहास से संबंधित हिंदी, अंग्रेजी , फ़ारसी तवारीखे , विभिन्न समीक्षा ग्रंथों, स्मरणिकाएँ , शोधप्रबंधों आदि  ग्रंथों का अध्ययन कर कालक्रम को सुगम और सुसंगत कर प्रस्तुत ग्रन्थ को लिखा गया है।  महाराणा प्रतापसिंह के जीवनकाल के बारे में कई प्रचलित किवदंतियों को टालकर एक राष्ट्रप्रेरक चरित्र को उजागर करने का लेखक ने प्रयास किया है।   महाराणा प्रतापसिंह के चरित्र ने भारत के कोने-कोने में हजारों वीरों को स्वतंत्रता की प्रेरणा दी है। अंग्रेज साम्राज्यवाद के  खिलाफ लड़नेवाली भारतीय जनता के भी महाराणा प्रतापसिंह प्रेरणापुंज रहे है। 
     प्रस्तुत ग्रन्थ के अंत में महाराणा प्रतापसिंह के जीवनक्रम , हल्दी घाटी युद्ध , सहयोगी साथी तथा परिवार के सदस्यों की विस्तृत जानकारी स्वतंत्र परिशिष्टों के रूप में दिए गए है।  आशा है यह ग्रन्थ पाठकों को निश्चित रूप से पसंद आएगा।
     प्रस्तुत ग्रन्थ के लेखक श्री जयपालसिंह गिरासे  ''आर.सी. पटेल शिक्षण संकुल ,शिरपुर'' में अंग्रेजी विषय के अध्यापक के रुप में कार्यरत है।   अंग्रेजी विषय के शिक्षक तथा टीचर्स ट्रेनर होने के साथ -साथ आप को इतिहास में भी अत्यंत रूचि है।  राष्ट्रीय वक्ता के रूप में महाराणा प्रतापसिंह , राजस्थान के जौहर और साके , महाराणी पद्मिनी की अमर कथा , छत्रपति शिवाजी महाराज , महाराजाधिराज हर्षवर्धन, वीरमदेव और जालौर , स्वामी विवेकानंद , भारत -उत्थान ,पतन और पुनरुत्थान  आदि विषयों पर विभिन्न राज्यों में अबतक सैकड़ौ प्रकट व्याख्यान कर चुके है तथा विभिन्न पत्र - पत्रिकाओं में आपके लेख-कविता-व्यंग निरंतर प्रकाशित होते  रहते है। आप श्री विवेकानंद केंद्र,शिरपुर के नगरप्रमुख के रूप में कार्यरत है तथा स्वामी विवेकानंद सार्ध शति वर्ष में 'स्वामी विवेकानंद' केंद्र शिरपुर के माध्यम से सम्पूर्ण वर्षभर विभिन्न कार्यक्रमों के आयोजन में मुख्य भूमिका निभाई थी।  आपने भारत देश के अधिकांश राज्यों के विभिन्न ऐतिहासिक स्थलों का दौरा किया है।  अहिरानी बोलीभाषा में प्रकाशित होनेवाले  '' उबगेलवाड़ी.कॉम '' नामक ब्लॉग का निर्माण तथा संचालन  कर बोलीभाषा का संवर्धन करने में आपका विशेष योगदान रहा है। 
      आप के द्वारा लिखित  राष्ट्रगौरव महाराणा प्रतापसिंह के जीवन पर आधारित १ ग्रन्थ (मराठी भाषा ) २०१५ ई. में प्रकाशित हो चूका है तथा मराठी भाषा में एक कवितासंग्रह, अहिरानी भाषा में एक व्यंग और हिंदी में 'महाराजाधिराज हर्ष' के जीवन पर एक उपन्यास  प्रकाशनाधीन है।
      'मुग़ल-मेवाड़ संघर्ष' को 'साम्राज्यवाद के खिलाफ जनयुद्ध'  के रूप में वर्णित कर ग्रन्थ की रचना उत्तमोत्तम बनाने का प्रयास लेखक ने किया है।  अनगिनत संघर्षों के इतिहास की बखान करते समय संयत तथा मर्यादित भाषा का प्रयोग लेखक ने किया है। प्रताप  की युद्धकुशलता और सामरिक रणनीति का  अत्यंत सटीक- समर्पक भाषा में वर्णन तो किया ही है लेकिन साथ-साथ प्रताप की दूरदर्शिता , प्रजावत्सलता , सादगी , धर्मनिरपेक्षता, मानवतावादी दृष्टिकोण और प्रशासनिक गुण आदि पहलुओं पर भी सोदाहरण प्रकाश डाला है।
      प्रस्तुत ग्रन्थ का आमुख  मेवाड़ के लिए हर पीढ़ी में शत्रु से लोहा लेकर प्राणोत्सर्ग करनेवाले वीर झाला मान के वंशज तथा महाराणा मेवाड़ परिवार के अत्यंत करीबी और विश्वसनीय व्यक्तित्व श्री प्रतापसिंह झाला (तलावदा , उदयपुर) ने लिखी है।  लगभग २९ पृष्ठों की व्यापक आमुख (प्रस्तावना) में गुहिल --बाप्पा रावल के काल से अर्थात मेवाड़ राज्य की स्थापना से लेकर महाराणा प्रतापसिंह के काल तक विभिन्न ऐतिहासिक घटनाओं का संक्षेप में परामर्श लेकर कई तथ्यों का सप्रमाण पुष्टिकरण किया है। 
      ग्रन्थ में ४३ स्वतंत्र प्रकरण है जिनमे ४ सूचि है। ग्रन्थ की आकर्षक छपाई , निर्दोष मुद्रण और अंतरंग की रचना आदि के लिए नोशन प्रेस की टीम ने अंतर्राष्ट्रीय मानकों का अवलंब किया है।  ग्रन्थ में कुल ३३६ पृष्ट है तथा साइज़ 5.5 x 8.5  की है।  ग्रन्थ के मुखपृष्ठ का प्रकार पेपरबैक है तथा ग्लॉस लैमिनेटेड है।   ग्रन्थ के अंदर के पृष्ट 70 GSM Seshai NS प्रकार के है।  
     राष्ट्र में स्वाधीनता तथा सार्वभौमिकता को प्रेरणा निरंतर जीवित रखनेवाले महाराणा प्रतापसिंह जैसे अपराजित योद्धा की संघर्षमयी कहानी पाठक जरूर पढ़े।  यह मेरा विशेष सुझाव है।

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निवेदन

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"सती व जौहर "

"सती व जौहर"
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इस विषय पर मेरा यह लेख । मुझे लगता है यह आप सभी को अवश्य पढ़ना चाहिए ।

हर बार की तरह सरकार बदलते ही पहला कार्य होता है पाठ्यक्रम बदलना । चूंकि इस बार राज्य सरकार बदलने के बाद लोकसभा चुनाव थे इसलिए अब तक इस बारे में कोई चर्चा या बयानबाजी से नेता बचते रहे अब शिक्षा मंत्रीजी का कुछ बयान आया है । 8 वीं कक्षा की पुस्तक के मुख्य पृष्ठ से जौहर का चित्र हटाने की चर्चा है । चाहे आप इसके पक्ष में हों या विपक्ष में, चाहे किसी भी पार्टी के समर्थक हों आप यह लेख अवश्य पढ़े । यह केवल एक निष्पक्ष लेख है जो आपको जानकारी उपलब्ध करवायेगा ।

सर्वप्रथम सतीयों को नमन । हर विषय की भांति इस पर भी राजनीतिक व सामाजिक वातावरण में हलचल अवश्य होगी तो हर विषय की भांति इस विषय पर भी जौहर के गौरवपूर्ण इतिहास के विरोध में लिखने व बोलने वाले बुद्दिजीवी भी कुकरमुते की तरह उग आएंगे ।

कुछ लोग सतीयों के खिलाफ लिखेंगे तो कुछ जौहर के खिलाफ जहर उगलेंगे । सबसे पहले तो आपको सती के आगे प्रथा शब्द लगाने से पहले 'प्रथा' का आश्य समझना होगा । प्रथा का मतलब है कोई भी ऐसा कार्य जो किसी जाती, धर्म या वर्ग के सभी या अधिकतर लोगों द्वारा किया जाता है । जैसे दहेज एक प्रथा है क्योंकि लगभग हर व्यक्ति इससे ग्रस्त है, इसके अलावा तीन तलाक, मृत्युभोज, घुंघट, पर्दा आदि को प्रथाओं कि श्रेणी में रखा जा सकता है क्योंकि इससे एक वर्ग विशेष के लगभग सभी लोग ग्रस्त थे या हैं । ये कुप्रथाएं हैं या नहीं वो अलग विषय है ।

अब जब आपको ये समझ आ गया कि प्रथा क्या होती है तो सती के आगे प्रथा लगाने से पहले अपने परिवार जाति या धर्म का इतिहास उठाकर देखें कि अब तक कितनी औरतें पति की मृत्यु पर सती हुई हैं ? क्या वो संख्या भी उतनी ही है जितनी दहेज, तीन तलाक, मृत्युभोज, घुंघट, पर्दा आदि से ग्रस्त लोगों की है ? जब हम राजस्थान का इतिहास देखते हैं तो पाते हैं कि एक पुरे गांव का इतिहास खंगालने पर व 15-20 पीढ़ी में कोई 1-2 सती हुई है । यानी किसी भी समय सती होना प्रत्येक स्त्री पर अनिवार्य या बाध्यता नहीं रही ।

वो एक समर्पण था, उच्च कोटी का समर्पण जिसे मापने कि क्षमता ना आपकी कलम में है ना ही आपकी वाणी में । वो एक पवित्रता का अनुपम उदाहरण था । वो एक पति व पत्नि के बीच के प्रेम का अनुपम उदाहरण था ।

ऐसा भी नहीं है कि सती केवल क्षत्राणियां ही हुई हैं । हर जाति समुदाय में हुई हैं जैसे उदाहरण स्वरूप झुंझुनू में जो राणी सती (जिन्हें दादी सती भी कहा जाता है) का मन्दिर है वो सती माता अपने पति तनधनदास अग्रवाल के साथ सती हुई थी । अलवर में नाई जाति की महिला नारायणी देवी अपने पति के साथ सती हुई थी, जिसे वर्तमान में मुख्य रूप से मीणा जाति के लोगों द्वारा पूजा जाता है, इसी प्रकार सीकर राणी सती जी भी गैर क्षत्रिय है । ये ऐसे 2-3 नहीं अनेक उदाहरण हैं गैर क्षत्रिय सतीयों के । यानी ना यह किसी जाति आधारित परम्परा थी ना ही किसी महिला के लिए बाध्यकारी ।

आपने व हमने किताबों में सतीप्रथा के विरूद्द जिस राजाराममोहन राय के आंदोलन को पढा है वो कभी इस विषय में राजस्थान नहीं आए, ना ही उन्होंने यहां कि सतीयों के बारे में कोई अध्ययन किया या वकतव्य दिया । हो सकता है उनके बंगाल में ये कोई प्रथा रही हो लेकिन बंगाल के आधार पर राजस्थान के सांस्कृतिक मूल्यों का आंकलन करना वैसा ही है जैसा पृथ्वी के आधार पर मंगल ग्रह के बारे में कोई धारणा बनाना । इसलिए सर्वप्रथम तो सती के आगे प्रथा लगाना बंद करे ।

लेकिन चूंकि वर्तमान में इसपर सरकारी कानून है इसलिए उसका सम्मान किया जाना चाहिए व सती महिमामंडन नहीं किया जाना चाहिए लेकिन अपने घरों में चुपचाप बैठे लोगों की आस्था को बार बार चोट पहुंचाना भी तो ठीक नहीं है, कभी फिल्म के समर्थन के नाम पर कभी किसी और नाम पर ।

अब यदि बात करें जौहर की तो सती व जौहर को एक ना समझें दोनों बेहद ज्यादा अलग हैं । सती केवल पति की मृत्यु के बाद हुआ करती हैं लेकिन अमुमन जौहर मृत्यु से पहले यानी क्षत्रियों के केसरीया करने से पहले हुए हैं । हां कुछ जौहर मृत्यु के बाद भी हुए हैं जब समाचार मिले कि सभी क्षत्रिय युद्द में वीरगती को प्राप्त हुए और शत्रु कि सेना दुर्ग कि ओर आ रही है ।

ऐसे कई उदाहरण हैं जो जीवित रहते सती हुई हैं जैसे बाला सती रूप कंवर । चूंकि मैं स्वयं क्षत्रिय हूं तो आप मेरी बात पर विश्वाश ना करें तो आप भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद के जीवन का अध्ययन करें आपको एक दो जगह नहीं कई जगह बाला सतीजी के वृतांतो का उल्लेख मिलेगा । अब यदि जौहर कि बात करें तो जौहर जीवित रहते हुए नहीं हो सकता ।

सती पति के प्रति समर्पण का प्रतिक है तो जौहर देशभक्ति कि उच्चतम कसौटी । लेकिन अब फिर जब बहस छिडे़गी तो लोग पद्मावत फिल्म की भांति कहेंगे जिन्होंने जौहर किया उनके बारे में क्यों पढा़या जाये, जौहर करने से अच्छा तो वो युद्द करती कुछ शत्रुओं को मारकर मरती फिर तो उन्हें ये भी कहना चाहिए कि गांधीजी को अनशन कि बजाय अंग्रेजों से युद्द करना चाहिए था कुछ को तो मारते ही इसलिए फिर तो गांधीजी को भी पाठ्यक्रम से हटा दिया जाए । अन्ना को भी अनशन कि बजाय भ्रष्टाचारियों को मारना चाहिए था ।

मतलब साफ है हर काल समय के अनुसार समाज की मांग व समाज को प्रेरित किए जाने वाले उदाहरण बदल जाते हैं । जैसे आज तलवार बाजी से प्रेरित नहीं किया जा सकता लेकिन किसी समय किया जा सकता था । इसी तरह किसी समय जौहर वो अनुपम देशभक्ति का कार्य था जो आने वाली सैंकडो़ पीढ़ियों को संदेश दे सके ।

वर्तमान में कुछ लोग कहते हैं सती कोई नहीं होती थी उन्हें जबरन जलाया जाता था तो वो लोग अपने पापा या दादोसा कि उम्र के उस व्यक्ति से पुछें जिन्होंने 1987 में रूप कंवर (दिवराला, सीकर) या 1957 में उगम कंवर (तालियाना, जालौर) को या किन्हीं अन्य को पति के साथ सती होते अपनी नग्न आंखो से देखा हो (सभी जाती धर्म के लाखों लोग वहां मौजूद थे) । और यदि आप इसे आत्महत्या मानते हो तो फिर तो जैन धर्म के संतो द्वारा उपवास से प्राण त्यागना (संथारा) व बौध धर्म के संतो द्वारा भी इच्छा से प्राण त्यागना, आत्मदाह करना व सनातन धर्म के कई संतो द्वारा समाधी ली जाना भी आपकी नजरों में आत्महत्या ही हुई । इसलिए हर जगह बुद्धिजीवीता घुसाने की बजाय थोड़ा विचार भी अवश्य कर लेना चाहिए ।

इसलिए मैं तो यही कहना चाहूंगा कि ये सब बकवास जो आप लोग सोशल मिडीया पर आधुनिकता के नाम पर करते हो इससे अाप केवल अपने पुर्वाग्रहों के आधार पर अपने ज्ञान का नाश कर रहे हो इससे ज्यादा कुछ नहीं ।

इस लेख को पढकर क्षत्रिय बंधु भी ज्यादा प्रश्न ना हों वर्तमान में यह वर्ण (क्षत्रिय) सती, झुंझार, संत, महात्माओं व महापुरूषों के बताए मार्ग को छोड़ चूका है और उसी का प्रमाण है कि वर्तमान में क्षत्रिय किसी वार्ड के वार्ड पंच बनकर उस वार्ड कि जनता को भी पांच वर्ष तक खुश नहीं रख पाते । राज्य या देश तो बहुत बडी़बात हो गई ।

अंत में सरकार से निवेदन है कि उन्हें जो उचित लगे वो करें क्योंकि जनता ने उन्हें यह अधिकार दिया है लेकिन बार बार यूं आस्था पर चोट ना करें साथ ही सती व जौहर पर गलत लिखने वाले भाईयों से निवेदन है वो जरा निष्पक्षता से अध्ययन करें व क्षत्रिय भाईयों से निवेदन है कि जन्म से ही नहीं कर्म से भी क्षत्रिय बनने कि कोशिश करें । केवल वंशावलियों से ही नहीं कर्मों से भी राम व कृष्ण की संतान होने का बोध कराएं । अन्यथा कोई औचित्य नहीं है आपकी इन वंशावलियों का ।

सभी की प्रतिक्रियाएं केवल सभ्य भाषा में ही आमंत्रित है ।

- कुंवर अवधेश शेखावत (धमोरा)





पूर्व राष्ट्रपति महामहिम श्रीमती प्रतिभाताई पाटिल के साथ आत्मीय मुलाकात !










कडुवी बात पार्ट :३ "मुझे डर है कही मैं असहिष्णु ना कहलाऊ !"

  आज उत्तरप्रदेश के सैफई में समाजवाद के वर्तमान संरक्षक आदरणीय नेताजी श्री मुलायमसिंहजी का जन्मदिन बड़े ही शानो-शौकत के साथ मनाया गया। सैफई में विशेष महोत्सव का आयोजन किया गया। लगभग ७० लाख रुपये के फूल मंगवाए गए ; कानपुर से १५ क्विंटल बनारसी लड्डू मंगवाए गए ; ७७ किलो का केक बनवाया गया ; २.५ करोड़ की लागत से खास मंच बनवाया गया। नृत्य ,संगीत और रोशनाई से सारा सैफई झगमगा उठा ! अतिविशिष्ट अतिथियों के लिए आलिशान होटलों के ५०० से ज्यादा कमरे आरक्षित किये गए। उत्तर प्रदेश की सरकार स्वयं इस महोत्सव के आयोजन-नियोजन में सैफई में मौजूद रही। मध्ययुग में किसी राजा -महाराजा ने भी अपना जन्मदिन इतनी धूमधाम से मनाया नहीं होगा। मै भी आदरणीय नेताजी को जन्मदिन की शुभकामनाएं देता हु। नेताजी के जन्मदिन का जलसा देख मुझे जलन नहीं हो रही है। लेकिन मै अस्वस्थ जरूर हु। मुझे समाजवाद ने रातभर सोने नहीं दिया। राममनोहर लोहिया ;जयप्रकाश नारायण ; लोकनायक बापूजी अणे जैसे समाजवाद के दिवंगत पुरोधा मुझे सोने नहीं दे रहे थे। वे मुझे लगातार पूछ रहे थे की क्या तुम समाजवाद के वर्तमान रूप से खुश हो ? क्या तुम ने इसी समाजवाद का अध्ययन किया था ? … अतीत के महान लोग मुझे सवाल कर रहे थे। मै भला उनको क्या जबाब देता ? स्वयं राम मनोहर लोहिया जी मेरे सामने खड़े थे , मैं हड़बड़ा गया था। मैं सिर्फ हां या ना सूचक वृत्ति से अपना सर हिला रहा था। मेरे मन की भावना जानकर वे अदृश्य हो गए। अपना टी व्ही शुरू किया। सैफई महोत्सव के बारे में इंटरनेट से ज्यादा जानकारियाँ प्राप्त की। मैं सोच में डूब गया। सैफई का स्वर्ग से भी सुन्दर वैभव देखकर बार बार अतीत के त्यागी समाजवादी दिख रहे थे।
ए आर रहमान के संगीत की धुन पर नांच रहे बॉलीवुड के कलाकारों का जोश देखकर मैं अपना होश खो बैठा। संगीत की धुन पर सुन्दर सुन्दर ललनाएँ अपने अनुपम चित्ताकर्षक नृत्याविष्कार का विलोभनीय प्रदर्शन दर्शकों को इसी जन्म में रंभा --उर्वशी का साक्षात्कार दिलवा रही थी। समाजवाद के तमाम सैनिक झूम रहे थे। मानो समाजवाद ने अपने उगम से लेकर आजतक के सफर में जो ऊँचाई हासिल की इसी ख़ुशी में यह आयोजन हुवा हो। ऐसा प्रतीत होने लगा की अब देश में ''सब बराबर '' हो गए ; विषमता की समाप्ती हो गयी; देश में सभी वर्गों तक विकास की गंगा पहुँच गयी। ध्येयपथ की ओर चलते चलते अपने संघर्ष भरे कर्तव्य की इतिश्री देखकर तमाम समाजवादियों को कृतकृत्य होना स्वाभाविक है। देश भर से विभिन्न दलों के नेता आदरणीय नेताजी को बधाईयाँ देने सैफई पहुँचे। उत्तर प्रदेश के विभिन्न इलाखों से समाजवादी सैनिक सैफई पहुँचे। नेताजी की एक झलक पाकर --अपनी बधाईयाँ देकर कृतकृत्य हो गए। समाजवाद भी ख़ुशी से झूम रहा था। बार बार मेरी ओर देख रहा था। दिवंगत नेताओं को मैं बता रहा था की आपके जमाने के समाजवाद से आज के समाजवाद ने काफी तरक्की कर ली है। आप तो घर में बनी रोटी साथ लेकर ;खादी के उबड़-खाबड़ कपडे पहनकर ;कभी पैदल या कभी जनता गाडी की सवारी कर अपनी लड़ाईया लड़ रहे थे लेकिन आज देखो आप ही द्वारा बोया गया समाजवाद हवा-हवाई का अत्यानन्द ले रहा है। आपको तो समाजवाद की तरक्की देखकर खुश होना चाहिए। दिवंगत नेता मेरी ओर क्रुद्ध होकर देखने लगे। मुझे डाँटने लगे। मैं फिर एकबार घबरा गया ;हड़बड़ा गया। मैंने उन्हें कहा की, '' ना तो मैं समाजवादी पार्टी का कार्यकर्ता हु और ना ही किसी राजनितिक दल से जुड़ा हुवा। मैं तो एक साधारण अध्यापक हु जो बच्चों को समाजवाद से परिचित करवाता हूँ। 'मेरा उत्तर सुनकर दिवंगत नेता खुश हो गए लेकिन उन्होंने आदेश दिया की इसपर लिखो। दुनिया को बतावो की समाजवाद का असली स्वरुप क्या है ? मैंने उन्हें समझाया की जनता को तो सब पता है। जब राजेश खन्ना की ''रोटी'' फिल्म आयी थी ,तभी से देश की पब्लिक सबकुछ जानने लगी है। इस अकेले जयपाल सर के चिल्लाने से क्या फायदा ? हमारे आभासी संवाद को फिर एक बार विचलित किया आजतक के न्यूज हेड़लाईन ने : ब्रेकिंग न्यूज ---एक्सक्ल्यूसिव खबर के नाम पर नेताजी श्रीमान मुलायमसिंह जी का मंतव्य प्रसारित किया जा रहा था। नेताजी काफी भावुक थे , उत्तरप्रदेश तथा देश के कोने कोने से सैफई में उपस्थित तमाम हितचिंतकों को उन्होंने धन्यवाद दिया। जो सन्मान मिला उसके लिए धन्यवाद अर्जित कर उम्र के ७६ साल पार कर चुके नेताजी बोले की अब युवाओं को रोजगार देने के लिए हमें काम करना है। कोई भूखा ना रहे इसलिए मिलकर हाथ बढ़ाना है। नेताजी बोल ही रहे थे अचानक किसी का मोबाईल खनक उठा ,रिंगटोन भी सुन्दर थी ,समाजवाद के बिलकुल अनुरूप ! ''साथी हाथ बढ़ाना ; एक अकेला थक जाएगा ----" उस रिंगटोन ने मेरा ध्यान आकर्षित किया लेकिन सैफई के स्टेज पर बॉलीवुड के डी जे ध्वनि का आवाज इतना बढ़ गया की उस आवज ने ''साथी हाथ बढ़ाना ---'' के आवाज को दबा दिया। दिवंगत नेता बार बार कह रहे थे ,मेरी ख़ामोशी को धिक्कार रहे थे। मैं तो अपने मौन पर फिर एकबार कायम हो गया। आखिर में तीनो दिवंगत नेताओं ने मुझे कान में पूछा : " जयपाल ;तुम्हारी ख़ामोशी का राज क्या है ?" मैंने तुरंत जबाब दिया : "मैं खामोश हु क्यों की मुझे डर है कही मैं भी असहिष्णु ना कहलाऊ !" मेरा जबाब सुनकर वे फिर अदृश्य हो गए !----

लेखक : जयपालसिंह विक्रमसिंह गिरासे ,शिरपुर ९४२२७८८७४०
jaypalg@gmail.com

सफर:-" मेवाड़ से खानदेश तक ....".--ठा . जयपालसिंह गिरासे [सिसोदिया],शिरपूर




इ.स.१३०३  का समय : भारतवर्ष का मुकुटमणि दुर्गराज चित्तोड़ विदेशी आक्रांता अलाउद्दीन ख़िलजी के आक्रमण से झुंज रहा था। गढ़ के नीचे ख़िलजी ने जुल्म के कहर ढहाये हुए थे। परिणामत: युद्ध अटल था। महाराणी पद्मिनी ने १३००० स्रियों के साथ जौहर ज्वाला मे अपने आप को समर्पित कर दिया। जौहर ज्वाला मे जलती सतियों की कसम खाकर मेवाड़ के विरो ने  केसरिया धारण कर दुर्ग के किवाड़ खोल दिये और ख़िलजी की सेना पर भूंखे शेरों की तरह टूट पड़े। भीषण युद्ध हुवा। आत्मगौरव की रक्षा के लिये क्षत्रियो ने लहू की होली खेली। देखते देखते अपनी आन-बाण एवं शान की रक्षा के लिये मेवाड़ के वीर बलिवेदी पर चढ़ गये। गढ़ के बाहर कस्बो मे या जागीरों मे जो राजपूत बचे थे वे अपने धर्म तथा स्वाभिमान को बचने के लिये अन्यत्र सुरक्षित स्थानों पर निकल गये। इन्ही बचे हुए क्षत्रियों के २४ कुल रावल अभयसिंहजी के नेतृत्व मे मांडू की ओर चले गये। उन्हीं के सुपुत्र रावल अजयसिंहजी ने दौडाइचा मे अमरावती नदी के किनारे सं १३३३ मे अपनी जागीर कायम की. वहा उन्होने एक छोटासा किला  भी बनवाया जिसे स्थानिक लोग गढी कह कर पुकारते  है। उन्हे दो पुत्र थे। झुंजारसिंह और बलबहादूर सिंह। ई स १४५५ मे छोटे पुत्र बलबहादूरसिंह ने मालपुर मे दरबारगढ़ नामक किला बनवाया और वहा अपना स्वतंत्रराज स्थापित किया। दौडाइचा सरकार की हुकूमत ५२ गावों मे थी। मालपुर के रावल सरकार की हुकूमत भम्भागिरि [भामेर] तक थी। मालपुर मे जा बसे सिसोदिया परिवार के लोगोने १३ गाव बसाये जिनमे वैन्दाना; सुराय ;रामी; पथारे; वणी;धावड़े ;खर्दे आदि गाव प्रमुख थे.....इन्ही गावों मे से कई परिवार ओसर्ली;कोपरली; टाक़रखेड़ा;वाठोडा ;अहिल्यापुर ; पलाशनेर; होलनांथा; भवाले; विरवाडे आदि गावों मे बस गये। वहा उन्होने खेती और जमींदारी की वृद्धि की। 

      सूरत विजय के बाद लौट रहे छत्रपति शिवाजी  महाराज की फ़ौज का स्वागत दरबारगढ़ नरेश रावल रामसिंहजी ने किया था। औरंगज़ेब की मृत्यु के बाद दक्षिण मे लौटते युवराज शाहू महाराज और रानी येसुबाई जी को दक्षिण मे सुरक्षित पहुचाने की जिम्मेदारी मालपुर दरबारगढ़ के रावल सरकार ने उठाई थी। जिन्हे छत्रपति शाहूजी ने कोल्हापुर दरबार मे बुलाकर सन्मानित किया था और सनद बहाल की थी। शाहआलम के वक़्त भी लामकानी के रावल मोहन सिंह ने मुघलों से लोहा लिया था और खानदेश से मुघल टुकड़ियों को भगाया था।

     इसी काल मे दुर्जनसिंह रावल [जो महालकरी थे उन्हे महाला कहा  जाता था ] ने बुराई नदी के किनारे धावा बोला। वहा के कोली शासक को परास्त कर वहा अपना शासन शुरू किया। वहा नदी के किनारे विजयगढ़ नामक गढी बनाई और पाटन नाम का गाव बसाया। जहा मा आशापुरा का प्रसिद्ध मंदिर है।  इनकी ५५ गावों मे जहागीर थी और वंशविस्तार हुवा। जिनमे शिन्दखेड़ा; आलने;खलाने ;चिमठाने; दरने; रोहाणे ; तावखेड़ा; अमराला ; देगाव; लामकानी; कढरे; रामी; बलसाने ; वरुल ; घुसरे; शेवाले ; धूरखेड़ा आदि प्रमुख है।  

    १३३२ मे चावंडिया राजपूत अमरसिंह ने सातपुड़ा के घने जंगलों मे स्थित प्राचीन स्थल तोरणमाल पर कब्जा किया। महाभारत के समय यहा के राजा युवनाक्ष ने पांडवो की ओर से युद्ध मे हिस्सा लिया था और विजनवास के समय पांडवो ने यहा कुछ समय बिताया भी था। इसी वंश के रावल फतेहसिंह ने मांजरा नाम के ग्राम की स्थापना की और १३ गावों मे बस्ती बसाई। उसी काल मे सोलंखी सरदार [जो इशी नाम से जाने जाते थे] रावल सुजानसिंह ने अपनी सेना द्वारा सुवर्णगिरि पर हमला किया और वहा अपना शासन आरंभ किया। उन्ही के वंशज केसरीसिंह के बेटे मोहनसिंह ने तोरखेड़ा गढ़ी की स्थापना की और लगभग २२५ गावों मे अपना वर्चस्व स्थापित किया। उन्होने ही कोंढावल गाव बसाकर वहा एक क़िलेनुमा कोट बनवाया।  इनके परिवार के लोग तरहाड; भटाने; रंजाने; धमाने; विरदेल; बिलाडी;जसाने; कमखेड़ा ; आछी; कोटली ;हिसपुर; तावखेड़ा; डोंगरगाव आदि गावों मे जा बसे।  इसी वंश के धवलसिंह के पुत्र मदनसिंह ने  स्थानीय शासक सोना कोली को परास्त कर  कोडिड के जंगलों मे अपनी गढ़ी बनाई। कोडिड; वणावल; उपरपिंड; रुदावली; गिधाडे; आरावे; वाडी आदि गावों मे अपना वतन बनाया। इसी परिवार के विजयसिंह नांदरखेड़ा मे गये। जिनके वंशज कनकसिंह ने लांबोला गाव मे अपनी जागीर की स्थापना की। १३३२ के मध्य मे तंवर परिवार के रावल संग्रामसिंह ने नंदुरबार पर हमला किया और वहा के गवली शासक को परास्त कर अपना शासन कायम किया। उन्ही के वंशज जयसिंह ने भोंगरा गाव बसाकर सारंगखेडा [तापी के किनारे] मे अपनी जागीर की स्थापना की। जिनका सारंगखेडा;असलोद्; गोगापुर तक विस्तार रहा। 

   करौली के जादौन परिवार भी मेवाड़ की सेवा मे थे। वे भी अपने साथियों के साथ दक्षिण की ओर निकले। सूरतसिंह जादौन के वंशज विजयसिंह ने वर्तमान महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश की सीमा पर स्थित सातपुड़ा की तलहटी मे पलासनेर नाम के गाव की स्थापना की।वहा उन्होने अपनी गढ़ी बनाई। पलाश वृक्ष का घना जंगल होने की वजह से उसका नाम पलासनेर हुवा। वहा से एक परिवार बभलाज़ मे जा बसा और वहा अपनी जागीर स्थापित की। उन्ही के वंशजो ने १६५२ मे सूर्यकान्या तापी नदी के किनारे थालनेर गाव मे जागीर प्राप्त की।  थालनेर फारूकी राज्य की राजधानी रही थी।  वहा उन्हे जामदार का किताब दिया गया।  वहा से कुछ्  परिवारोने १७०२ मे आमोदा गाव की स्थापना की। वहा उन्हे मराठा शासन काल मे देशमुख पदवी प्राप्त हुई। यहा से खानदेश के ३२ गावों मे जादौन परिवार जा बसे जिनमे तंवर की वडली; विकवेल; जैतपुर; पिंपरी; विरवादे; होलनांथा; हुम्बरडे; मलाने; भोरखेड़ा ;पथारे; रामी; सावलदा आदि प्रमुख गाव है।

    मालवा से कुछ परमार परिवार भी खानदेश मे आ बसे। वे मांडू--धार होकर तापी के किनारे शेंदनी नाम के ग्राम की स्थापना की जहा क़िलेनुमा दो बड़ी हवेलिया बनवाई। यहा से कुछ परिवार भोरख़ेड़ा और भावेर गाव मे जा बसे जिनके कुछ वंशज होलनांथा और पथारे गाव मे बस गये। इन प्रमुख घरानों के साथ तंवर परिवार भी खानदेश की ओर आकृष्ट हुये। जिन्होने वडली नाम का  गाव बसाया। होलकर शासन के समय महारानी अहिल्या देवी ने  अहिल्यापुर नाम का गाव बसाया और वहा का जिम्मा वडली के तंवर परिवार को सौपा गया। कुछ तंवर बागलान की ओर जा बसे। मालेगाव के पास कुछ गावों मे तंवर राजपूत बस्ते है। मेवाड़ से खानदेश मे आये निकुम्भ राजपुतोने शहादा तहसील मे पांच गाव बसाये.....येंडाइत परिवारो ने जलगाव  जिले मे नगरदेवला; चिचखेड़ा  आदि पांच गावों मे बस्ती बसाई। चौहानो ने भी धामनोड ,निवाली के परिसर मे अपनी बस्ती बसाई[जो वर्तमान म प्र मे है]।  बागुल बेटावद मे जा बसे। कुंडाने , हारेश्वर पिंपलगाव मे बघेल जा बसे जो आज वाघ नाम से जाने जाते है। मौर्य कुल के ४ गाव नांदरखेड़ा के साथ साथ बसाये गये। सूर्यवंशियो ने जावदा ग्राम बसवाया। सनेर वाघाला मे ; रावा मेहरगाव मे ; गांगुला चालीसगाव  और तांदूळवाड़ी में ; सिंगा सजदा में  बसे। कुछ सिसोदिया परिवार जलगाव जिले के यावल में बसे जहाँ उन्होंने छोटी सी गढ़ी भी बनवाई थी! मराठा शासन के उत्तरकाल में पेशवा के एक सरदार ने उनके वतन को छीन लिया था !

    मेवाड़ के सिसोदिया राजवंश से एक राजकुमार ने मध्ययुगीन काल में वर्तमान बड़वानी राज्य  की स्थापना की थी।  और उस राज्य की सीमा भी दक्षिण में खानदेश तक थी। इस काल में मुस्लिम आक्रमण की वजह से भी इस प्रदेश से कई परिवार विस्थापित  होकर निमाड़ ; खानदेश; विदर्भ आदि क्षेत्रों में चले गए थे। 

   आज के बुरहानपुर के निकट स्थित आसिर गढ़ पर मेवाड़ से पधारे  चौहानों का वर्चस्व था। ख़िलजी के आक्रमण बाद चित्त्तोड़ से ही पधारे हुए शूरवीर टांक पंवार राजपूतो ने अपना वर्चस्व स्थापित कर दिया था। जब चित्तोड़ पर आक्रमण होते थे तब टांक पंवार राजपूतो ने अपनी वीरता का अनुपम परिचय दिया था। ख़िलजी के आक्रमण के बाद टांक पंवार मेवाड़ से निकलकर मालवा, खानदेश, निमाड़ आदि क्षेत्रों मे चले गये थे। इन्ही के कुछ वंशजो ने ऐतिहासिक मराठा-अब्दाली पानीपत युद्ध मे भी हिस्सा लिया था। 

ख़िलजी के दक्षिण आक्रमण के बाद आसीरगढ़ का क़िला पंवारों के हाथों से छीन लिया गया था। 

ख़िलजी के गुजरात आक्रमण के वक़्त राजा करनदेव वाघेला दक्षिण मे देवगिरि की शरण मे आया। लेकिन राजा रामदेव राय की हार के बाद और उसे ख़िलजी द्वारा गुजरात मे एक जागीर बहाल किये जाने के बाद करनदेव वाघेला अपने अनुचरों के साथ महाराष्ट्रा के बाग़लन;खानदेश तथा सातपुड़ा के तटवर्ती इलाखों मे बस गये थे। अकबर के आक्रमण के वक़्त खानदेश के स्थानीय शासकों को अपनी ओर मिला दिया जाये और उनकी सेवाये ली जाये ऐसा फरमान उसने निकला था लेकिन खानदेश के स्थानीय निवासियों ने कोई प्रतिसाद नहीं दिया। खानदेश के शासक ज्यादा सुरक्षित इसलिये थे क्योंकि उत्तर से दक्षिण की ओर जाने वाले मार्गों पर उनका नियंत्रण था तथा यहा की प्राकृतिक व्यवस्था उनका बचाव करने मे पूर्णता: सक्षम थी।
   खानदेश प्रांत को साड़े बारा रावलों का वतन भी कहा जाता है। बारा पूर्ण तथा एक आधे ठिकाने का समावेश इसमे होता था। 
खानदेश के साड़े बारा ठिकाने निम्ननिर्दिष्ट सुचीनुसार है :-
१] दोंडाईचा २] मालपुर ३] शिन्दखेड़ा ४]  आष्टे ५]सारंगखेडा ६] रंजाने ७] लांबोला ८] लामकानी ९] चौगाव १०] हाटमोहिदा ११] वनावल १२] मांज़रे १३] करवंद [आधा वतन खानदेश मे था और आधा खानदेश के बाहर] 

   ज्यादातर बैस ; बडगुजर ; गौड़ ;भारद्वाज ; सोलंखी; खींची राजपूत महाराजा छत्रसाल के समय में दक्षिण तथा मध्य महाराष्ट्र में स्थायी रूप  से निवास करने लगे थे। वे मालवा --बुंदेलखंड --विदर्भ होते हुए दक्षिण भारत तक का सफर कर आये थे। वे संघटित रूप में रहते थे।  ऐतिहासिक खर्डा  युद्ध में उन्होंने मराठा पक्ष  का साथ देकर हैदराबाद निजाम के खिलाफ मोर्चा संभालकर बहादुरी दिखाई थी। इनके कई वंशज पुणे ; कोंकण; बीड ; नांदेड ;उस्मानाबाद   क्षेत्र में है।  वीर बन्दा  बहादुर के साथ कुछ राजपूत नांदेड के प्रान्त में आये थे।  वे यही बस गए थे। विदर्भ में गाविलगढ़ की किलेदारी भी किसी राजपूत के पास थी।  तो कुछ उत्तर भारत के राजपूत मुग़ल आक्रमण के वक़्त दक्षिण की और आकर यही बस गए थे। जो ज्यादातर विदर्भ; मध्य  तथा दक्षिण महाराष्ट्र में स्थायी हुए।  उन्हें स्थानीय निवासी परदेशी कह पुकारते थे।  मांडू के कुछ परमार चावंडिया परिवारों के साथ खानदेश मे आये थे उनमे से एक परिवार ने प्रतापपुर नाम की छोटी जागीर बनाई। राणा उनकी उपाधी रही। वडली  के तंवरो ने होल्कर स्टेट का खजाना लूटा था।
 कुछ परिवार गुजरात में स्थित सिद्धपुर , धर्मपुर ,वांसदा तथा मालवा स्थित बरवानी स्टेट से स्थानांतरीत होकर महाराष्ट्र कि भूमी में बस गए थे ….। 
  मेवाड़ के वंश से श्री चन्‍द्रकिरण जी जिन्होने युवा अवस्था  मे ही सन्यास ग्रहण कर लिया था ; जलगाव के पास कानलदा नाम के गाव मे आये जहा कण्व ऋषि का प्राचीन आश्रम था। स्वामी श्री चन्द्रकिरणजी तपोवनमजी ने उस आश्रम का जीर्णोद्धार किया और वही सन्यस्त जीवन बिताया था।

  आजादी के आंदोलन मे खानदेश के राजपूतो ने बढ़-चढकर हिस्सा लिया था। महात्मा गाँधीजी तथा विर सावरकरजी ने मालपुर के दरबारगढ़ को भेट दी थी। टाकरखेड़ा के गुलाबसिंह भिलेसिंह सिसोदिया हिन्दू महासभा के प्रतिनिधि के रूप मे अंग्रेज़ कॅबिनेट मे चुनकर आये थे। जो सावरकर के खास साथी थे।   सुराय के पद्मसिंह सिसोदिया हेडगेवारजी तथा गोलवलकर गुरुजी के नजदीकी थे। सन १९३६ में महाराष्ट्र के फैजपूर में कॉंग्रेस का ऐतिहासिक अधिवेशन संपन्न हुवा था जिसमे पंडित जवाहरलाल नेहरूजी , महात्मा गांधीजी सहित देश के गणमान्य अथितियो ने शिरकत कि थी ----बारीश हो रही थी और ध्वजारोहण के मौके पर ध्वज अटक गया था ---कई लोगो ने ध्वज स्तंभ पर चढने का प्रयास भी किया लेकिन उनके सारे प्रयास व्यर्थ साबित हुए ---उस वक्त शिरपूर के एक राजपूत युवक ने जिन्हे बंदा पाटील कहकर पुकारते थे ---ध्वज स्तंभ पर चढाई कर ध्वज कि गांठ को मुक्त कराया ---सारा माहोल अचंभित हो गया था उनके साहस को देखकर ---खुद पंडित जी ने उनका सन्मान किया था ---.राजपूतो ने गाव तथा खेती ,व्यापार का विकास किया। अपने साथ कई जातियों का वे सहारा बने थे। स्वर्गीय सोनुसिंहजी धनसिंहजी भूतपूर्व केन्द्रीय गृहराज्यमंत्री थे। श्रीमती प्रतिभाताई पाटील जी ने तो देश का सर्वोच्च स्थान महामहिम राष्ट्रपति के रूप मे प्राप्त किया था। दोंडाइचा के भूतपूर्व संस्थानिक तथा विधायक दिवंगत श्रीमान जयसिंहजी रावल साहब ने आशिया का पहला स्टार्च प्रॉजेक्ट शुरू किया जो हजारो लोगोंको  आजभी रोजगार दे रहा है। उन्होने  यहा स्कूल; उद्योग शुरू किये और लोगों को रोजगार दिलवाये। आपके पुत्र श्रीमान बापूसाहेब जयदेवसिंहजी भी विधायक रहे तथा पोते कुंवर जयकुमार रावल विद्यमान भाजपा सेना सरकार में कैबिनेट मंत्री है जिन्हें पर्यटन, रोजगार मंत्रालय की जिम्मेदारी सौपी गयी है। स्व.इन्द्रसिंहजी सिसोदिया  तीन बार विधायक रहे। शिवसेना के आर.ओ तात्या ; जनता दल महेन्द्रसिंहजी;  कॉंग्रेस के दिलीपकुमार सानंदा भी विधायक रहे थे।  पाचोरा से श्री आर ओ पाटिल शिवसेना के विधायक थे ! अब की बार पाचोरा से उन्ही के भतीजे शिवसेना के श्री किशोरसिंह पाटील  भी वर्तमान विधायक है। उत्तमसिंह पंवार सांसद रह चुके है। नंदुरबार के श्री बटेसिंहजी तथा उनके सुपुत्र श्री चन्द्रकांतजी रघुवंशी महाराष्ट्र विधान परिषद के दो बार सदस्य रहे। कई भाई -बहन सरपंच ,पार्षद , नगराध्यक्ष ,जिला परिषद सदस्य , विभिन्न स्थानिक स्वराज्य संस्थाओ मे पदाधिकारी के रूप मे भी मौजूदगी बरकरार है …। 



खान्देश प्रदेश में ज्यादातर राजपूत ''गिरासे'' टाइटल का प्रयोग करते है। जिन्हे शासक द्वारा जमीन प्रदान की जाती थी और गिरासदार अपने क्षेत्र के  कुनबियों  द्वारा खेती किया करते थे वे गरासदार मतलब गिरासे कहलाये जाते थे। फारुकी ;मराठा; होलकर ;पेशवा आदि शासन समय में कुछ जादौन परिवारों को देशमुख; पाटिल; चौधरी; जामदार आदि खिताब प्रदान किये गए थे और उन्हें प्रांतीय तथा ग्रामीण प्रशासन में महत्वपूर्ण अंग माना  गया था। राज बदलते थे --तख़्त पलटते थे लेकिन इनके अधिकार को किसीने नहीं छिना। दिल्ली की ओर से या गुजरात की ओर से जब दक्षिण की और बड़े आक्रमण होते थे तब खान्देश  कि जनता को  काफी कष्ट झेलने पड़ते थे।  ऐसे कठिन समय में वे अपने परिवार तथा प्रजा के साथ सुरक्षित जंगलो में  चले जाते थे। कई राजपूत अपने भाईयों से बिछड़ गए वे सुदूर महाराष्ट्र के दक्षिण  कि ओर  चले गए। अपने गाँव ;स्वभाव ;मूलपुरुष के नामों  पर उनके परिवार पहचाने लगे।  

मध्य युग के इस संक्रमण काल में इस शूरवीर प्रजाति ने काफी संकटों का सामना  किया। उन्हें कई बार अपनी बस्तिया उजाड़कर नयी बस्तियों  का निर्माण करना पड़ा था.…। कई बार स्थलांतरित होना  पड़ा था। घने पहाड़ों का सहारा लेकर इन्होने अपने धर्म तथा वंश  को सुरक्षित रखा। इनके साथ अन्य जाती और जनजाति के लोग भी आये थे। उनकी सुरक्षा का जिम्मा भी इन परिवारों उठाया था।  अंग्रेज के वक़्त बार उपेक्षा भी झेलनी पड़ी थी। अकाल के समय में अंग्रेज हुकूमत द्वारा लगान जब जबरन वसूल की जाती थी तब दोनों पक्ष में संघर्ष अटल होता रहा था। कई बार बार अंग्रेज सरकार का खजाना लूट लिया जाता था या उनकी टुकड़ियों पर हमले  भी किये जाते थे। तब राजपूत को तथा तत्सम जनजातियों के लोगों को  अंग्रेज सरकार काफी तकलीफ भी देती थी।  बागियों को प्रताडा जाता था।  कई बार स्थानीय शासकों की वजह से ; अकाल; भुखमरी; पानी की किल्लत; सुरक्षा आदि कारणों से उन्हें विस्थापित भी होना पड़ा था।  समाज के  चुनिंदा लोगों के पास धन तथा बल था लेकिन बहुत बड़ा वर्ग काफी कष्टमय जीवन बिताता था।  

{C} लेखक: श्री जयपालसिंह विक्रमसिंह गिरासे [सिसोदिया] मूल ग्राम: वाठोडा 

पता : प्लॉट नं :५०; विद्याविहार कॉलोनी; शिरपुर जि: धुले [महाराष्ट्र]

संपर्क: ०९४२२७८८७४० 
ईमेल :jaypalg@gmail.com
[प्रस्तुत लेख श्री जयपालसिंह गिरासे की संशोधित बौद्धिक सम्पदा है और उनकी पूर्व अनुमति के बिना प्रकाशन तथा विनियोग कानूनन जुर्म है]