"राजा नहीं फकीर है; देश की तक़दीर है...!"

भूतपूर्व प्रधान मंत्री एवं  महान नेता दिवंगत श्री विश्वनाथ प्रताप सिंहजी ने अपने विचार एवं  कृतियों से एक मिसाल कायम की है! उन्हें समझने में कई आज भी कई  लोग असमर्थ रहे है !  संकीर्ण विचार या कृतियों से दूर रहकर एक राजा आधुनिक समय में अपनी प्रजा के लिए कैसे कदम उठा सकता है यह श्री वि.पि.सिंह ने कर दिखाया! हमारे साथी श्री डॉ (मेजर) हिमांशु सिंघजी श्री वि.पि.सिंह साहब के करीबी रहे है! उनके निधन के बाद डॉ.हिमांशु सिंह ने अखबारों में जो लेख लिखे थे उन्हें हम इस ब्लॉग पर अपने पाठकों के लिए पेश कर रहे है!



परिचय : संस्था एवं संस्थापक!

राजर्षि मधुसुदन दास जी महाराज जो कि सुविख्यात "निर्वाणी अखाड़े " के खालसा के "श्री महंत" है \उन्हें "सूक्ष्म ईश्वरीय चेतना "स्वर यह दिव्य निर्देश प्राप्त है कि इस ब्रह्माण्ड ,सृष्टि को विनाश यानि क्षय से बचाने के लिए ही क्षात्र-तत्त्व कि उत्पत्ति स्वयं श्री मन्न नारायण ने अपने ह्रदय से की है !

इस तत्त्व के उपासक को ही क्षत्रिय कहा जाता है !
हिमालय की कंदराओ में बैठ कर तपस्या को आतुर तत्कालीन क्षत्रिय समाज के प्रतीक अर्जुन को श्री कृष्ण के रूप में श्री हरि ने यह समझाया था कि "इश्वर द्वारा निर्धारित सहजं कर्म यानि जन्म के साथ उत्पन्न स्वधर्म को छोड़ कर यदि कोई मोक्ष के लिए अन्य रह खोजता है तो यह उसके द्वारा ईश्वरीय आदेश कि अवहेलना मात्र है !
जब सत्य और असत्य के मध्य ,न्याय और अन्याय के मध्य,अच्छाई और बुराई के मध्य,धर्मं और अधर्म के मध्य संघर्ष हो तब कोई तीर्थ या तपोभूमि नहीं बल्कि रणभूमि "धर्म-संग्राम स्थल" ही तपोभूमि होती है !
और आज तो पूरी मानव सभ्यता ,और सभी मानवीय मूल्यों का सर्वथा लोप हो चुका है और यह सम्पूर्ण सृष्टि महाविनाश के कगार पर खड़ी है !
यह इस बात को सिद्ध करने के लिए पर्याप्त है कि "आज क्षात्र-तत्त्व सुषुप्त हो चुका है! "
अत: इस क्षात्र-तत्त्व को जागृत करना आज की सबसे बड़ी और कठोर तपस्या है!
श्री कृष्ण की यह फटकार भी मिली कि "तुम कैसे भक्त हो जो अपने इष्ट के बताये रास्ते (गीता में ) "स्वधर्म पालन "को छोड़ अपने इष्ट से मिलन ,और मोक्ष के नितांत व्यक्तिगत स्वार्थ में पड़ गए हो ?" आज कि सर्वाधिक आवश्यकता है कि क्षत्रिय अपने धर्म का पालन करे क्योंकि जब क्षत्रिय अपने धर्म का पालन नहीं करता है तब मानव तो क्या देवता पशु-पक्षी और कीट-पतंग तक भी अपने सृष्टि-धर्म का पालन बंद कर देते है! जिसके परिणाम स्वरूप यह सारी सृष्टि महा-पतन की ओर बढ़ जाती है !
राजर्षि जी को मिले इस दिव्य निर्देश के बाद राजर्षि जी ने अपने शिष्यों के चुनिन्दा समूह को मंथन के लिए अपनी तपोभूमि में बुलाया!
और दो दिवसीय विचार विमर्ष के बाद "श्री क्षत्रिय वीर ज्योति' की स्थापना की!
नवम्बर २००७ में स्थापित इस संगठन का वास्तविक कार्य भारत के विभिन्न क्षेत्रो में फैले क्षत्रिय संगठनो के प्रतिनिधियों के मंथन -शिविर के समापन पर स्थापित क्षत्रिय-संसद के गठन के साथ गति पकड़ेगा !
इसके लिए सभी संगठनो को ८,९ और १० नवम्बर २०१० के दरम्यान  दो दिवसीय मंथन शिविर के लिए आमंत्रित किया जा रहा है!
राजर्षि जी का थोडा परिचय भी इस संस्था परिचय के साथ अपेक्षित होगा!
आज से करीब ८७ वर्षो पूर्व श्री कृष्ण के वंश इन्हें पहले यादव और अब जादौन भी कहा जाता है की एक रियासत करौली(राजस्थान) में है,इस राजपरिवार की जब वंश बेल में गोद लेने की जरुरत पड़ती है तो गढ़ी गाँव जिसे राजा की गढ़ी भी कहा जाता है से ही इस राजवंश की लता को बढाया जाता है !,,इसी राजा किगढ़ी में राजर्षि जी का जन्मा हुआ है!
अर्थात करौली नरेश के निकट रक्त सम्बन्धी है राजर्षि जी .....!
युवा अवस्था में विवाह हुआ और कुछ वर्षो के दांपत्य जीवन के बाद एक एक बच्ची के जन्म के बाद राजर्षि जी की पत्नी स्वर्ग सिधार गयी !
काफी लोगो के दबाव के बावजूद राजर्षि जी ने दूसरा विवाह अनावश्यक बता कर ताल दिया!
समयानुसार बच्ची बड़ी हुई एवं एक अच्छे राजपूत परिवार में बच्ची के विवाह के तुरंत बाद (विदाई के ही दिन) राजर्षि जी ने वैराग्य ले लिया !
लोगो ने सोचा पुत्री वियोग में कही अश्रु बहा रहे होंगे!
किन्तु राजर्षि जी तो पहुँच गए निर्वाणी अखाड़े के संत श्री श्री १००८ गोविन्द दास जी महाराज के आश्रम में !
विदिवत गृहस्थ छोड़ वैराग्य लेने के बाद १२ वर्षो तक सिर्फ "दोपहर में एक लिटर पानी में सांठी(पुनर्वा ) घोट कर पिया !
इसके अलावा न कोई अन्न,जल, फल, फूल, या कांड ही ग्रहण किया!
लगातार जप एवं ताप के परिणाम स्वरूप निर्वाणी अखाड़े के संस्थापक श्री श्री १००८ श्री निर्गुणदास जी महाराज के परम शिष्य श्री श्री १००८ श्री अगरदास जी महाराज ,जिन्होंने अपने समकालीन बादशाह अकबर का दर्प राजा मान सिंह के समक्ष भंग किया था ,राजर्षि जी के साथ साक्षात् प्रकट होकर वार्तालाप करने लगे!
परिणाम स्वरूप लाखो लोगो के दुःख दूर किये!
पुत्र काम्येष्टि यज्ञ भी करवाए गए जिनमे अब तक कुल १२१४ बच्चो का जन्म हुआ है !
जिनमे क्षत्रिय वीर ज्योति के बहुत से सदस्यों के बच्चे भी सम्मिलित है!
कुम्भ में पहली झांकी श्री निर्वाणी अखाड़े की ही निकलती है !
राजर्षि जी उस अखाड़े के खालसा के श्री महंत फिछले ७ वर्षो से है !
इस खालसा में करीब १०००० उच्च कोटि के संत है !
राजर्षि जी हर समय प्रत्येक कार्यकर्त्ता के लिए सभी प्रकार की समस्याओ पर सुझाव,परामर्श एवं उपाय बताने के लिए तत्पर रहते है !
उच्च कोटि का अध्यात्मिक ज्ञान के साथ ही दिव्य शक्तियों से संपन्न है!
आयुर्वेद का भी उच्च श्रेणी का ज्ञान है !
राजपूतो के साथ ही जाट ,गुर्जर एवं मीणा आदि अन्य जातियों पर भी राजर्षि जी का बहुत अच्छा प्रभाव है
आशा है इतना परिचय पर्याप्त होगा !
--प्रचार प्रमुख
श्री क्षत्रिय वीर ज्योति मिशन

और भ्रम ना फैलाये...!


आजकल फेसबुक या अन्य वेब के जरिये कुछ लोगों द्वारा भारत के प्राचीन इतिहास की तोड़-मरोड़ की जा रही है! यह दुर्भाग्यपूर्ण है! भारत की सभ्यता और संस्कृति अति प्राचीन काल से महान रही है और विश्व वन्दनीय भी मानी गयी है! फिर भी कुछ महाशय चंद विदेशी इतिहास कारों के द्वारा रची गयी मिथक कल्पनाये बार-बार प्रस्तुत करके इस महान धरोहर को बदनाम करने की कवायद कर रहे है! हर समाज में कुछ अच्छाई और बुराई जरुर होती है! लेकिन चंद बुराई की बाते उठकर किसी महान सभ्यता को बदनाम करना उचित नहीं!

मुर्ख इंसान अपने को छोड़ कर सारी दुनिया को मुर्ख समझता है और दुनिया का प्रबोधन करने निकल पड़ता है! ऐसे लोगों को देखकर मुझे डोन क्विक्ज़ोट की याद आ जाती है! कभी वर्ण व्यवस्था या जाती व्यवस्था को लेकर ;कभी धर्म व्यवस्था या कभी आर्य विदेशी थे या नहीं इन बातों को लेकर अक्सर मिथ्या विचारों के प्रदर्शन यहाँ होते आ रहे है! विदेशी इतिहास कार लोगोने अनगिनत भ्रम पैदा कर रखे है जिन्हें हमारे तथा-कथित विद्वान् सत्य मानकर अपनी उट-पटांग खोज दुनिया के सामने रखने का अवडंबर करते रहे है! और हमारे लोग भी उन्ही गलत जानकारियों से भ्रमित होते जा रहे है! वास्तव में अगर इस महान इतिहास का सत्य स्वरुप अगर भारत के लोगों के सामने रखा जाये तो आज -कल के तथा-कथित स्वार्थी तत्व को राज करना मुश्किल हो जायेगा!

किसी भी देश को अपना सत्व और स्वत्व को कभी नहीं खोना चाहिए!

एक वचन यहाँ प्रस्तुत करना हम उचित समझेंगे," अगर दुनिया के किसी देश को---सभ्यता या संस्कृति को मिटाना चाहते हो; तो बम,बारूद या गोली की आवशकयता नहीं है; सिर्फ उस देश के इतिहास को मिटा दो.....वह अपने आप मिट जायेंगे....!"

यही प्रयास हमारे बारे में कुछ लोग कर रहे है! जैसे इजिप्ट, मिस्र की संस्कृति काल के प्रहार में मिट गयी ....वैसे ही भारत की महान विरासत को नष्ट करने के अनगिनत प्रयास हुए..! लेकिन भारत की महान मिटटी में वह महान संस्कृति सिर्फ जीवित ही नहीं बल्कि समूचे विश्व को प्रेरणा देती रही है! जितना प्रहार यह लोग करेंगे उनसे ज्यादा यह मजबूत होगी! यह कोई किसी द्वारा निर्मित व्यवस्था नहीं है; यह सनातन है! जिसका कोई आदि और अंत नहीं है!

जिन लोगो ने इस महान धरोहर को जानी--समझी या परखी नहीं है वैसे नादाँ ही उसपर प्रहार करना पसंद करेंगे! इस महान धरोहर को बचाने  के लिए अनगिनत लोगोने अपने बलिदान दिए है! हजारो संतो ने समूचे विश्व को प्रेम और ज्ञान का सन्देश दिया! यहाँ के त्याग और बलिदान की गाथा अद्वितीय है! भारत ने कभी भी किसी राष्ट्र या सभ्यता पर प्रहार नहीं किये है! वास्तव में इतना बड़ा मानवता का उदाहरण दुनिया के किसी इतिहास में नहीं होगा! आधुनिक लोग जात-वर्ण-धर्म जैसी बाते अधूरी पढ़कर वृथा ही अपने मत-प्रदर्शन कर देते है! यह तो हमारी अस्मिता प्रहार है;जिसका जबाब हमें देना चाहिए! हर सदी में कुछ विकृत लोग ऐसा करते आये है! यह वो धरती है जिसने अपनी स्तुति ही नहीं बल्कि आलोचना भी सही है! यह परिवर्तनशील संस्कृति है, व्यापक विचार धारा वाली और सभी प्रवाह या तत्वों को गोद में समाने वाली संस्कृति है!

पाखंडी लोग मानवता के नाम से इस महान संस्कृति पर कीचड़ उछालते है! क्या भारत जैसी महान मानवता कही दुनिया में किसी राष्ट्र में या संस्कृति में आप को दिखाई दी है? जिस पछिम की सभ्यता को ये पागल लोग महान समझते है, क्या उनके पागलपन जैसे उदाहरण यहाँ कभी देखे है? इंग्लैंड, फ़्रांस,जर्मनी तो साम्राज्यवाद के जनक थे! अमेरिका ने इराक में क्या कहर मचाया यह पूरा विश्व जनता है! क्या भारत ने ऐसा कुछ किया है? आज की बात तो क्या.....इतिहास में भी ऐसा कही नजर नहीं आया है!

आखिर में हम यह ही कहना पसंद करते है,

"वो कौमे बदनसीब होती है; जिन्हें इतिहास नहीं होता है....!

वो कौमे खुशनसीब होती है;जिन्हें इतिहास होता है.......!

और वो कौमे सबसे ज्यादा बदनसीब होती है; जिन्हें इतिहास भी होता है.......लेकिन वो इतिहास से सबक नहीं लेती है..!"

हमें इतिहास की भूलों से सबक लेना चाहिए.......और हमारे वर्तमान और भविष्य के बारे में सजग होना चाहिए...! इतिहास के कुप्रचार को जबाब देकर.....ऐसी नादाँ हरकतों को सबक सिखाकर हमारी महान सांस्कृतिक विरासत की रक्षा हेतु हमें आगे आना चाहिए...!

---जयपाल सिंह विक्रम सिंह गिरासे
शिरपुर,[महाराष्ट्र]
मोबाइल ०९४२२७८८७४०
इमेल: jaypalg@gmail.com

फिरसे जीवित हो क्षात्र धर्म ...!


पर-ब्रह्म परमेश्वर ने सृष्टि को रच दिया !
क्षरण से इसकी रक्षा का भार किसे दिया ?१?

कौन इसे क्षय से बचा  कर जीवन देगा ?
कौन इसे पुष्प दे कर स्वयं काँटे लेगा ?२?

नारायण ने ह्रदय से क्षत्रिय ,को पैदा किया है !
सृष्टि को त्राण क्षय से ,कराने का काम दिया है !३!

शौर्य, तेज़, धैर्य, दक्षता,और संघर्ष से न भागो !
दान-वीरता ,और ईश्वरीय भाव अब तो जागो !४!

इतने सारे स्वभाविक गुण ,दे दिए भर-कर !
हर युग,हर संघर्ष में जीवित रहो ,मर मर-कर!५!

हर क्षेत्र,हर काल में हमने चरम सीमा बनायीं !
चिल्ला चिल्ला-कर ,इतिहास दे रहा है, गवाही !६!

खता उसी फल को सारा जग,जिसे तू बोता था !
अखिल भूमि पर, तेरा ही शासन तो होता था !७!

किन्तु महाभारत के बाद ,हमने गीता को छोड़ दिया !
काल-चक्र ने इसीलिए ,हमे अपनी गति से मोड़ दिया!८!

जाने कहाँ गया वह गीता का ज्ञान जो हमारे पास था ?
समस्त ब्रह्माण्ड का ज्ञान, उस समय हमारा दास था !९!

यवनों के आक्रमण पर इसीलिए रुक गया हमारा विकास !
अश्त्र-सशत्र सब पुराने थे ,फिर भी हम हुए नहीं निराश !१०!

उस समय हमारे भी अश्त्र समयानुकूल होते काश !
तो फिर अखिल विश्व हमारा होता,हम होते नहीं दास !११!

यवन, मुग़ल, और मलेच्छ , इस देश पर चढ़े थे !
हम भी कम न थे ,तोप के आगे तलवार से लड़े थे !१२!

किन्तु कुछ तकनिकी ,कुछ दुर्भाग्य ने हमारा साथ निभाया !
अदम्य सहस और वीरता को ,अनीति और छल ने झुकाया !१३!

विदेशी अपने साथ अनीति और अधर्म को साथ लाये थे !
मेरे भोले भारत को छल कपट और अन्याय सिखाये थे !१४!

तब तक हम भी, क्षत्रिय से ,हो गये थे राजपूत !
गीता ज्ञान के आभाव में नहीं रहा था शांतिदूत !१५!

हिन्दू ,राजपूत और सिंह जैसे संबोधन होने लगे !
अपने ही भाईयों को,क्षत्रिय इस चाल से खोने लगे !१६!

कुछ राजा और राजपूत अलग हो गये छंट-कर !
पूरा क्षत्रिय समाज छोटा होता गया बंट बंट-कर !१७!

फिर फिरंगी, अंग्रेज, भारत में आये धोखे से !
हम राज्य उन्हें दे बैठे , व्यापर के मौके से !१८!

लॉर्ड मेकाले ,सोच समझ कर सिक्षा निति लाई !
क्षत्रियो के संस्कार पर अंग्रेज संस्कृति खूब छाई !१९!

क्या करे और कैसे कहे ,वह पल है दुःख दायी !
सबसे पहले एरे ही अलवर को वो सिक्षा भायी !२०!

हमने अपना कर विदेशी संस्कृति को क्षत्रियता छोड़ दी !
अपने साथ उसी समय ,भारत की किस्मत भी फोड़ दी !२१!

आज उसी का फल सारा जग हा हा कार कर रहा है !
धर्मं, न्याय ,और सत्य हर पल ,हर जगह मर रहा है !२२!

अधर्म, अन्याय ,और असत्य का नंग नाच हो रहा है !
हर नेता ,हर जगह ,हर पल ,भेद के बीज बो रहा है!23!

कहीं जाति के नाम ,कहीं आतंक के नाम शांतिको लुटा दिया !
धर्मं, न्याय और सत्य का ध्वज हर जगह झुका दिया !24!

वायु से लेकर जल तक ,हर जगह गंध मिला दिया !
सारे ब्रह्माण्ड का गरल ,मेरी जनता को पिला दिया !२५!

जिसकी रक्षा के लिए क्षत्रिय बने , उसी को रुला दिया !
फिर भी क्षत्रिय को ,न जाने किस नशे ने, सुला दिया !२६!

स्वार्थी नेताओ ने ,जनता को खूब भरमाया है !
हमारे विरुद्ध न जाने, क्या-क्या समझाया है !27!

इतिहास को तोड़-मरोड़ ,नेहरु और रोमिला ने भ्रष्ट कर दिया !
जन-बुझ कर, उसमे से ,क्षत्रिय गौरव को नष्ट कर दिया !२८!

क्योंकि वे जानते थे ,कि इनकी हार में, भी थी शान !
और जनता भी बेखबर, न थी ,उसे भी था भान !२९!

गुण-विहीन ,तप-विहीन ,धर्म-हीन कोई क्षत्रिय हो नहीं सकता !
क्षत्राणी कि कोख मात्र से, पैदा होकर क्षत्रिय हो नहीं सकता !३०!

जब तक न गीता का रसपान करेगा जीत न सकेगा समर !
रण-चंडी बलिदान मांग रही है ,तू कस ले अपनी कमर !३१!

कभी प्रगति ,कभी स्वराज्य का सपना दिखा खूब की है मनमानी !
प्रगति तो खाक की है ,चारोओर आतंक है पीने को नहीं है पानी !३२!

फिर भी कभी कर्जे माफ़ी ,कभी आरक्षण के सहारे होता है चयन !
राष्ट्र जाये भाड़ में ,शांति जाये पाताल में , वोटो पर होते है नयन !३३!

कभी बोफोर्स, कभी चारा, कभी तेल घोटाले से बनता है पेशा !
खूब लुटा है भोली जनता को ,यह प्रजातंत्र चलता है कैसा !३४!

यों तो कुकुमुत्ते की तरह गली-गली में दल है अनेक !
लूटने में भारत माता को, भ्रष्टाचार में लिप्त है हरेक ! ३५!

गरीब का बसेरा सड़क पर , और नंगे पैर चलता है !...
सकल-घरेलु उत्पाद का अधिकांश धन,विदेशी बैंकोमें डलता है ! ३६!

भारतीयता से घृणा कर, हर चीज ...,विदेशी खाते है !
भारत की जनता को लूटने में फिर भी वो नहीं शरमाते है !३७ !

हर त्यौहार ,हर ख़ुशी में बच्चो को सौगात विदेशी लाते है !
हद तो तब होती है, जब चीज ही नहीं बहू भी विदेशी लाते है! ३८!

स्वतंत्रता के नाम पर हमने ...जला दिए विदेशी परिधान !
किन्तु आजादी के बाद हमने लागु कर दिया विदेशी विधान!३९ !

अपराध -संहिता ,दंड-संहिता,अंग्रेजो का चल रहा है विधान !
६३ वर्ष गवाँ दिए हमने फिर भी खोज नहीं सके निधान !४०!

चारोऔर तांडव महा -विनाश का, तेजी से चल रहा है !
हर बच्चा ,हर माँ रो रही ,मेरा सारा भारत जल रहा है ! ४१!

सब कुछ खो कर ,मृत जैसा आराम से क्षत्रिय सोया है !
महा पतन का कारण एक ही,क्षत्रिय ने राज्य खोया है !४२!

न जाने किस धर्म की ओट लेकर, क्षत्रिय कहाँ भटक गया ?
किस जीवन स्तर,किस विकास के चक्कर में अटक गया !४३?

दुनिया के अन्धानुकरण ने ,क्षात्र-धर्मं को दे दिया झटका !
जाट,गुजर,अहीर मीणा ही नहीं,अब तो राजपूत भी भटका !४४!

अपना धर्मं. अपना कर्म छोड़ चा रहा है ,झूंठा विकास !
बहाना लेकर , कर्म छोड़ कर, हो रहा है समय का दास !४५!

समय का दास बन ,अपने आपको बदल कर होरहा है प्रसन्ना !
भूल रहा है तेरी इसी ही हरकत से भारत हो गया है विपन्न !४६!

जग में हो कितना ही दर्द ,क्षत्रिय ही को तो हरना है !
अपने मरण पर जीवन देता, क्षत्रिय ऐसा ही तो झरना है!४७!

रास्ता बदल दे सूर्य देव ,अपनी शीतलता चाँददेव छोड़ दे !
है सच्चा क्षत्रिय वही , जो वेग से समय का मूंह मोड़ दे !४८!

जितना मन रखा ,उतना ताकतवर है नहीं समय का दानव !
समय की महिमा गाने वालो,ज्यादा ताकत रखता है मानव !४९!

प्राण शाश्वत है ,मरता नहीं ,किसी के काटे कटता नहीं !
प्राण बल को प्रबल करो, प्राणवान संघर्ष से हटता नहीं !५०!

अर्जुन भी हमारी ही तरह, पर-धर्मं को मानते थे !
भलीभांति श्री कृष्ण इस गूढ़ रहस्य को जानते थे !५१!

इसीलिए साड़ी गीता में नारायण ने ,उसको धर्म बताया !
उस सर्वश्रेष्ट धनुर्धर को, क्षत्रिय का क्षात्र-धर्म बताया !५२!

जब तक सत्य-असत्य,धर्मं-अधर्म का अस्तीत्व बना रहेगा !
इस ब्रहामंड की रक्षा के लिए हमारा भी क्षत्रित्व बना रहेगा !५३!

जब आज अधर्म,अन्याय ,असत्य और बुराई का राज है !
तो फिर पहले से कहीं ज्यादा, जरुरत क्षत्रिय की आज है !५४!

मरण पर मंगल गीत गा कर ,क्षत्राणी सदा बचाती धर्मं !
हम सब का एक ही कर्म फिर से जीवित हो क्षात्र-धर्मं !५५!

"जय क्षात्र-धर्मं"



"कुँवरानी निशा कँवर नरुका "

श्री क्षत्रिय वीर ज्योति

-----:संघर्ष एवं क्षत्रिय :---


हर सिक्के के दो पहलु है !
इसी तरह इस संपूर्ण सृष्टि में भी हर वस्तु,हर चीज के के दो पहलु है !
यहाँ अच्छाई है; तो बुराई भी है, यहाँ अमृत है तो ,बिष भी है, यहाँ आदि है तो अंत भी है,जीवन है तो मृत्यु भी है
कडुवा है तो मधुर भी है ,आग भी है तो पानी भी है !
अर्थात प्रत्येक चीज के दो पहलु है, यह स्वयंसिद्ध है !
अब एक और भी बात है कि ,यही सब विपरीत चीजे मनुष्य के मानस पटल पर भी दोनों पहलु है ,
मानस-पटल पर न्याय है तो अन्याय भी है,धर्मं है तो अधर्म भी है ,सत्य है तो असत्य भी है ,कडुवाहट और मधुरता भी है !
दोनों तरह की प्रवृतिया मानस-पटल पर हर समय होती है !
अच्छाई युक्त प्रवृतियों को अमृतमयी प्रवृतिया और बुराई-युक्त प्रवृतियों को बिष-मयी प्रवृतिया कहते है!
और इन दोनों प्रवृतियों में सतत:संघर्ष होता रहता है !
यह संघर्ष "श्री गुलाब कोठारी जी" ने अपनी कृति "मानस-३" में "संघर्ष" नाम से बड़े रोचक एवं तथ्य-परख तरीके से व्यक्त किया है !
संघर्ष के बिना सृष्टि आनंद-मयी नहीं हो सकती क्योंकि इस समुद्र-मंथन जैसे संघर्ष के बाद अमृत-रूपी आनंद प्राप्त होता है !
सृष्टि के अस्तीत्व के लिए इन दोनों प्रवृतियों का अस्तीत्व भी आवश्यक है !
बिष-मयी प्रवृतिया जिने आसुरी प्रवृतिया भी कहा जाता है, पतन के मार्ग पर ले जाती है  ,और अमृत-मयी प्रवृतिया जिन्हें दैवीय गुण या प्रवृतिया भी कहा जाता है.... उत्थान की ओर ले जाती है !
जैसे कि पतन की यानि नीचे की ओर जल की गति स्वत: होती है, उसे किसी प्रयास की आवश्यकता नहीं पड़ती है, वैसे ही आसुरी प्रवृतियों (बिष- मयी प्रवृतियों )का उपार्जन नहीं करना पड़ता, यह तो स्वत:ही हमारे मानस-पटल पर छा जाती है!
और उत्थान की यानि जल को ऊपर की ओर चढाने के लिए कठिन प्रयास करने पड़ते है, तब कहीं जाकर जल ऊपर चढ़ पता है वो भी धीमी गति से, वैसे ही अमृत-मयी प्रवृतियों और दैवीय गुणों का उपार्जन बड़ी कठिनाई से करना पड़ता है !
इस प्रकार के कठिन प्रयासों का ही नाम ही तपस्या है,
मन के अन्दर जो स्वत; विकार पनप जाते है ,और यदि उन पर नियंत्रण नहीं किया जाये तो वह पूरे मानस-पटल को बिष-मयी प्रवृतियों से घेर लेते है ,तथा हमारा मन पतन की ओर अग्रसर हो जाता है !
मनुष्य का शरीर नौ-द्वारो वाली एक स्थूल काया है ,जोकि पाँच महाभूत (आकाश,वायु,अग्नि,पृथ्वी और जल),के कारण बनता है ,जिसमे पाँच ज्ञानेन्द्रिया(श्रोत्र,त्वचा,चक्षु,जिव्हा एवं,घ्राण),पाँच कर्मेन्द्रिया,( वाक़,हस्त,पाद,पायु,उपस्थ) ग्यारहवां उनका स्वामी मन,पाँच विकार(शब्द ,स्पर्श, रूप ,रस,एवं गंध ) ,बुद्दी,अहंकार और अव्यक्त परा प्रकृति प्राण इस प्रकार कुल चौबीस होते है !
इस स्थूल शरीर से ,इन्द्रिया बलवान है ,तथा इन्द्रियों से मन बलवान है ,मन से ज्यादा बुद्धि बलवान है और बुद्धि से ज्यादा अव्यक्त परा-प्रकृति प्राण है ,!
शरीर एक रथ है, जिसमे इन्द्रिया अश्व है ,तथा मन सारथि है ,प्राण रथी है !
यदि अश्वो (इन्द्रियों) पर सारथि(मन) का कब्ज़ा हो और सारथि (मन),रथी (प्राण) के आदेशानुसार घोड़ो (इन्द्रियों) को वश में रखे तो मंजिल (मोक्ष) आसानी से तय की जा सकती है !
शारीर के क्षेत्र में निंतर युद्ध होता रहता जहाँ अमृत-मयी,पुण्य-मयी,दैवीय प्रवृतियों का बिष-मयी,पाप-मयी,आसुरी-प्रवृतियों के साथ निरंतर युद्ध होता रहता है !
जिसमे पुण्य-मयी,अमृत-मयी,दैवीय प्रवृतियों की रक्षा के लिए प्राण अपना रथ लेकर सहायता के लिए उपस्थित होता है !
,जिससे आसुरी-प्रवृतियों को नियंत्रित किया जाता है और इनसे दैवीय प्रवृतियों का अस्तीत्व बना रहता है!
किन्तु जब प्राण कमजोर पड़ जाता है तो मन का रुख इन्द्रियों की तरफ हो जाता है ,और इन्द्रियों पर मन यानि सारथि का कोई कब्ज़ा नहीं होता जिससे प्राण पुण्य-मयी दैवीय प्रवृतियों की रक्षा नहीं कर माता परिणाम होता है मनुष्य का पतन,..,,,!
इस प्राण से ही शारीर कि समस्त कार्य प्रणाली संचालित होती है !
इस प्राण के कमजोर होने पर पूरा शारीर का पतन यानि क्षत होना निश्चित है !
प्राण के द्वारा शरीर त्याग देने के बाद मृत्यु हो जाती है!

इस प्राण का निवास स्थान है हृदय, जहाँ पर प्राण और आत्मा दोनों रहते है !

मुझे यह बताने की कोई आवश्यकता नहीं है कि क्षत्रिय कि उत्पत्ति भी ह्रदय से ही हुई है जैसा कि सभी उपनिषद एवं शास्त्र कहते है !
देखिये बाल्मीकि रामायण में चारो वर्णों कि उत्पत्ति के विषय में उल्लेख है कि :-

"मुखतो ब्राहमण! जाता, ,उरस:क्षत्रियास्तथा !

ऊरुभ्यां जज्ञिरेवैश्या:पद्भ्यां शूद्रा इति श्रुति !30!"

' अरण्य कांडे-चतुर्दश-सर्ग'

महाभारत के कर्ण पर्व अध्याय-१३ के ३२ वे श्लोक को देखे :--

" ब्राह्मणा ब्रह्मणा सृष्टा मुखात्क्षत्रमथोरस: !

ऊरुभ्याम स्रुज्द्वैश्यान्शुद्रन्पदभ्यामिति श्रुति: ! ३२!"

इसी लिए जो गुण प्राण का है वही गुण क्षत्रिय का भी है !
जो स्वभाव प्राण का है वही क्षत्रिय का भी है !
जिस प्रकार प्राण शारीर के अन्दर मानस-पटल पर चल रहे संघर्ष में पुण्य-मयी,दैवीय-प्रवृतियों कि रक्षा के लिए उपस्थित है ठीक उसी तरह बाहरी सृष्टि जो कि निरंतर युद्ध में रत है !
जहाँ अच्छाई का बुराई से ,धर्मं का अधर्म से , पुण्य का पाप से ,सत्य का असत्य से ,न्याय का अन्याय से ,अर्थात अमृत का बिष से,पुण्य-मयी,दैवीय प्रवृतियों का पाप-मयी आसुरी-प्रवृतियों से निरंतर युद्ध चलता रहता है!
जिसमे दुसरे प्रकार कि प्रवृतिया पहले प्रकार कि पुण्य-मयी प्रवृतियों का दबा लेता है!
तब यह बिष मयी दानवी शक्तिया इस सृष्टि को महा विनाश जिसे क्षय कहा जाता है की ओर धकेल देती है !
इस क्षय (विनाश) से त्राण(रक्षा) करने के लिए क्षात्र-तत्त्व ही है, जोकि आसुरी प्रवृतियों और शक्तियों को नियंत्रित कर इस सृष्टि का अस्तीत्व बनाये रख कर पुन: सत्य,धर्मं,न्याय,एवं अमृत की स्थापना करता है !
अब यह तो कोई नहीं कह सकता कि इस सृष्टि से आसुरी प्रवृतिया स्थायी रूपसे समाप्त हो गयी है या होजायेंगी ,क्योंकि यह सृष्टि द्वन्दात्मक है और दोनों ही प्रवृतियों का अस्तीत्व रहेगा !
और जब तक दोनों प्रवृतियों का अस्तीत्व है, तब तक क्षात्र-धर्मं की आवश्यकता बनी रहेगी !
फिर यह कौन मुर्ख है ,जो कह रहा है कि" समय बदल गया है ,और अब क्षात्र-धर्मं बीते युग यानि इतिहास की बात रह गयी है"?? आज जितना अधर्म,असत्य और अन्याय का बोलबाला है उतना तो इतिहास में कभी रहा ही नहीं था
आज सत्य अपने अस्तीत्व के लिए छटपटा रहा है ,न्याय तो अन्याय के ढेर में कही दब कर रह गया है
धर्मं तो अपनी अंतिम श्वांस  ले रहा है!
तो फिर आज तो सर्वाधिक आवश्यकता है क्षात्र-धर्मं की .........!
जिस प्रकार यह अटल सत्य है की यह सृष्टि निरंतर युद्धरत है, तो यह भी अटल सत्य है कि उस क्षत्रिय की भी निरंतर आवश्यकता है !
जिस प्रकार एक शारीर प्राण के बगेर क्षत हो जाता है, उसी प्रकार यह सृष्टि भी प्राण-तत्त्व से उत्पन्न क्षात्र-धर्मं के बगेर क्षत यानि विनाश यानि पतन को प्राप्त हो रही है!
अत: अब यह सभी प्रबुद्ध नागरिक ,मनीषी,साधू-जन एवं समस्त मानव-जाति का परम कर्तव्य है कि "क्षात्र-धर्मं को पुनर्स्थापित कर इस सृष्टि को समस्त चर-अचर जीवो के रहने योग्य बनाया जा सके" !

" जय क्षात्र-धर्मं "
"कुँवरानी निशा कँवर नरुका " [राजस्थान]
श्री क्षत्रिय वीर ज्योति मिशन



वीरभूमी चित्तोड

द्वितीय क्षत्रिय मंथन शिबिर का आयोजन...!

सम्मानीय क्षत्रिय बंधु
जय संघ शक्ति ....!
मुझे “श्री क्षत्रिय वीर ज्योति” के संस्थापक राज ऋषि मधुसूदन दास जी महाराज द्वारा आप जैसे चुनिंदा क्षत्रिय सरदारो के साथ संपर्क करने हेतु निर्देशित किया गया है!
आप एवं आप की संस्था जो समाज जागरण पुनीत प्रयास मे संलग्न है, साधु वाद के पात्र है !
आज की इस विषाक्त ....क्षीण एवं चहूं ओर से पतन पर पहुँची दयनीय व्यवस्था के लिए निश्चित रुप से पतन की पराकाष्ठा को पार कर चुका भ्रष्ट नेतृत्व ही उत्तरदायी है !
यह आप सभी से छिपा हुआ नहीं है !
वर्तमान परिवेश मे जहाँ मानवीय मूल्यों के साथ आमजन का जीवन दु:भर हो गया है !
इस अराजक बेलगाम, झूठ से परिपूर्ण, दुश्चरित्र शक्तियों के व्यवस्था संचालन के अनैतिक, दिशाहीन, कुकृत्यों ने संपूर्ण मानव जाति को विनाश के गहरे गर्त में गोते लगाने के लिए छोड़ दिया है!
आज की इस विभत्स परिस्तिथि को यदि तुरंत रोकने का प्रयास नहीं किया गया तो वर्तमान क्षत्रिय शक्तियों का पूर्णत: लोप होने के कड़ुवे सत्य को स्वीकार करने के अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं बचेगा!
और हम प्रकृति एवं मानवता पर गहराए इन काले ख़तरे के बादलों को मूकदर्शक बन कर देखते हैं तो हमारे इस क्षत्रिय धर्म के विरुद्ध आचरण को निश्चय ही क्षत्रिय इतिहास में काले अक्षरों में लिखा जाएगा!
समाजवेता एवं भारतीय मनीषीयों को यह एकमत से स्वीकार्य है की यदि कभी भी और कहीं पर भी मानवता एवं सृष्टि के अस्तित्व ख़तरे में हो तो इसका अर्थ है की उस काल एवं स्थान विशेष क्षत्रित्व सुषुप्त अवस्था हो चुका है !

अत: आज क्षात्र तत्व की सुषुप्तता को चैतन्य करने के अतिरिक्त अन्य कोई विकल्प नहीं हो सकता !
इन विषम हालातों के परिमार्जन का केवल और केवल एक ही उपाय है और वह है “क्षात्र धर्म का पुन: उत्थान” ...!
क्षात्र तत्व को चेतन्य करके चहुँ ओर हो रहे क्षय (विनाश) का त्राण करना यह ना केवल वर्तमान क्षत्रिय शक्तियों का दायित्व ही है बल्कि अपने पूर्वजों के यश को सुरक्षित रखने एवं आगामी पीढ़ियों के समक्ष क्षत्रिय आदर्शों को धुंधला न पड़ने देने का एकमात्र रास्ता है !
पवित्र ग्रंथ श्री गीता में भी साक्षात ईश्वर श्री कृष्ण द्वारा द्वितीय अध्याय के श्लोक 31 से 33 में “संघर्ष के पलायन को आतुर तत्कालीन क्षत्रित्व के प्रतीक अर्जुन को स्पष्ट शब्दों में निर्देश दिया है की ” निश्चित रूप से धर्म युक्त संग्राम से बढ़कर दूसरा कोई कार्य क्षत्रिय के लिए नहीं है !
अपने आप प्राप्त हुए और खुले हुए स्वर्ग के द्वार स्वरूप इस प्रकार के धर्म संग्राम को भाग्यशाली क्षत्रिय ही प्राप्त करते हैं जिसमें विजय होने पर महामहिम (इस लोक का राज्य) और हारने पर देवत्व (स्वर्ग) प्राप्त होता है !"
अत: ईश्वर के अति निकट दिव्य शक्तियों से विभूषीत राज ऋषि मधुसूदन दास जी महाराज, जो की श्री क्षत्रिय वीर ज्योति के संस्थापक होने के साथ ही सुविख्यात निर्वाणी अखाड़े के ख़ालसा के श्री महंत भी हैं, को सूक्ष्म ईश्वरीय चेतना द्वारा यह दिव्य निर्देश पाप्त हुआ है की - संपूर्ण आर्यवृत में बिखरी हुई व दिशाहीन क्षत्रिय शक्तियों को खोए हुए गौरव को पुन: स्थापित करने के लिए सार्थक एवं परिणाम मूलक एक लक्ष्य के सूत्र में पिरो कर धर्ममय समाज का शंखनाद करें!
इन्हीं सब विषयों पर गहन चिंतन हेतु एक पाँच दिवसीय मंथन शिविर का आयोजन - राज ऋषि की तपो भूमि, प्रकृति के सुरम्य वातावरण वर्तमान परिवेश से बिल्कुल दूर तीन नदियों के संगम तट जो की हाडोति एवं रण्थम्भोर (राजस्थान) के निकट है - में किया जाना सुनिश्चित हुआ है !
मंथन शिविर में आर्यवृत के कोने कोने में कार्यरत सभी क्षत्रिय संगठनों के 2-2 पूर्ण अधिकार संपन्न प्रतिनिधियों को भाग लेना है ताकि एक स्थायी “क्षत्रिय संसद” के निर्माण की प्रक्रिया भी पूरी हो सके!
हमारे विश्वस्तसूत्रों से जानकारी मिली है की आप एवं आपका संगठन भी क्षत्रिय जागृति प्रयास में उच्च कोटि की भूमिका निभा रहे हैं !
अत: हम सभी के इस पावन, ईश्वरीय प्रयास को साकार करने हेतु अपने संगठन के 2 पूर्णत: अधिकार संपन्न, सुविज्ञ प्रतिनिधि नियत समय एवं स्थान भेजकर इस धर्ममय मंथन शिविर को संपन्न करवाने में अपनी महत्ती भूमिका निभायें ...! जय क्षात्र धर्मं...!

विशेष सूचना: इस मंथन शिबिर में देश के कोने --कोने में कार्यरत कोई भी कार्यकर्ता या किसी भी क्षत्रिय संघटन के सदस्य हिस्सा ले सकते है!

सादर
प्रचार प्रमुख
श्री क्षत्रिय वीर ज्योति मिशन
मोबाइल : 09868004695, 09213365865

शिविर स्थल
राज ऋषि का आश्रम, राजधानी की छतरी, हाडोति, जिला - करौली (राजस्थान)
*कोटा - नई दिल्ली रेलवे खंड पर, गंगापुर सिटी से सवाई माधोपुर के बीच मालरना रेलवे स्टेशन पर जीप उपलब्ध रहेगी !

*वहाँ से 15 किलो मीटर जंगल में आश्रम है !

शिविर तिथि

09-11-2010 -से लेकर -10-11-2010 तक [ आप सभी को ०८ नवम्बर के शाम तक शिबिर स्थल पहुचना है!

सामान्य अनुदेश
शिविर में भाग लेने वाले प्रतिनिधियों को अपने आगमन की सूचना एवं अपना मोबाइल नंबर प्रधान कार्यालय को शीघ्रातिशीघ्र देने होंगे !

किंतु 10-10-2010से पूर्व...........

*शिविर में आते समय अपने साथ 2 धोती 1 जनेऊ तथा 1 साफ़ा (पगड़ी) लेकर आएँगे तो सुविधा रहेगी !

*कृपया नियत तिथि से 1 दिन पूर्व में पहुँचने का प्रयास करें!

*हमारे कार्यकर्ताओं के साथ संपर्क तुरंत बनाएँ ---

संपर्क सूत्र
राज ऋषि जी(हाडोती)- 09982771573
कुँवर राजेंद्र सिंह(गुरगाव) - 09957330847,09783400450
कुँवर भवानी सिंह (दिल्ली) - 09213365865
भंवर जयपालसिंह गिरासे(शिरपुर) -09422788740
कुँवर तेजवीर सिंह जादौन (सीकर ,राजस्थान )-09414231797, 09968044887
डा सिकरवार - 09981932302
श्री भरत सिंह चौहान - 09414814342
श्री मान सिंह राठौड़ - 09460609888
कुँवर संजीव सिंह (बिहार) - 09708409309
कर्नल D.R.S. सिकरवार(लखनौ) - 09415021582
कुँवरानी निशा कँवर (गुरगाव)- 09350038422
ई-मेल
rs.naruka@yahoo.co.in
singh@rajputworld.com

कुंवर विक्रांतसिंह रावल के जन्मदिन पर हार्दिक बधाई...!





उत्तर महाराष्ट्र में स्थित दोंडाइचा के भूतपूर्व संस्थान के राजकुमार कुंवर विक्रांत जी १६ अगस्त के दिन २५ साल के हो जायेंगे! ऐतिहासिक राजघराने में जन्म लेकर....आधुनिक वातावरण में पल-बढ़ कर भी सामान्य जनता से प्रेम एवं आस्था रखने वाले कुंवर जी महाराष्ट्र के युवा दिलों की धड़कन है! २४ साल की उम्र में ही "अंतर्राष्ट्रीय क्षत्रिय राजपूत युवा संघ" के राष्ट्रीय अध्यक्ष के पद पर वे काम कर रहे है! साथ ही अपनी रावल संस्थान की विरासत का कारोबार भी सम्भाल रहे है! स्व.दादासाहेब जयसिंह रावल (भूतपूर्व विधायक) ने रावल परिवार का उद्योग जगत में प्रवेश कराया! स्टार्च फैक्ट्री ,रावल बैंक,दूध संघ, स्कूल, कोलेजेस आदि क्षेत्र के साथ रावल परिवार सामाजिक, राजनैतिक ,औद्योगिक क्षेत्र में भी अग्रणी रहा है ! रावल परिवार ने मध्ययुगीन काल में प्रजा का अच्छा पालन तो किया ही था लेकिन वर्तमान में भी हजारो लोग इसी परिवार की मदद से अपनी रोजी-रोटी कमा रहे है!

स्व.दादासाहेब रावल के कनिष्ठ सुपुत्र श्री ठा.बापूसाहेब जयदेव सिंहजी के कु.विक्रांत सिंह कनिष्ठ पुत्र है! आपके पिता भी महाराष्ट्र के युवा विधायक थे! उन्हीके नेतृत्व में चल रहा दूध संघ आज हजारो परिवार को स्वावलंबन का सहारा दे रहा है!


कु.विक्रांतसिंह एक शालीन...समझदार...ऊँचे विचार वाले...अछे संस्कार वाले युवा है! हर रोज जिम जा कर अपनी सेहत का ख्याल तो वे रखते ही है...साथ ही अपने फार्म हाउस पर जाकर अपने घोड़े...गाय....बकरिया आदि का भी ख्याल रखते है! ''फैला-बैला'' जात की घोड़ी जो सिर्फ अफगानिस्तान में ही पाई जाती है.....उसका कद सिर्फ दो या तिन फीट होता है...कुंवर जी के फार्म हाउस पर आप को नजर आएगी! उसी जात की पैदास उन्होंने शुरू कर दी! घोड़े तो कुंवरजी का खास शौक है! आपके फार्म पर कई जात के घोड़े और बकरिया पाई जाती है! पुराणी चीजों का भी आप खासा शौक रखते है! आप के अश्व-पालन केंद्र की वजह से आप को दुनिया भर में प्रसिद्धि मिली है !

कुंवर जी का एक महत्वपूर्ण गुणविशेष है की वे सामान्य वातावरण एवं सामान्य जनता के बिच ज्यादा रहते है...! जनता के सुख-दुःख में साथ रहते है! इसलिए नवजवानों में आकर्षण का वे केंद्र है! एक रईस परिवार में जन्म लेने के बावजूद......वे बेहद ही सीधे-साढ़े है! कोई भी उन्हें आसानी से मिल सकता है!

ऐसे हमारे आदर्श....हमारे प्रेरणास्रोत....हमारे परममित्र कुंवर विक्रांतसिंहजी के २५ वे जन्मदिन के शुभअवसर पर हार्दिक शुभकामनाये ........! आपका जीवन हमेशा प्रकाशमान रहे......भविष्य उज्वल रहे.......यश-कीर्ति-सेहत हमेशा साथ दे यही हम प्रभु एकलिंगजी से एवं कुलस्वामिनी बाण माता से प्रार्थना करते है! "अंतर्राष्ट्रीय क्षत्रिय राजपूत युवा संघ" और "क्षत्रिय संसद" की ओरसे भी हार्दिक बधाई..!

--------जयपालसिंह विक्रमसिंह गिरासे ,शिरपुर

"क्षत्राणी का सच्चा धर्म...!"

क्षत्रिय का शाब्दिक अर्थ है क्षय से त्राण कराने वाला!
क्षत्राणी का शाब्दिक अर्थ है क्षय से त्राण वाली!
अर्थात अर्थ की दृष्टी से क्षत्रिय और क्षत्राणी में कोई भेद नहीं है!
धर्मं शास्त्रों एवं इतिहास में जितना ध्यान क्षत्रिय पर दिया है उससे कही अधिक ध्यान क्षत्राणी के धर्म और कर्तव्य पर भी दिया गया है!
वासुदेव श्री कृष्ण शांतिदूत बन कर हाश्तिनापुर आते है तो कुंती से अपने पुत्र युधिष्टर के लिए सन्देश लेते है... तो कुंती कहती है कि "कह देना युधिष्टर कि वो दिन आ गया; जिस दिन के लिए क्षत्राणी पुत्र पैदा करती है" साधारण  से सन्देश में इन्द्रप्रस्थ कि राजमाता ने सब कुछ कह दिया!
राजकन्या मदालसा से साबित किया कि माता ही निर्माता है!
माता जैसा चाहे पुत्र पैदा कर सकती है!
क्षत्रानियो कि बात हो और हाडारानी का जिक्र न हो.. तब भी प्रतिवाद अधूरा ही रह जायेगा!
हमारा विषय यह नहीं कि हम इतिहास में क्षत्रानियो द्वारा किये गए धर्मं पालन कि व्याख्या करे,बल्कि हमारा विषय है कि ,वर्तमान समय में जहाँ शायद अखिल विश्व में कोई विरला क्षत्रिय ही क्षात्र धर्मं का पूर्ण रूपेण पालन कर रहा हो,ऐसे में हम क्षत्रानियो कि क्या भूमिका हो? मै आपको यह बता दू कि क्षत्रियों ने अब से पहिले व्यक्तिगत रूपसे कइयो बार क्षत्र-धर्म का उल्लंघन किया है,और अनेको बार तो युद्ध से भाग कर महलो में भी आते रहे है! लेकिन हम क्षत्राणियों ने कभी विदुला बनकर इन्हें फिर से क्षात्र-धर्म का पालन करने के लिए बाध्य किया है!
आज कि विडम्बना यह है कि अब क्षत्रानिया भी अपने धर्मं को भूलकर आधुनिकता कि चकाचौंध मे कहीं भटक गयी है! परिणाम समक्ष है, सारी पृथ्वी पर क्षात्र धर्म लुप्त के कगार पर है!
पूरा ब्रहमांड तेजी से महा विनाश की ओर बढ़ रहा है!
ज्योतिषी और वैज्ञानिक एक स्वर में सृष्टि के महाविनाश की घोषणा कर रहे है!
न्याय एवं सत्य ,सदाचार,जैसे शब्द बेमानी हो गये है!
धर्मं तो आखिरी श्वांश ले रहा है!
जब कि क्षय से त्राण कराने वालो की संख्या यदि अन्य क्षत्रिय जातियों को सम्मिलित कर लिया जाये तो कोई 70 करोड़ को पार करती है !
फिर क्षत्रियों की इतनी बड़ी जनसंख्या के रहते , कैसे पल-पल नजदीक आ रहा है यह "महा विनाश" ? एक दम साफ जाहिर है कि क्षत्रिय क्षत्रित्वता से हीन है,क्षात्र-धर्मं का पालन करने में न तो सक्षम है और ना ही इस सक्षमता को प्राप्त करने की दिशा में कोई प्रयास हो रहा है!
ऐसे में हम क्षत्राणियों का परम कर्तव्य है की हम अपने पुत्रो में,अपने भाइयो में,अपने पतियों में क्षात्र-धर्मं के पालन की उत्कंठा भर दे! हमे फिर राजकन्या मदालसा बन कर साबित करना होगा कि "माता ही निर्माता है...! "
यदि आज भीष्म कि आवश्यकता है तो भीष्म पैदा करे, श्री राम कि आवश्यकता है तो श्री राम और श्री कृष्ण कि आवश्यकता है तो श्री कृष्ण पैदा कर दे...!
हमे आज चन्द्र-गुप्तो कि आवशयकता है.. जो नौ पीडियों के शुद्र शासन को समाप्त कर फिर से क्षत्रिय शासन कि स्थापना कर सके...!
हमे जीजाबाई बन कर "शिवाजी" का निर्माण करना होगा...!
ना पड़े नारी स्वतंत्रता के खोखले नारों के चक्कर में..... जिन्होंने नारी को विज्ञापन का जरिया बना कर नारी का व्यवसायीकरण कर दिया है! नारी होने से ज्यादा महत्वपूर्ण है क्षत्राणी होना ! आप गीता का अध्ययन करे तो पायेंगे कि श्री कृष्ण ने स्वधर्म पालन पर जोर दिया है! तो आज स्वधर्म पालन कि ही सर्वाधिक आवश्यकता है!
क्षत्रिय समाज ने एक नहीं अनेकों जुझार दिये है ! जोझार सिर कटने के बाद भी लड़ने वाले योद्धा को कहते है!
5 -5 कोस तक बिना सिर के लड़ने वाले योद्धा जब पैदा हो सकते है....! जब हम क्षत्रानियाँ अपने परिवार का पालन पोषण अनवरत महा मृत्युंजय मन्त्र का जप करते हुए करे...! वैसे तो कोई भी मंत्र के जप का अपना ही महत्व होता है! किन्तु इस महा मंत्र के जप से तो मृत्यु भी टल जाती है !अत: हम सब को इस विषैली संस्कृति एवं वातावरण से अपने आपको ऐसे बचाना होगा जैसे कमल अपने आपको कीचड़ से बचाता है...!
हम किसी मंत्र का अनवरत जप करते हुए ऐसे कर्मठ एवं आदर्श क्षत्रियों का निर्माण करे जो इस बिलखती हुई मानवता को सही दिशा दे सके! ईश्वर के नाम: स्मरण कि अनवरत परम्परा अपने बालकों एवं बालिकाओं में शैशव काल से डालनी होगी ,तब उन्हें अपने धर्म का ,अपने ही विवेक से ज्ञान हो सकेगा! आज धर्म के नाम पर चहुँ ओर आडम्बर फैला हुआ है! साधना पद्धति भ्रष्ट हो चुकी है ! अत: इनसे जूझते हुए हम अपना कर्तव्य पालन कर प्राचीन आदर्श क्षत्रियों को अपने घरो में फिर से निर्माण करना है !
आज क्षत्राणी का यही परम धर्मं है...!
----कुँवरानी निशा कँवर नरुका[राजस्थान]
श्री क्षत्रिय वीर ज्योति मिशन 

-:भारतीय सभ्यता को खतरा :-

-:भारतीय सभ्यता को खतरा :-


वर्त्तमान में भारतीय सभ्यता कहीं भूल भुलैया में खो गयी है
यूँ तो भारत की गिनती महाशक्तियों में होने लगी है\भारत एक पूर्णत: आत्म निर्भर राष्ट है\यहाँ चाँवल, गेंहू एवं अन्य खाद्दान: भी प्रचुर मात्र में उपलब्ध है ,तो लोहा,सोना,चंडी और कोयला जैसे खनिज पदार्थो की भी प्रचुरता है
भारतीय तकनिकी एवं विज्ञानं भी उच्च स्थिति में है
हर क्षेत्र में इस समय राष्ट्र ने आत्म निभरता प्राप्त कर ली है
जैसलमेर और बाड़मेर में संभावित पेट्रोलियम भंडार की खोज हो जाने बाद इस राष्ट्र को किसी भी वस्तु के लिए किसी भी राष्ट का मोहताज होने की आवश्यकता नहीं रहेगी
लेकिन इतनी सारी प्रगति में राष्ट ने जो खामियाजा भुगता है,उसकी पूर्ति न परमाणु बम से की जा सकती है और न ही सूचना एवं प्रोधोगिकी से की जा सकती है
भारत ने अपनी सभ्यता को खो दिया है
जो भारतीय परम्पराए और संस्कृति थी वो अब पाश्चात्य संस्कृति में विलुप्त होती जा रही है
भारतीय सभ्यता जो पिछले ३०-३५ सालो में पाश्चात्य सभ्यता के नीचे दबती चली गयी है,अब अपनी आखिरी साँस लेना शुरू कर दिया है
भारत के राष्ट्रवादी लोग भी अब पश्चिम की चकाचौंद में अपना लक्ष्य भटकते नजर आ रहे है
सभ्यता और संस्कृति के मायने बदल गए फै
एन केन प्रकारेंन अर्थ अर्जित करने में ही सारा राष्ट्र लगा हुआ है
लगता है पूंजीवाद पूरे विश्व में छा गया है गरीब और गरीब हो रहा है, आमिर और आमिर हो रहा है
मनुष्य का चारित्रिक पतंसरी सीमाए लाँघ चुका है
मनुष्य की पहिचान अब धन बल से हो रही है,लोग मानवीय मूल्यों को भूल गए है
आर्थिक युग अपनी चरम सीमा पर है
व्यापारी वर्ग अब शासन की दिशाए तय करता है,राष्ट्र स्वंयम व्यापर करने में लगे हुए है
जब शासक व्यापर करने लगे निसंदेह; न्याय एवं कर्तव्य को हनी लाभ के तराजू पर तौला जायेगा
और वही आज हो रहा है
राष्ट्र अब अपने सार्वजानिक उपक्रमों को इसलिए बेच रहा है,क्योंकि इनसे लाभ नहीं मिल पा रहा है
अर्थात जो जनहित नागरिको को रोजगार देने के लिए बड़े बड़े उद्योग लगाये गए थे ,अब उनसे लाभ कमाने की आशा की जा रही है
लाभ न मिल पाने पर इन्हें निजी क्षेत्रो को या फिर बड़ी बड़ी बहु राष्ट्रीय कंपनियो को बेचा जा रहा है
यहाँ यह छोटा सा उदाहरण दिया गया है ताकि आप सभी का ध्यान इस और किया जा सके कि अब सरकार एक व्यापारी कि तरह हो गयी है,जो अपने व्यवसाय में घाटा होने पर उसे बंद कर देता है
वही कार्य अब राष्ट्र कर रहा है


लोकतंत्र हो या राजतन्त्र,या फिर कुलीन-तंत्र लेकिन शासन एवं प्रशासन हमेशा क्षत्रिय पद्दति ही से चलाया जाना चाहिए,क्योंकि अन्य किसी भी पद्दति से राज्य एवं जनता का हित हो ही नहीं सकता!यदि ब्राहमनी तरीके से सरकार चलाई गई ,तो सतो गुण कि अधिकता होने से सन्यासी और संतोषी परवर्ती उभरेगी,जिससे राष्ट्र अन्य राष्ट्रों से पिछड़ जायेगा तथा उसका विकास रुक जायेगा
वैश्य पद्दति से शासन एवं प्रशासन में व्यापार कि सी भावना आ जायेगी ,जिसमे हर कार्य एवं नियम को हानी- लाभ के तराजू पर तौल कर देखा जायेगा
जिसमे लाभ नजर आएगा वही कार्य होंगे ऐसे में जन सुविधा और जनोपयुगी कार्य बंद हो जायेंगे
न्याय समाप्त हो जाता है
लेकिन क्षत्रित्व से शासनेवं प्रशासन में क्षय से त्राण करने कि भावना रहती है
तथा अच्छाई से बुराई का कब्ज़ा हटाने,बिष तत्त्व से अमृत तत्त्व की रक्षा की भावना रहती है,तथा सभी वर्गों एवं तत्वों में संतुलन रहता है
हर जगह समझौतावादी होने से राष्ट्र एक गंभीर समस्या में पद जायेगा
जैसे की विमान अपहरण कांड में भारत की कितनी बदनामी हो चुकी है


भारतीय सभ्यता के मुताबिक शासन चाहे किसी भी जाति के व्यक्ति द्वारा चलाया जाये किन्तु उसकी पद्दति एवं कार्य प्रणाली क्षत्रियत्व की ही होनी चाहिए ,जो भारतीय राष्ट्र में कई सौ वर्षो से देखने को नहीं मिल रही है
भारतीय सभ्यता का केवल शासन और प्रशासन में पतन नहीं हुआ है बल्कि हर क्षेत्र में भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति पाश्चत्य सभ्यता एवं संस्कृति के नीचे दब गयी है
आज की शिक्षा से नैतिक शिक्षा को बिलकुल ही निकाल दिया है
धार्मिक एवं आध्यात्मिक शिक्षा को तुष्टिकरण के कारण जड़ से ही हटा दिया गया है
अर्थात अब शिक्षित व्यक्ति अनैतिक,अधार्मिक खूब मिल जायेंगे
जब जीवन के आदर्शो का ही व्यक्ति अध्ययन नहीं कर पाया तो वह स्नातक,एवं स्नातकोत्तर की डिग्रियां कैसे पा गया ? स्नातक की डिग्री इतनी आसान है की अब एक स्नातक को न तो आद्ध्यात्मिक ज्ञान है,न ही उसे पूरी नैतिक शिक्षा मिली है तथा चारित्रिक ज्ञान की तो इस युग में बात करना भी बेवकूपी जान पड़ती है
ऐसी पुख्ता व्यवस्था नहीं की इन डिग्रीयो से मनुष्य के ज्ञान का आकलन किया जा सके!
भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति से जो सबसे अधिक प्राचीन भारतीय सभ्यता परिवार नाम की संस्था वह भी अब इस पाश्चात्य सभ्यता एवं आर्थिक युग में कहीं खो गयी है

नौकरी एवं व्यवसायिक कारणों से संयुक्त परिवार टूट गए है
परिवार में पति पत्नी और उनके दो बच्चो के अतिरिक्त कोई नहीं है
वृद्ध माता पिता से पूंछो की इस वर्तमान में उभरे एकाकी परिवारों ने इनके अंतिम क्षणों को किस कद्र दमघोटू बनो दिया है? अपने ही घर में बैठ कर सिवाय मौत के इंतजार करने के उनके पास और कोई कार्य नहीं रहा
अपने बच्चो को पड़ा लिख कर आज के दंपत्ति न जाने क्या बनाना चाहते है?लागत या तो सभी चिकित्षक,इंजीनियर,या फिर प्रशासक बनाने पर तुले हुए है
लेकिन कोई भी यह नहीं सोच रहा जिसने तुम्हे जन्म दिया है उसके प्रति तुम्हारा ज्यादा फर्ज है या तुमने जिसे जन्म दिया उसके प्रति
पहले संयुक्त परिवार होते थे तो दादा दादी दुनिया भर की कहानियो एवं अपने अनुभव के द्वारा उन्हें शिक्षित करते थे \क्योंकि आज शिक्षण संस्थाओ में केवल रोजगारोन्मुख शिक्षा ही मिलती है
वास्तविक एवं असली शिक्षा दादा दादी की कहानियो एवं उनके अनुभवों में थी
इसके दो लाभ थे एक तो दादा दादी को जीवन उबाऊ नहीं लगता था दुसरे बच्चो को दुनियादारी की शिक्षा के साथ ही मनोरंजन भी मिलता था


संयुक्त परिवार के टूटने से एक अनैतिकता जो पनपी ,उस ओर शायद विचारको एवं विद्द्वानो का ध्यान गया या नहीं ,मै नहीं कह सकती
लेकिन मैंने आज तक किसी समाजशास्त्री को इस पर बात करते नहीं देखा है
इस लिए मै आपका ध्यान इस ओर आकृष्ट करना चाहती हूँ
अब परिवार में माता पिता एवं दो या इससे कम बच्चे ही है
सामने वाले पडोसी,किरायेदार,या माकन मालिक के हमउम्र बच्चे या वयस्क न तो उनके भाई है और नहीं बहिन,उनसे किसी भी प्रकार की हंसी मजाक एवं जरासी ढील से शारीरिक सम्पर्क या अश्लीलता तक बड़ा जा सकने की सम्भावना से इंकार नहीं किया जा सकता
मनुष्य भावनाओ का कायल है और भावनाओ का फायदा उठाने वालो की कमी नहीं है
एवं शारीरिक सम्पर्क को आज की सभ्यता में एक अनैतिक कदम न मान कर एक शारीरिक आवश्यकता की मान्यता दे दी है
इन्टरनेट ज्ञान और संपर्क का नहीं बल्कि अश्लीलता का माध्यम बनाया गया! जबकि चारित्रिक पतन कियाः चरम सीमा है
इसके अतिरिक्त एक और भी पहलु है,जब परिवार में माता पिता एवं बच्चो के अलावा घर के बुजुर्ग दादा दादी नहीं रहते है तब माता पिता अपने अल्प आयु के बच्चो के रहते उसी कक्ष में रति क्रिया करते है तो कच्ची उम्र के साफ द्रष्टिकोण के बच्चो पर बहुत बुरा असर डालता है
और यदि बच्चो को दुसरे कक्ष में सुलाया जाता है तब भी बच्चे कुंठित हो जाते है
जबकि संयुक्त परिवार में बच्चे दादा दादी के साथ बड़े प्रेम से कहानिया सुनते हुए ,अच्छे संस्कार प्राप्त करते है
जब व्यक्ति बच्चा होता है तब भाई बहिनों,माता-पिता,एवं दादा-दादी के साथ रहता हुआ जीवन को कभी निराशा भरा नहीं समझता और स्नेह,प्रेम,सहनशीलता,जैसे जीवन मूल्यों को सीखता है
ऐसी स्थिति में तीनो पीड़ियाँ उमंग भरा जीवन जी सकती है
लेकिन आज यह सभ्यता एवं सस्कृति समाप्तप्राय:हो चुकी है


प्राचीन मनोरंजन एवं सामूहिक यात्राओ का लोप भी भारतीय सभ्यता को एक गंभीर झटका है
पूर्व काल में मनोरंजन के साधन बड़े सिमित थे किन्तु थे बड़े रोचकता लिए हुए
मिसाल के तौर पर नाटको का मंचन एवं राम लीला-रासलीला \जिनमे हजारो लोगे ek साथ बैठ कर मंच के सामने ,उसी समय कलाकारों का तालियों की करतल ध्वनि द्वारा प्रसंशा करके उनके उत्साह को बढाया जाता था
लोगो में सामूहिकता की भावना रहती थी
आज चलचित्र और दूर दर्शन व्यक्ति का मनोरंजन तो किया है लेकिन इस मनोरंजन से व्यक्ति-वाद को बढ़ावा मिला है
व्यक्ति अपने रूम के अन्दर ही मनोरंजन कर रहा है
सामूहिकता एवं सामाजिकता की कामिओ आरही है
दुसरे सामूहिक पद-यात्राये लगभग खत्म हो चुकी है
सामूहिक पद-यात्रा से ईश्वर के प्रति आस्था अधिक हो या नहीं हो यह अलग बात रही किन्तु इस तरह की यात्राओ से मनुष्यों के बीच एक मेल-मिलाप तथा प्रेम-भावना को जो बल मिलता था वाही मनुष्य के जीवन में समरसता भर देता था \पर हा शोक कि आज हम अपनी इस भारतीय सभ्यता को लगभग खो चुके है


भारतीय सभ्यता को केवल उपरोक्त chand बिन्दुओ से ही नहीं समझा जा सकता ,क्योंकि भारतीय सभ्यता एक महान सभ्यता है
भारतीय सभ्यता का हर क्षेत्र में हराश हुआ है
अब राष्ट्रीय नायक युद्धों में विजयी योद्धा एवं वीर गति को प्राप्त करने वाले राष्ट्र-भक्त नहीं रहे बल्कि सिनेमा एवं फिल्म जगत में कम करने वाले कलाकार होगये है
यदि किसे एक स्थान पर परमवीर चक्र विजेता या कोई शहीद कि पत्नी तथा किसी प्रख्यात फिल्म का अभिनेता या अभिनेत्री एक साथ हो तो अब भारतीय जन मानस बजाय राष्ट्रीय बलिदान कर्ता के अभिनेता या अभिनेत्रियों कि तरफ ज्यादा उन्मुख होंगे
यह भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति के द्वारा ली जाने वाली अंतिम श्वांस है
भारत ही नहीं इस समय सारा विश्व एक नई उच्छंकृलता कि ओर तेजी से बढ़ रहा है
जिसमे सबसे अधिक भारतीय सभ्यता का विनाश हुआ है
अत:यदि तुरंत ही कोई प्रभावी कदम उठा कर भारतीय सभ्यता को नहीं बचाया गया तो जो थोड़ी सी आशा कि एक किरण राष्ट्र वादियों में दिखाई दे रही है ,वह भी समाप्त हो जाएगी


---कंवरानी निशा कुंवर नरुका [राजस्थान ]

क्षत्रिय वीरज्योती मिशन

राष्ट्रगौरव महाराणा प्रताप सिंह

                                                      ---जयपालसिंह विक्रमसिंह गिरासे[शिरपुर]
                                    

प्रख्यात क्रांतिकारी कवि श्री केसरीसिंह जी बारहठ जी ने कहा था ----

"पग -पग भम्या पहाड़ --भम्या पग -पग भांखरा !
महाराणा अर मेवाड़ ; हिरदै बसिया हिन्द रै !!"

संपूर्ण भारतवर्ष की जनता के ह्रदय के नायक बने महाराणा प्रताप सिंह जी और मेवाड़ ने सम्राट अकबर की शक्तिशाली सत्ता से संघर्ष कर अपने कुलगौरव  और देश का सत्व एवं स्वत्व की रक्षा की थी! भारत के इतिहास में महाराणा प्रताप की इस महान संघर्ष गाथा को स्वर्णाक्षर में लिखा गया है जो आज भी सम्पूर्ण विश्व के नागरिकोंको स्वाधीनता की प्रेरणा देती है!

जब तत्कालीन जगत के कई सत्ताधीश शहंशाह अकबर के साथ मिल कर अपनी आन-बाण और शान खो बैठे थे उस समय महाराणा प्रताप ने हमारे भारतवर्ष का अद्वितीय सन्मान अपने संघर्ष से कायम रखा! अत्यंत विपरीत स्थिति में उन्होंने अपना संघर्ष जारी रखा! जिंदगी के २५ साल का वनवास बिताकर -----आम जनता तथा पर्वत पहाड़ों में बिखरे आदिवासी भिलोंका साथ लेकर उन्होंने स्वाधीनता का यज्ञ प्रज्वलित रखा! शक्तिशाली साम्राज्यवाद के खिलाफ उनका वह जन युद्ध था!

उनके गौरव में कवी दुरसा आढ़ा लिखते है;-

" माई एहडा पूत जन
जेहडा राणा प्रताप !
अकबर सुतो औंध के;
जाने सिराने सांप !"

कवी गर्भवती माताओंको आवाहन करता है की माता को अगर जन्म देना है तो राणा प्रताप जैसे वीर बालक को जन्म दे ....जिनका नाम याद आते ही सोया अकबर चौंक जाता है जैसे कोई सांप उसके सर के पास बैठा हो !

जेष्ठ शुद्ध !! ३ वि. स.१५९७ {इ.स. ९ मई १५४०} के पावन दिन पर कुम्भलगढ़ में महाराणा प्रताप का जन्म हुवा! वह काल मेवाड़ के लिए विपरीत स्थिति वाला था! बाबर के साथ खानवा के युद्ध में मेवाड़ की अत्यंत क्षति हुई थी! महाराणा विक्रमजीत की हत्या , रानी कर्मावती का जौहर और गद्दार बनवीर का सत्ता रोहन जैसी घटना से मेवाड़ को और भी क्षति पहुची थी! कु .प्रताप के जन्म के समय ही महाराणा उदयसिंह ने बनवीर का निर्दालन कर चित्तोड़ की बागडोर फिर से सम्भाली थी!

इ.स. १५५६ में अकबर दिल्ली के तख्त पर आसीन हुवा! समूचे भारत को मुग़ल सत्ता की छत्रछाया में लाने की उसकी योजना थी! इस हेतु साम-दाम-दंड-भेद जैसी निति का स्वीकार कर भारत वर्ष के कई छोटे-बड़े राज्य उसने अपने पक्ष में कर लिए थे! अकबर का यह पथ साधारण नहीं था! उसे अपने और परायों से धोका था! राजपूतों से दुश्मनी मोल लेना उसके सपने साकार नहीं होने देते इस हेतु उसने राजपूत राजाओं से मित्रता की कोशिश की! कुछ हद तक वह सफल भी रहा! "अगर दक्षिण भारत की ओर भी पहुचना है और गुजरात पर भी नियंत्रण रखना है तो राजपुताना अपने प्रभाव में होना चाहिए ", यह उसकी धारणा थी! अकबर की उस धारणा को छेद दिया था मेवाड़ ने! अकबर के दिमाग में मेवाड़ की चिंता थी! मेवाड़ पर विजय से ही हमें हिन्दुस्थान के शहंशाह के रूप में मान्यता मिल सकती है.....इस हेतु मेवाड़ का दमन करना अनिवार्य है! यह अकबर की कल्पना थी! मेवाड़ का राजवंश हिन्दुस्थान का सबसे प्राचीन राजवंश था! हिन्दुस्थान की अस्मिता का वह प्रतिक था! मेवाड़ के ही राणा सांगा की अध्यक्षता में विदेशी आक्रमक बाबर के खिलाफ खानवा  की जंग  छेड़ी गयी थी! जिसमे भारत के तमाम राजा राणा सांगा के नेतृत्व में उस जंग में शामिल हो गए थे! हिन्दुस्थान की आन-बाण और शान के लिए अपनेको कुर्बान करनेकी शक्ति मेवाड़ की मिटटी में थी! इसलिए मेवाड़ पर विजय अकबर के लिए महत्वपूर्ण था! मेवाड़ विजय से गुजरात एवं मालवा पर भी सीधा नियंत्रण हो सकता था! अकबर की इस कल्पना को मेवाड़ के महाराणा उदयसिंह ने छेद दिया! इसलिए अकबर ने इ.स. १५६८ में चित्तोड़ पर हमला बोल दिया! जयमल---पत्ता और कल्ला के पराक्रम से और तीसरे साके से यह युद्ध प्रसिद्ध हुवा! विजय के बाद अकबर के आदेश के अनुसार किले पर रहने वाली  ३०००० सामान्य जनता का कत्ल किया गया! मंदिरों---महलों का विध्वंस किया गया! अकबर ने चित्तोड़ तो जित लिया लेकिन वहा के स्वामी को नहीं!

महाराणा प्रताप का राज्यारोहन:

वनवास में समय बिताते .....मुग़ल सल्तनत के खिलाफ जंग के हेतु तैय्यारी करते फिरते महाराणा उदयसिंह की इ.स. १५७२ में गोगुन्दा में मृत्यु हुई! अपने बाद कुंवर जगमाल को सत्ता सौपी  जाये यह उनका आदेश था! लेकिन अंतिम संस्कार पर उपस्थित मेवाड़ के सामंतो ने इस विचार को विरोध जताकर कुंवर प्रताप सिंह को ही मेवाड़ के महाराणा घोषित कर दिया! जनता भी यह  चाहती थी! जेष्ठ पुत्र होने के नाते और तबकी परिस्थिति के अनुरूप कु.प्रताप सिंह ही उस पद का सही हक़दार था! गोगुन्दा में राजतिलक और कुम्भलगढ़ में राज्याभिषेक मनाया गया!

मेवाड़ के इस नये स्वामी के सामने अनगिनत समस्याए थी! मेवाड़ का मानबिंदु चित्तोड़ मुग़ल सत्ता के कब्जे में---जनता शत्रु के निरंतर आक्रमण से जर्जर ---बिखरी हुई सेना...अंतर्गत कलह से सगे भाई जगमाल और शक्तिसिंह भी शत्रु के डेरे में----राज्य की अर्थव्यवस्था कमजोरी की दहलीज पर! ऐसे कठिन समय में प्रताप मेवाड़ के स्वामी बने! लेकिन ऐसी स्थिति में भी उन्होंने अपने स्वाभिमान और मर्यादा की रक्षा की! अपने आन-बाण और शान की रक्षा हेतु उन्होंने भी मुग़ल सत्ता के खिलाफ कड़ी जंग का ऐलान किया! जब तक चित्तोड़ जीतकर वापस नहीं लेते तबतक राजमुकुट--राजवस्र और राजमहल की जिंदगी का उन्होंने त्याग किया! चित्तोड़ जितने के लिए उन्होंने प्रतिज्ञा की! अपने इस स्वाधीनता के यज्ञ में प्रजा की भी अनमोल साथ उन्होंने प्राप्त कर ली थी! प्रजा उन्हें प्यार से "किका"{पुत्र} कहकर पुकारती थी! राणा का सैन्य गठन शुरू हो गया था! पडोसी राज्य से संपर्क स्थापित कर अरवली की गिरीकंदराओं में प्रताप के स्वाधीनता यज्ञ की ज्योति प्रज्वलित हुई!

जब प्रताप की इन गतिविधियों के बारे में शहेंशाह अकबर को जानकारी मिली तो वह भी विचलित हुवा! उस वक़्त वह बिहार और बंगाल के युद्ध में व्यस्त था! अपनी दूरदर्शिता के साथ उसने महाराणा से मित्रता का पैगाम भेजा! इस हेतु जलाल खान कोरची, कुंवर मानसिंह,राजा भगवानदास,राजा टोडरमल जैसी हस्तिया मेवाड़ आकर प्रताप से मिली और उन्होंने शहेंशाह के प्रस्ताव को राणा के सामने प्रस्तुत किया! प्रखर स्वाभिमान के अधिकारी प्रताप ने शहेंशाह के प्रस्ताव को ठुकरा दिया! दोस्ती के प्रस्ताव के नाम पर हम हमारी आझादी नहीं खो सकते! प्रताप ने मुग़ल दरबार के सामने चुनौती रखी!

हल्दी घाटी का युद्ध

लगातार चार साल प्रयास करने से भी प्रताप अपने अधीन नहीं हुवा इस बात को लेकर कुंवर मानसिंह की अध्यक्षता में विशाल सेना अजमेर से शहेंशाह अकबर ने मेवाड़ पर आक्रमण हेतु इ.स. १५७६ में भेज दी! खमनोर के पास हल्दीघाटी में दोनों सेनाओं की भिड़त हुई! महाराणा की सेना की अगुवाई कर रहे थे पठान वीर हाकिम खान सूरी ! १८ जून १५७६ की सुबह लोसिंग से महाराणा की सेना मुग़ल सेना पर आक्रमण करने निकली और मुग़ल सेना भी मोलेला से प्रताप से भिड़ने  आ पहुची! मेवाड़ के आक्रमण का प्रहार इतना भीषण था की मुग़ल सेना ५ से ६ कोस दूर तक भाग खड़ी  हुई! हाकिम खान सूरी,राजा रामशाह तंवर ने मुग़ल सेना के भीतर प्रलय मचाया! मिहतर खान ने स्वयं शहेंशाह युद्ध के लिए आ रहे है ऐसी बाते कह-पुकार कर भागती सेना का साहस  बढाया! फिरसे घनघोर रणसंग्राम का प्रारंभ हुवा! स्वयं प्रताप ने कई मुग़लों को मोक्ष का द्वार दिखाया!

महाराणा प्रताप की जयशाली तलवार शत्रु की गर्दने काट-काट कर रणभूमि में फेक रही थी !उनकी नजर कुंवर मानसिंह को खोज रही थी! जब मुग़ल सेना के बिच हाथी पर सवार कुंवर मानसिंह को राणा ने देखा तो राणा के बिच भीषण उत्साह का संचार हुवा और वे मानसिंह पर सीधा प्रहार करने मुग़ल सेना के दर्या में  जा पहुंचे! अपनी तलवार के प्रहार से रास्ता साफ कर वे कुंवर मान के हाथी तक जा पहुंचे! चेतक ने आगे  की दोनों टांगे उछाली और राणा ने अपने भाले का जोरदार प्रहार हाथी पर सवार मानसिंह पर किया! मानसिंह भाग्यशाली था की वह बच गया! उसने तुरंत निचे घोड़े पर छलांग लगाईं   और वहा से सुरक्षित जगह जा पंहुचा--- भाला महावत के शरिर से आरपार होकर अम्बारी पर जा टकराया और टूट गया! उसी क्षण हाथी के सूंड में लटकी तलवार ने चेतक के एक पैर को काट दिया! माधोसिंह कछवाहा ने अपने साथियों का साथ लेकर राणा को घेर लिया -----राणा और चेतक पर अनगिनत प्रहार होने लगे! यह बात झाला मान के ध्यान में आ गयी और उसने विनाविलंब राणा के राजचिन्ह अपने सर पर धारण कर लिए! झाला मान की शक्ल  राणा से मिलती थी! उसने हाकिम खान की मदद से जखमी राणा और चेतक को बाहर निकाला और स्वयं राणा के चिन्ह धारण कर लड़ने  लगा! मुग़ल सेना  झाला मान को ही प्रताप समझ कर टूट पड़े! झाला ने अपने स्वामी की रक्षा हेतु बलिदान दिया और इमानदार अश्व चेतक ने भी अपने स्वामी को सुरक्षित स्थल पर ले जाकर अपने प्राण  त्याग दिए ! इस घटना क्रम में शक्तिसिंह का भी जमीर  जाग उठा और उसने राणा का पीछा कर रहे मुग़लों को मार गिराया! दोनों भाई आपस में मिले! उधर रण भूमि में भीषण तांडव मचा था! हकिमखान सुर,राजा रामशाह तंवर और उनके तिन पुत्र, मेवाड़ के अनगिनत वीर इस युद्ध में खेत रहे! आज़ादी के उन दिवानो ने जान सस्ती और इज्जत महेंगी कर दी थी!

युद्ध अनिर्णीत रहा! युद्ध के बाद कुंवर मानसिंह ने मुग़ल सेना का डेरा गोगुन्दा में डाला! वहा प्रताप का इतना भय था की उन्होंने बस्ती की चारो ओर सैनिक तैनात किये....उची दीवारे खड़ी की ताकि कोई घोडा छलांग मार कर दीवार लाँघ ना सके!भील सैनिकोने मुग़लों की रसद लुट ली! मुग़लों के खाने के भी लाले पड़ रहे थे! मेवाड़ की सैनिक टुकडिया मुग़लों पर गुरिल्ला हमले कर उन्हें जीना हराम कर रही थी! मुग़लों की इतनी दुर्दशा की गयी की खुद शहेंशाह ने कुंवर मान,आसिफखान और मुग़ल सेना को वापस बुलवा लिया! कुंवर मान और असिफखान की ड्योढ़ी  कई दिनों तक बन्द रखी गयी! स्वयं अकबर उन दोनों से रुष्ट था!

इस भयानक युद्ध के बाद शहेंशाह अकबर ने कई आक्रमण मेवाड़ पर किये  लेकिन ना वह मेवाड़ को जित सका ना उसके स्वामी को पराजित कर सका! शाहबाज खान,जगन्नाथ कछवाहा,अब्दुल खानखाना  स्वयं शहेंशाह ने भी कई बार आक्रमण किये लेकिन मेवाड़ परास्त नहीं हो सका! मेवाड़ की सेना ने मुग़लों के छक्के छुडाये!इसी दरम्यान राणा ने दिवेर, भीमगढ़,कुम्भलगढ़,मोहि जैसी  कुल छतीस लड़ाईया जीती! कुंवर मान को सबक सिखाने हेतु उसकी मालपुरा पेठ को लूटकर उजाड़ दिया! भामाशाह ने मालवा सुभे पर हमला बोलकर पच्चीस लाख की राशी लूटी और चुलिया ग्राम में राणा को अर्पित की! इस धन से फिरसे मेवाड़ की नई सेना का गठन हुवा! इस दरम्यान महाराणा ने चावंड में मेवाड़ की राजधानी की स्थापना की! चावंड में राज्य और प्रजा की व्यवस्था, मंदिर...महाल का निर्माण.....खेती का विकास....जलसंधारण....आदि कई विकास कार्य प्रारंभ किये! शहेंशाह भी अब थक गया था! उसने आखरी पर्व में मेवाड़ पर अधिपत्य का सपना देखना छोड़ दिया!

एक बार कृषक को सताने वाले नरभक्षक शेर की शिकार करते....धनुष्य की प्रत्यंचा खीचते...उनके आंत्र में तकलीफ हुई और वे बीमार हो गए! मृत्यु के पूर्व अपने सरदारों को पास बुलाकर अपनी प्रतिज्ञा की याद दिलाई और उनसे वचन मिलने पर ही इस महान योद्धा ने अपने प्राणों का त्याग किया! १९ जनवरी १५९७ के दिन चावंड में महाराणा की मृत्यु हो गयी!

महाराणा का व्यक्तित्व

महाराणा प्रतापसिंह ने अपने पूर्वजों की शान कायम रखी! लगातार २५ साल उस वक़्त की दुनिया की सबसे बड़ी ताकद से लड़ना कोई मामूली बात नहीं थी! भील-राजपूत-पठान-चारण-लुहार-ब्राह्मन और अन्य जनता की गठजोड़ कर स्वाधीनता का मंत्र जीवित रखा! बूंदी,सिरोही,जालौर,डूंगरपुर,बांसवाडा और इडर जैसे पडोसी राज्य से सुदृढ़ सम्बन्ध बनाये रखे! अकबर के अधीन सत्ताधीश वर्ग का बहिष्कार किया! महाराणा की यह जंग इस्लाम के विरुद्ध नहीं थी! यह जंग अकबर के साम्राज्यवाद के खिलाफ थी!परधर्म का उन्होंने हमेशा आदर किया था! उनके इस यज्ञ में जालौर के ताज खान, हाकिम खान सूरी, पिरखान जैसे योद्धा भी थे! नसीरुद्दीन जैसे महान चित्रकार को उन्होंने पनाह देकर उसकी कला का भी सन्मान किया था! नसीरुद्दीन ने 'रागमाला' चावंड चित्रशैली का विकास किया था ! महान जैन मुनि हरिविजय सूरी जी को उन्होंने गुरु के रूप में माना था! पंडित चक्रपानी मिश्रा के द्वारा कई ग्रंथों की रचना करवाई!
मेवाड़ के इस रणसंग्राम में केवल सैनिक ही नहीं अपितु प्रजा भी हथियार लेके कूद पड़ी थी!
अपनी आज़ादी के इस संग्राम के लिए अपने गाव...घर का त्याग कर वनवास का जीवन उन्होंने स्वीकार किया था!
जब विख्यात वीर अब्दुल रहीम खानखाना ने मेवाड़ पर आक्रमण किया तब उसकी छावनी शेरपुर के नजदीक थी! कुंवर अमरसिंह ने उस डेरे पर सीधा हमला बोल दिया था और खानखाना की बेगमों को हिरासत में लेकर महाराणा के पास पंहुचा था! महाराणा ने इस घटना की कड़ी निंदा की थी और उन औरतों को सन्मान के साथ सुरक्षित वापस भिजवा दिया था ! राणा की इस कृति का खानखाना पर गहरा प्रभाव सिद्ध हुवा! उसने राणा की तारीफ कर ख़त लिखा:-

"धरम रहसी ,रहसी धरा;खप जसी खुरसान!
अमर विसम्बर उपर्यो; राख नह्च्यो राण !"

[अर्थात: हे महाराणा यवनों का विनाश होगा और तुम्हारा धर्मं और धरती कायम रहेगी! सिर्फ अमर प्रभु पर विश्वास रखो!]

जब महाराणा के मृत्यु की वार्ता शहेंशाह अकबर के दरबार में पहुंची तब शहेंशाह का मन विश्वास नहीं कर रहा था! उसे भी बहुत दुःख हुवा! कवी दुरसा आढ़ा उस समय अकबर के दरबार में मौजूद था !उसने शहेंशाह की मनोदशा का अवलोकन कर निम्नलिखित पंक्तिया पेश की थी!

"अस लागौ अनदाम
पाग लेगौ अननामी!
गो आढ़ा अवडाय
जीको बह्तौ धुर वामी !!

नवरोजे नही गयो
न गो आतसा नवल्ली!
न गो झरोखा हेठ
जेथ दुनियां दहल्ली!!

गहलोत राणा जीती गयौ
दसन मुंड रसना डसी!
निसास मूक भरिया नयन
तो मृत सह प्रतापसी!!

अर्थात: जिसने कभी अपने घोड़ों को शाही दाग नहीं लगाया.......जो अकबर के दरबार द्वारा मनाये नवरोज के उत्सव में कभी सम्मिलित नहीं हुवा....जो कभी अकबर के झरोंको के निचे खड़ा नहीं हुवा! वह गहलोत कुलगौरव राणा जित गया और जिसकी मृत्यु वार्ता से खिन्न शहेंशाह ओझल नयनों से देख रहा है!

धन्य वह वीर.....धन्य वह धरती!
महाराणा प्रताप सिंह जी का समाधी स्थल: चावंड {राजस्थान}




तव समाधी के सन्मुख,
नतमस्तक है भावुक!
हो न कभी पथ विन्मुख,
दो असीस प्यारा!!


कण-कण भी यदि अणूमें
तेज हो तुम्हारा!
चमकाए तिमिर भरा,
भूमंडल सारा!!

(C)लेखक: जयपालसिंह विक्रमसिंह गिरासे {सिसोदिया}
 प्लाट: ५०,विद्याविहार कालोनी,शिरपुर जी. धुले {महाराष्ट्र}
   इमेल: jaypalg@gmail.com
      Blog: http://jaypalg.blogspot.com/
                                                                                Mobile: 09422788740

शिरपुर में धूम धाम से मनाई गयी महाराणा प्रताप जयंती...!





हर साल की तरह इस साल भी शिरपुर(महाराष्ट्र) में राष्ट्रगौरव श्री महाराणा प्रतापसिंह जी की ४७० वी जयंती बड़े धूम धाम से मनाई गयी! इस अवसर पर "राष्ट्रगौरव श्री महाराणा प्रतापसिंह जयंती उत्सव समिति" की और से प्रतिमापुजन; भव्य शोभायात्रा; क्षात्रप्रतिभा सन्मान; प्रकट सभा आदि कार्यक्रमों का आयोजन किया गया था !

दोपहर ३ बजे शिरपुर के विधायक श्री अमरीश भाई पटेल, दोंडाइचा के विधायक श्री जयकुमार रावल, विधायक श्री कांशीराम पावरा;शिरपुर के प्रमुख राजनैतिक कार्यकर्ता एवं प्रमुख सरकारी अधिकारी द्वारा महाराणा प्रताप की प्रतिमा का पूजन किया गया! वहा उपस्थित अतिथियो ने सम्भोदित किया! वहा से भव्य शोभायात्रा का प्रारंभ हुवा! इस शोभा यात्रा में महाराणा और सैनिकों के वेशभूषा में सजे युवक रथयात्रा में खांस आकर्षण थे! रथ के आगे पीछे घोड़े पर बैठे युवक; नाचने वाले घोड़े लोगों के आकर्षण का केंद्र बन गए थे! ढोल-ताशे और बैंड की धून पर युवक मनो झूम रहे थे! इस शोभायात्रा में ५००० से ज्यादा लोग शरीक थे!

सायं ७ बजे शोभायात्रा शहर के प्रमुख मार्ग पर से होकर आमोदा स्थित महाराणा प्रताप मैदान पर पहुची! दीपप्रज्वलन के साथ समारोह का उद्घाटन प्रमुख अतिथियों ने किया! शिरपुर के जाने मने सामाजिक कार्यकर्ता तथा समिति के संयोजक श्री जयपाल सिंह गिरासे ने अपने प्रस्ताविक भाषण में आज तक की सारी गतिविधियों का परामर्श लेकर प्रमुख अतिथियों का परिचय करवाया! इस साल समारोह के प्रमुख अतिथि थे अंतर्राष्ट्रीय क्षत्रिय राजपूत संघ के संस्थापक कुंवर जितेन्द्रसिंह चौहान[कानपूर,उत्तर प्रदेश]..! उनके साथ दोंडाइचा संस्थान के कुंवर विक्रांत सिंहजी रावल, मालपुर दरबार गढ़ संस्थान के ठाकुर महावीर सिंह रावल (उपाध्यक्ष:जिला परिषद्,धुले) ,करवंद संस्थान के श्री काशीनाथ रावल, श्री बी.के.सिंह[आजमगढ़, उत्तर प्रदेश ] , प्रिंसिपल सुभेर सिंह पाटिल, श्री नारायण सिंह चौधरी,श्री नरेन्द्रसिंह सिसोदिया,श्री एकनाथ जमादार, श्री चंदनसिंह राजपूत, श्री विजयसिंह राजपूत, श्री विजयसिंह गिरासे,श्री अजबसिंह,श्री दरबार सिंह सिसोदिया,श्री नरेन्द्र सिंह ,श्री नेतेंद्रसिंह,श्री अमृत सिंह जमादार,श्री जगतसिंह राजपूत,श्री प्रकाशसिंह,श्री मंगलसिंह देशमुख, पुलीस अफसर श्री इंगले , डॉ श्याम राजपूत ,राजू टेलर,सुनिलसिंह पाटिल, आदि मान्यवर उपस्थित थे! समिति के कार्यकर्ताओं द्वारा अतिथिओं का स्वागत किया गया! राजपूत समाज के प्रतिभावान छात्र तथा अन्य गुनिजन का खांस ट्रोफी देकर सन्मान किया गया!इस वक़्त विभिन्न पत्रिकाओं का प्रकाशन भी किया गया!

अपने प्रमुख भाषण में कुंवर जितेन्द्रसिंह चौहान ने कहा:"अगर सच्चा क्षात्र धर्मं निभाना है तो सांस्कृतिक सरंक्षण के लिए आगे आना होगा! क्षत्रियों का भारत के निर्माण में सबसे ज्यादा योगदान रहा है! क्षत्रियो ने त्याग और समर्पण से एक अलग इतिहास का निर्माण किया! सबसे ज्यादा दानी; सबसे ऊँचा चरित्र, सबसे ज्यादा वीरता और बलिदान, सबसे ज्यादा राजनिष्ठा और देशप्रेम के अगर उदाहरण इतिहास के पन्नों पर देखे जाये तो आप को केवल क्षत्रिय नर-नारी ही नजर आयेंगे! भुत के इस महान विरासत का केवल अभिमान करना तभी सार्थक होगा जब हम अपने आचरण से क्षत्रिय संस्कार को जीवित रखेंगे! अपने एक घंटे के भाषण में उन्होंने तरह तरह के विचार;सामाजिक आन्दोलन; महाराणा प्रताप जी के अद्वितीय त्याग के उदाहरण आदि विषय पर भी अपने विचार प्रकट किये! अपने तेज वकृत्व से उन्होंने सभी जनमानस का दिल जित लिया!

श्री जयपालसिंह गिरासे ने समारोह के समारोप पर सभी का आभार जताया! श्री रत्नदीप सिंह सिसोदिया {संपादक-पुलिस टूडे} ने समारोह का सञ्चालन किया! समारोह के बाद शिरपुर के होटल किंग श्री जितेन्द्रसिंह गिरासे जी ने सभी अतिथियों के सन्मान में खास भोजन समारोह का आयोजन किया था!

इस समारोह की सार्थकता के लिए अतुल सिसोदिया,राज देशमुख,अम्बालाल राजपूत,शैलेशसिंह गिरासे, संग्रामसिंह चौधरी, सुनील सिंह राजपूत, जयेंद्रसिंह रावल,केवलसिंह राजपूत,सचिन सिंह,योगेन्द्रसिंह सिसोदिया,धनसिंह,रणवीर राजपूत, प्रफुल राजपूत, जयदीप सिंह,शिवम् सिंह, सोहन सिंह, मुकेश राजपूत,जगदीश नाना,जगदीश देशमुख आदि कार्यकर्ताओ के साथ शिरपुर तथा अन्य परिसर के युवाओ ने विशेष परिश्रम किये!

'मै' और मेरा 'प्रण'

भारत के हे महासपुत.....!




क्षत्रिय मंथन शिबिर I गुरगाव (हरियाणा)

क्षत्रियोंकी संख्या -शक्ति और प्रवृत्ति इस राष्ट्र पर अपना प्रभाव कायम करती है! क्षत्रियोने हर सदी में यह साबित भी किया है! धूर्त अंग्रेज जब इस देश में आये तो उनका लक्ष्य था क्षत्रियों से व्यर्थ पंगा ना लिया जाये और उनको प्रभाव शुन्य किया जाये....! उन्होंने अपनी कूट निति के अनुसार इस देश की सत्ता छीन ली! मगर इस हेतु उन्हें कई पापड़ भी बेलने पड़े थे! उन्होंने क्षत्रियोंको आपस में लडवाया! जब कोई शासक कमजोर हो गया तो उन के लिए अपनी तैनाती फौज रखी गई! राजकुमारों के लिए मेयो कॉलेज जैसी संस्था खोली गयी जहा उन्हें अंग्रेज तौर तरीके सिखाये गए! हमारे लोग पच्छिम की सभ्यता का अनुसरण करने लगे! उनके लिए प्राय्व्ही पर्स शुरू करा दी गयी! यहाँ तक की उनके शासन का कारोबार देखने की....संरक्षण की जिम्मेदारी भी अंग्रेजोने अपने हाथ ले ली! इन सब बातोंसे राजा और प्रजा दरम्यान दुरी बढ़ गयी! इसका फायदा धूर्त अंग्रेज ने उठाया!


क्षत्रिय भी अपना पुराना धर्म छोड़ जाती बिरादरी में बिखर गए!  प्रदेश...स्थानिक परम्पराए...भाषा...व्यवसाय जैसी बातो ने क्षत्रिय बिरादरी को बिखेर दिया! इस बात के लिए अंग्रेज भी जिम्मेदार थे! उन्होंने हर कौम के अन्दर अलग पहचान बनाने की और वैसी ही भावना जताने की लाख कोशिशे की! उनका मकसद ही था की हम कभी एक ना हो! हमारे इतिहास की तोड़-मरोड़ की गयी! अशिक्षित जनता भी अपने गौरवशाली अतीत को भुलाने लगी! स्वाधीनता के बाद की राज्यव्यवस्था ने भी वही परंपरा निभाई! उन्होंने भी कभी राजनीती....जातिगत प्रभाव...कभी आरक्षण के नाम पर क्षत्रिय जातियों को आपस में लडवाया! जाती में बँटे क्षत्रिय भी आपस में लड़ते रहे! इस लड़ाई में वे अपनी पुराणी पहचान भी भूल गए! बीते दिनों में उन समस्त क्षत्रिय जातियों को एक ही मंच पर लाने के कोई प्रयास भी ना हुए! हर जात अपनी ही श्रेष्ठता का बिगुल बजती रही....अपने स्वार्थ की ओर ही घुमती रही! धूर्त नेताओ ने हमें मुर्ख बनाने का काम जारी रखा! वर्त्तमान में भी यही अलग पहचान पर क्षत्रिय जातिया जोर देती आ रही है!

वास्तव में हमारी पुराणी और सही पहचान केवल..सूर्यवंशी....चंद्रवंशी....अग्निवंशी....नागवंशी जैसे वंश थे! समय के चक्र में हम वंश भावना...गोत्र भावना भूल गए और जाती भावना तेज हो गयी! हर कौम में अब आरक्षण के लिए झगडे लगाये जा रहे है!

इस झमेले में हम हमारा सही धर्म....हमारा सही कर्त्तव्य भी भूल गए!

इसका परिणाम यह हुवा की क्षत्रियों की शक्ति और भी कम  हो गयी! हम मानते है की जो व्यवस्था है वह बनी रहे लेकिन इतिहास से सबक लेकर क्षात्र धर्म के लिए तो हम एक हो सकते है! क्षात्र धर्म कोई संकुचित जातिगत भावना नहीं! वह एक पवित्र बंधन है जिसने विश्व के इतिहास में अपनी महानता कायम की! अगर 'क्षत्रिय' नाम पर हम एक हो जाते है; तो इसका सकारात्मक असर राज्यव्यवस्था और सामाजिक व्यवस्था पर दिखाई देगा! हम रामायण ---महाभारत के महान क्षत्रियों की संताने है! क्षत्रिय हमेशा प्रकृति पूजक रहे है! ज्ञान,तपस्या,त्याग इ. उनके शाश्वत  मूल्य थे! सत्ता का सञ्चालन उन्होंने निर्मोही प्रवृत्ति से किया था! अपराधी को दंड और गुणीजन का सन्मान यह उनकी व्यवस्था थी! कई चक्रवर्ती सम्राटो ने वानप्रस्थ का स्वीकार कर राजपद का त्याग किया था! आज ऐसी मिसाल कही  नहीं मिल सकती!
क्या वर्तमान के राजनेता अपनी उम्र हो जाने पर राजनीती से सन्यास लेकर वानप्रस्थ की ओर चल पड़ेंगे ?


क्या वर्त्तमान के शासक अपने बच्चे या स्वयं के अपराध के लिए दण्डित होना पसंद करेंगे?

जब भारत आजाद हुवा तो हमारे ५०० से ज्यादा संस्थान थे! लोह्पुरुष सरदार पटेल जी के आवाहन पर सभी शासकोने अपने राजपद, राज्य, किले, राजमहल आदि का त्याग कर स्वतंत्र राष्ट्र की लोकतान्त्रिक व्यवस्था का हिस्सा होना पसंद किया!

श्री विनोबा भावे जी के भूदान आन्दोलन के समय हमारे हजारो जमींदारो ने अपनी जमीनों का बहुत सा हिस्सा गरीब जनता को अर्पण कर दिया था .....कई जमींदारो की जमिनोंपर पाठशालाए, अस्पताल,धरमशालाये बन गयी! शासन ने बाद में सीलिंग एक्ट लगाया! उस वक़्त भी जिस जमीं पर क्षत्रिय जीते थे.....जो जमीं उनके पुर्खोने सम्भाल कर उन्हें विरासत में दी थी......शासन ने उसपर अधिकार कर लिया! क्षत्रिय कौम ने यह भी हसते- हसते स्वीकार कर लिया! क्षत्रिय तो दानी ही होते है! उनका सुख त्याग में ही लिखा होता है! आज के समय में भी राष्ट्र महंगाई...भूख....गरीबी .....बिमारिया जैसी विपदाए झेल रही है!

क्या आज के शासक अपनी जमीने---संस्था...धन देश को अर्पण कर सकते है? क्या वे राष्ट्र के विकास के लिए अपनी निजी संपत्ति का विनियोग करेंगे?

इन सभी सवालोंके जबाब असंभव है...! आधुनिक...सुविधाभोगी...सत्तालंपट राजनेता ऐसी कोई महान परंपरा का अनुसरण नहीं कर सकते!

क्षत्रियों की वजह से यह देश-संस्कृति और व्यवस्था जीवित रह सकी!उनकी हजारो पीढियों ने इस धरती को अपने लहू से सींचा! इसका फल हमें क्या मिला? हमें आरक्षण से वंचित रखा गया....हमारे प्रभावशाली नेताओंको ज्यादा ताकदवर नहीं बनाने दिया गया! फिल्मे....उपन्यास..आदि में क्षत्रिय को खलनायक के रूप में प्रस्तुत किया गया! हर बार हमें निचा दिखाने की कोशीशे की गयी! हमें अन्यायी....अत्याचारी बताया गया..! क्या समाज में जातिभेद हमने निर्माण किये थे? हरगिज नहीं....! महाराणा प्रताप के तो अरावली के भील साथी थे और छत्रपति शिवाजी महाराज तो सह्याद्री के मावलों में पले बढे..! भगवान राम ने तो शबरी के झूटे बेर खाए थे! क्षत्रिय कभी जातिवादी नहीं थे.! उस व्यवस्था के निर्माता कोई और थे ! ब्राह्मण हर बार यही समझते है की भगवान परशु राम जी ने इस धरा से क्षत्रियों का निर्मूलन कर दिया है! क्षत्रियों को धार्मिक कर्मकांड में बंदिस्त करने की कोशिशे की गयी! क्षत्रिय राजा बलि को वामन ने मारा! बलि का क्या अपराध था? रावन और हिरन्य कश्यपू ब्रह्मण ही थे! ब्रह्मण समुदाय ने तो शिवाजी महाराज को भी क्षत्रिय माननेसे इंकार कर दिया था! उन्होंने ही अन्य जातियोंको मंदिर प्रवेश ...वेद अध्ययन से रोक दिया था! इसी वजह से अन्य जातिया सनातन धर्म को छोड़ किसी अन्य धर्म में चली गयी! धर्म लोगोंको प्यार देता है! जिन के हाथ धर्मं की बागडोर थी वे ही धर्म जान नहीं सके....!पहचान नहीं सके !  यह किसी जातिविरोधी या जातिगत भावना  से नहीं बल्कि राष्ट्रीय भावना से हम लिख रहे है! आज की सामाजिक विषमता कैसी पनपी?  कहा गया हमारा राष्ट्रवाद? जातिवाद को बढ़ावा किसी जाती ने नहीं बल्कि राजनीति ने दिया है!

इस अव्यवस्था को जितने क्षत्रिय उतने पंडित  भी जिम्मेदार  है!

आज तरह तरह की अनुचित फिल्मे---.T.V. हमें और हमारी पीढ़ियों को बर्बाद कर रही है!राजनैतिक व्यवस्था से जनता का विश्वास टूट रहा है! शासन से कोई उम्मीद रखना जैसे किसी बैल  से दूध की उम्मीद रखने के बराबर होती है! आंतकवाद- नक्षलवाद जैसे जहरीले सापों का खतरा और भी गहरा होता जा  रहा है! शासन प्रणाली में घूंसे चूहे शासन को सरेआम लूट रहे है! भ्रष्टाचार एक शिष्टाचार  बन गया है! गुंडे---लुटेरों को प्रतिष्ठा मिल रही है और सज्जन गर्रिबों का जीना हराम हो रहा है! इस देश में आम नागरिक असुरक्षित महसूस कर रहा है! इन सभी समस्याओं के हल के लिए क्षत्रिय समाज को  और भी मजबूत होना जरुरी है!

दुनिया में भारत ही एक ऐसी धरती है जहाँ नारी का सन्मान होता है! नारी तो यहाँ देवता स्वरुप माना गया है! एक सीता के लिए रामायण और एक द्रौपदी के लिए महाभारत हुवा था! जिस संस्कृति में नारी का सन्मान ना होता हो वह संस्कृति संस्कृति नहीं बल्कि विकृति होती है! आज के आधुनिक समाज और सभ्यता में नारी का सन्मान कम हो गया है! इसके लिए जीतनी व्यवस्था का बदलाव दोषी है उतनी ही आज की नारी! आज की नारी को अगर सन्मान चाहिए तो उसमे सीता...पद्मिनी या रानी लक्ष्मी जैसे गुण भी चाहिए! नारी ही अगर अर्धनग्न अवस्था में अपना शरिर जनता के सामने पेश कराती हो तो उसे सन्मान कहा से मिलेगा? यह कोई तालिबानी जैसा विचार नहीं;बल्कि एक संस्कृति और सन्मान की बाते है! इन सारी बातों से आज की नारी असुरक्षित महसूस करती है.....! सरकार भी उसकी हिफाजत नहीं कर सकती ! औरत पर अत्याचार करनेवाले कायर सरेआम घूमते है! कानून की उनपर कोई दहशत नहीं रही! इतिहास गवाह है की, महाराणा प्रताप और छत्रपति शिवाजी महाराज ने शत्रु की नारियों का भी सन्मान किया था और उनकी रक्षा की थी! नारी पर बुरी निगाह डालने वालों को उन क्षत्रियो ने करारा सबक सिखाया था! अगर आज भी शासन व्यवस्था पर क्षत्रियों का अंकुश रहा तो स्थिति में बदलाव संभव है! आज भी किसी कसबे में आम लोग न्याय के हेतु क्षत्रियों के पास आते है और समस्याओ के हल प्राप्त कर लेते है! यह बात सिद्ध करती है की आम लोगों का क्षत्रिय लोगो पर कितना विश्वास है! क्षत्रियो में भी कुछ अनुचित लोग हो सकते है! जो संस्कार विहीन होते है वे अनुचित ही माने जाते है! उनसे कोई उम्मीद नहीं रख सकता! केवल क्षत्रिय जाती में जन्म लेने से कोई महान नहीं बन जाता...क्षत्रिय एक व्रत है जो इसका सही दिशा में पालन करेगा वह क्षत्रिय कहलाने का हक़दार होगा!इसलिए जरुरी है की हर क्षत्रिय का संस्कार सिद्ध होना! हमें हमारे महान पूर्वजों के महान ज्ञान, परम्पराए और संस्कारों से वंचित रखने का प्रयास किया गया! मेकाले की शिक्षा ने हमें पच्छिम के संस्कार सिखा दिए! हमे अपने गौरवशाली अतीत के बजाय पच्छिम का फिरंगी इतिहास पढाया गया! हमें आधुनिक सभ्यता के नाम पर भी संस्कारविहीन किया गया!

आज की व्यवस्था क्षत्रिय और ब्राहमण को दोष देती है! दोनों को अपने कर्त्तव्य सिद्ध करने होंगे! इस राष्ट्र का महान अतीत फिरसे प्राप्त करने के लिए दोनों को अथक प्रयास करने होंगे!

क्षत्रिय संस्कारों को पुनरुज्जीवित करने हेतु गुरुकुल की स्थापना जरुरी है! गुरुकुल क्षत्रिय बालक और बालाओं को क्षत्रिय धर्म की शिक्षा और दीक्षा देंगे! गुरगाव {हरियाणा} में सम्पन्न प्रथम क्षत्रिय मंथन शिबिर में हमने इसी विषय पर जोर दिया! क्षत्रिय दानी थे...है और रहेंगे! वे किसी की भिक्षा पर निर्भर नहीं रहते है! इस जगत में फैले सभी क्षत्रिय भाई इस मिशन में अपना योगदान देंगे! उसी योगदान से गुरुकुल की स्थापना होगी! जो गुरुकुल क्षत्रिय समाज को उचित संस्कार...मार्ग और दिशा देगा! संस्कारित क्षत्रिय इस राष्ट्र का भविष्य तय करेंगे! अपने स्नाकारों से अपनी निजी, पारिवारिक तथा सामाजिक जिंदगी को प्रभावित करेंगे! भारत एक स्वस्थ ...तंदुरुस्त महासत्ता बन सकेगा!
[यह सारांश है "क्षत्रिय संसद" के गुडगाँव में सम्पन्न प्रथम चरण की चर्चा का]

गुरगाव[हरियाणा] में क्षत्रिय संसद की बैठक सम्पन्न!

क्षत्रिय संसद के प्रथम पहल के लिए हरियाणा स्थित गुरगाव में चर्चा हुई! कुंवर राजेन्द्रसिंह नरुका के निमत्रण पर देश के कोने से सक्रिय सामाजिक कार्यकर्ता इस बैठक में शामिल थे!
एक तस्बीर: (लेफ्ट से कु.राजेन्द्रसिंह नरुका, श्री चौहान ,श्री भवानीसिंह ,श्री राठोड, श्री गिरासे, श्री जालिमसिंह राठोड,श्री संदीपसिंह)

!! क्षमा वीरस्य भूषणं !!

एक जंगल था ! उस जंगल में कुछ शेर और ढेर सारे जानवर रहते थे ! सभी कुशल थे ! उनमे एक नौजवान....तेज...फुर्तीला युवा शेर भी था! बाकि कायर और बुढे शेर उस युवा शेर से इर्षा करते थे!उसका तेज मानो सूरज के समान था! उस बलशाली शेर के पराक्रम से बाकि नादाँ जानवर भी इर्षा करते थे! वे तरह तरह की बाधाये उस शेर के मार्ग पर उत्पन्न करते थे ताकि वह शेर उनके सामने झुक जाये ..उनकी शरण में आ जाये....या उन्ही की तरह आलसी हो जाये! उनको उसका तेज होना पसंद नहीं था ! उसके सामने आने की किसी जानवर में हिम्मत नहीं थी! क्योंकि उसके मुकाबले से वे डरते थे! इतना ही नहीं बल्कि मानव मात्र या कोई शिकारी भी उस शेर के भय से उस जंगल में नहीं टहलता था !
एक दिन जंगल के बाहर कुछ शिकारियोने जाल बिछा दिया ! यह बात उन नादाँ प्राणियों के ध्यान में आ गयी! उनके दिल में शैतान जाग उठा ! उस जाल में अगर वह युवा शेर फंस जाये तो पूरा जंगल हमारा होगा...इस भावना ने उन्हें पछाड़ा! उन्होंने उस युवा शेर को मीठी मीठी बातोंमे फसाकर उस जाल की ओर ले जाने की तरकीब सोची! शेर ने भी उनपर विश्वास रखा! योजना के अनुसार वह शेर उस जाल में फंस गया! उसे उस जाल में कैद देख , कमीने सियार और भेडिये खुश हुए! वे ख़ुशी के मारे उछाल ने लगे! बेचारा शेर अब क्या करता? उसके सामने चिंघाड़ने के अलावा कोई चारा भी तो नहीं था! वे उस शेर के सामने अपनी मुछोंपर नाज करने लगे जो कभी उस शेर के सामने लाचारी से झुक जाती थी! उसी जाल के पास एक पेड़ था ...उस पेड़ पर एक गरुड़ रहता था! कपटी जानवरों के इस खेल को देख वह भी मन ही मन में विचलित हुवा था! उसने उस शेर से बात की! शेर उन नादानोंकी हरकत से परेशां तो था ही बल्कि उसने उन्हें माफ़ भी कर दिया! ख़ुशी के मारे वे सियार और भेडिये अपने बाकि साथियोंको यह तमाशा देखने के लिए बुलाने चले गए! गरुड़ ने अन्य शेरोंसे जाकर मुलाकात की और उस युवा शेर के मदत की याचना की! लेकिन उन शेरोने मदत तो की ही नहीं बल्कि ख़ुशी जताई! एक कमजोर शेर बोला; "बहुत तेज दिखता था....अटक गया ना जाल में...अब समझेगा गुलामी क्या होती है!" उन कायर शेर की दास्ताँ सुनकर निराश गरुड़ वहा से चला गया! उसने अपने अन्य दोस्तोंकी सहायता लेकर शेर को जाल से मुक्त करने की कोशिश भी की! शिकारी वक्त पर आ गए और उस युवा शेर को मर कर उसकी खाल ले गए! उस गरुड़ को काफी दुख हुवा लेकिन जंगल में तो ख़ुशी की मिठाई बाटी जा रही थी! गरुड़ ने उन प्राणियोंको शाप दिया!
कुदरत का खेल देखो ......कुछ ही दिनोंमे शिकारियोंका होंसला बढा और वे एक एक करके सभी जानवरों की शिकार कर चले गए! इस घटना का भी साक्षीदार वह गरुड़ था! उसने कुदरत के इस करिश्मे का आभार जताया!
यह तो सिर्फ एक कहानी है ,लेकिन ऐसी कई घटनाये हमारे इतिहास में भी नजर आती है.......हमें वर्त्तमान में भी जगह जगह दिखाई देती है! प्रणवीर महाराणा प्रताप स्वतंत्रता के पुजारी थे ! वे अपने प्रण पर अडिग थे! उन्होंने तकलीफे सह ली लेकिन अपनी गर्दन नहीं झुकी थी! उन्होंने अपने कर्त्तव्य से इस धरती की आन...बाण और शान कायम रखी थी! इसीलिए उनके प्रति जनता के दिल में आस्था और सन्मान था! महाराणा का यही सन्मान और ऊँचा कद अन्य निमिष मात्र जीवोंको पसंद नहीं था इसलिए उन्होंने महाराणा को झुकाने की कोशिश की थी! लेकिन वे नाकामयाब रहे! राजा पौरस का भी काटा राजा अम्भी ने सिकंदर को बुलाकर निकाला था; जयचंद राठोड ने भी घोरी को बुलाकर पृथ्वीराज चौहान का घात कराया था! महाराणा सांगा को भी अपने ही लोगोने दर्द दिया था! कई देशभक्त वीरोंको देशद्रोही लोगोने गद्दारी कर दुश्मन के हवाले किया था! भारत के स्वाधीनता संग्राम में भी ऐसी अनगिनत घटनाये हमें नजर आती है ,जिन्हें पढ़कर आज भी मन दु:खी हो जाता है!
इस धरती पर जितनी बड़ी मात्रा में शुरवीरोने जन्म लिया है, उतने ही गद्दार यहाँ पनपे है! उपरोक्त कहानी में जैसा कुदरत ने करिश्मा दिखा कर उन नादाँ प्राणियोंको सबक सिखाया था वैसा ही सबक समय ने उन गद्दारोंको भी सिखाया है! उन गद्दारोंको याद करनेवाला आज कोई भी जिन्दा नहीं है! हर जगह हर समय उन महान देशभक्त....त्यागी....बलिदानी....वीरोंकी पूजा होती है!
हमें दुश्मन से ज्यादा अपने ही तकलीफ देते है.....यह तो परंपरा बन गयी है! उनकी ओर देखे तो हमारा काम ही अधुरा रह जायेगा!
आओ हम सब मिलकर उन गद्दारोंको माफ़ करे.......वह वीर ही होते है जो नादानोंको माफ़ करते है! भगवान महावीर वर्धमान ने ठीक ही कहा है......"क्षमा वीरस्य भूषणं!"
-----------जयपालसिंह विक्रमसिंह गिरासे {सिसोदिया}
शिरपुर{महाराष्ट्र} ०९४२२७८८७४०
jaypalg@gmail.com

!! क्षत्रिय !!

पृथ्वी पर है यह कौन ! खोयी सी आभा जिस पर दमक रही है !
मानो कीचड़ में कमल की पंखुडियां जैसी चमक रही है !१!
यह अरुणाई जो महलों में थी, क्यों धक्के खा रही है ?
दानवीर बनकर भी सहारा जीनेका, औरोसे क्यों पा रही है ?2
काँटों में राह बना कर, आगे बढ़ता जाता है !
रक्षक है प्रजा को अमृत दे कर, खुद जहर पिता जाता है !3!
रजपूती हुई लाचार, शक्ति की हार, भारत रोता !
वीरता हुई बेकार, कायरता का अंत यही तो होता !4!
अरे दोष देने वालो, तरुवर कब फल खाता है !
दोष इसे सब देते, अपना ध्यान किसे आता है !५!
कुर्सियों पर वाचाल, सडकों पर यह वीर राजपूत !
स्वार्थ हुए नेता, भारत के तक़दीर में थे ये वानीदूत !६!
सूर्य अमर हुआ तप-तपकर, क्या अग्नि से होगा ?
करते रहो शासन, कष्ट तो क्षत्रिय ही ने भोगा !७!
कष्टों में साहस भी होता, मत हमसे यूँ अटको !
शोषण करने वालो जागो, मत मदसे हूँ भटको !८!
यदि रजपूती को लल करोगे, तो लौटेगा चन्द्रगुप्तवीर !
हेलन लेकर, भगा यूनान अपमानित कर देगा वह रणवीर !९!
क्षत्रियों को पद दलित, हाय! यह त्रुटि हो गई है भारी !
रोती है, तड़फती है, भारत माता फिरती देश-देश मारी !१०!
दुर्गे कहों क्यों शत्रु मारे, क्यों फिरंगी अंग्रेज भगाए ?
क्यों आजाद किया राष्ट्र को, क्यों भगत जैसे फंसी चाहिए !११!
अंग्रेजों ने किया शासन,नैतिकता को नहीं इतना तोडा!
कष्टों में नहीं आजकी तरह,कर्त्तव्य से यूँ मुंह मोड़ा !१२!
बना रहे थे अंग्रेज भारत को,आर्थिक शक्ति और धन संपन्न!
स्वराज्य ने!डंकल अपना कर,भारत को किया विपन्न !१३!
नहीं चाँद में दाग, वह समय के दर्द की है परछाई !
क्षत्रिय ने शोषण नहीं किया,गर्दन भी कहाँ झुकाई!१४!
प्रजातंत्र में दुखी प्रजा, क्या क्या कष्ट उठा रही है ?
जिसकेहित घोड़े कीपीठ पर मरा,वहीभू इज्जत लुटा रही है! १५!
क्षत्रिय तो हट गया भारत माता!कर लेने दो इनको मन मानी!
जो गया पतालो में,तलवारों का,तड़फ रहा अब वह पानी !१६!
झूंठे आश्वाशन देकर,चुनाव लड़कर,कुर्सी ले सकता है !
तोड़कर वोट बैंक इनके, ऊपर शासन कर सकता है ! १७!
किन्तु जनता इसकी अपनी है, कैसे उसे यह बहकाए?
गर्दन उठा कर जो चलता आया,कैसे सर आज झुकाए?१८
जितना प्यार जनता से है मुझको क्या नेताजी को होगा?
तेरे लिए सीता त्यागी, पुत्र छोड़े, हर कष्ट को भोगा !१९!
तेरे लिए मित्रता भुला कर , बाबर से भी हारा !
भारतीयता सेथा प्यार मुझको राज्य कब था प्यारा!२०!
राज्य करते हो तुम, इसीलिए तो जनता डरती है!
क्षत्रिय पराधीन नहीं मुक्त है,प्रजा उसकी पूजा कराती है!२१!
नेताओ की चापलूसी, कर-कर पुल बाँधने वालो!
खुले जनालय में ,कोई क्षत्रिय से आंख मिलालो !२२!
त्याग नेहरु परिवार का नहीं, कुंवर सिंह का त्याग हुआ है भारी !
त्यागी थे गाँधी, सुभाष, चन्द्र, भगत सिंह कांग्रेस पर है भारी !२३!
क्षत्रियों को पदच्युत, भारत के लिए हम दुःख सुख सहते !
जल रहा है जिगर, आँखों से आंसू भी अब नहीं बहते !२४!
भारत वर्ष की रक्धा का भार,नयन नीर से भर आते !
इसीलिए मुंह तक आकर भी, प्राण फिर लौट जाते !२५!
वहां रहूँ क्यों जहाँ अन्यायी को, पूजा जाता हो !
तलवार लूँ हाथमे सिर काटूं, उसका जो जनताको बहकता हो!२६!
नेता का अंत करो अब, बोल उठी है तलवार !
नहीं बढ़ेगी,नहीं बढ़ेगी,अब नेताओ की यह क़तर!२७!
तड़फ उठा भूमंडल क्षत्रियने,जब क्षत्रित्वता छोडनी चाही!
रोया भारत,रोई प्रजा, सिंह छोड़ दुर्गा बढ़ी जग माहीं!२८!
"क्षत्रिय युवक संघ"की सत्य वाणी, धर्मं बचाने आई !
मिटने का था भारत, एक विचार आ जिंदगी बनाई !२९!
कौन एक संघ, क्षत्रिय के आगे, नया विचार लाया !
समर्थ बनो, समर्थ बनाओ, का नया दीप जलाया !३०!
बहुत लादे हो, और भी लड़ना, युद्ध में ही सुख है !
अपना जीवन देकर, तुम लेलो,जो अमर सुख है !३१!
इसे चलो इस भूपर,कदम तुमारे मिट न पाये !
जिसने हटाया तुम्हे,वाही स्वागत करने आये !३२!
निराश हुआ जब क्षत्रिय ही तो, औरो का क्या कहना !
सागर ही सूख गया तो, अब नदियों का क्या बहाना !३३!
मुर्गा ही यदि सो गया तो, औरो को क्या कहते हों !
क्षत्रियही यदि हाथ पसारे, तो भिखारियों को क्या कहते हो!३४!
जो सब का अन्न दाता है, यदि वही अन्न को तरसे !
यज्ञ ही न हो तो फिर , इन्द्र बादल बन क्यों बरसे !३५!
कहाँ गयी वह शक्ति, जिससे जग जय करना था ?
कहाँ गया वह हिमालय, जिससे गंगामाँ को बहना था!३६!
किस्मत के फेरे देखो, भूले ही अब नहीं मिलती !
जलना ही जिसका कम है, वह तीली ही नहीं जलती !३७!
सब कुछ लुटा कर, अब क्या बटोरने चले हो ?
पहिचाने बिना ही, हर किसी से मिलेते गले हो !३८!
अपना मार्ग भूल कर, औरो के पर क्यों चल रहे हो !
प्रजा पालक थे, अब औरो के टुकडो पर पल रहे हो !३९!
तुम दुखड़ा अपना रोते, रोने ही अब रह गया !
पानी जो था तलवारों में, वह कहाँ अब बह गया !४०!
तुम्हे पद-दलित किया है , सहानुभूति मुझे तुमसे !
किन्तु क्या तुम लायक थे, क्या शासन होता तुमसे !४१!
विधना ने परीक्षा ली तुम्हारी, दुष्टों ने मांगी नारी !
पृथ्वी औरो की माता है, किन्तु तेरी तो थी नारी !४२!
तुमने कायरता अपना कर , साथ छोड़ा इसका !
स्वार्थो का नाता है ! है कौन यहाँ प्यारा किसका !४३!
अब क्या करना है, मै तुमसे कुछ नहीं कहता !
किसी के कहने से कौन, सही रास्ते पर चलता !४४!
तुझे क्या करना है , यह तू ही जाने !
पर जीते है वही जो मौत को ही जिंदगी माने !४५!
मै इतना अवश्य कहता हूँ, लड़ने वाले ही जीते है !
मरना तो है ही पर, यहाँ मरने वाले ही जीते है !४६!
इतना सुना कर, अपना केशरिया लिए बड़ा वह आगे !
कुछ मौन रह कर, क्षत्रिय भी, नंगे पैर आयें भागे !४७!
प्यार जो सबको देता, वही संघ बाहें फैलाये खड़ा !
मिलन अदभुत देख कर, भ्रातृत्व प्रेम भी रो पड़ा !४८!
कैंप लगने लगे , एक से एक बढ़ - बढ़ कर !
क्षत्रिय का बाल , उमड़ने लगा चढ़ - चढ़ कर !४९!
शिविरों में मिट्ठी में, बैठ कर दाल रोटी खाते है !
जो नहीं स्वर्ग में भी , ऐसा सूख ये पाते है !५०!
प्रात: काल सीटी बजने पर, इक्कठे होते है जगकर !
बुलाओ एक को, चार आते है भग भगकर !५१!
प्रेम यहाँ का देख कर, भरत मिलाप याद आता है !
जीवन यहाँ का देख कर, ऋषियों का आश्रम सरमाता है !५२!
कौन सूर्य वंशी? कौन चन्द्र वंशी? सब धरती पर लेटे है !
सबका धर्मं एक , सब ही एक माँ दुर्गे के बेटे है !५३!
उधर भ्रष्ट - तंत्र के कुचक्र से , भारत देश रोता है !
इधर खेल खेल में ही , कभी उपदेश होता है !५४!
खेल खेल में क्षत्रिय, लगा शस्त्र चलाने !
क्षत्रित्वता से ओत-प्रोत, होने लगा इसी बहाने !५५!
रुखी सुखी खाकर , अतुलित आनंद पाता !
राजपुत्रो के जीवन में, संघ इतिहास नया बनाता !५६!
कभी कभी राजे महाराजे, मनोरंजन के लिए आते !
स्वयं के वैभव को देख, स्वजीवन पर वे शरमाते !५७!
सोचते और कभी कहते, धन्य धन्य जीवन इनका !
कोई क्या कर सकता है, युद्ध स्वागत करता जिनका !५८!
इसी तरह संघ, बढता चला अगाड़ी !
खेल खेलने में क्षत्रिय था बहुत खिलाडी !५९!
कहते थे संघप्रमुख, कभी न उठाओ बैसाखी !
घूमों घर-घर, क्षत्रिय का अंग रहे न बाकी !६०!
स्वाभाव वनराज सा,इसीलिए एक न होंगे कभी!
पल-दोपल की एकता है.सोचने लगे ऐसा सभी!६१!
संघ-प्रमुख भी बेखबर न थे, मानते थे इनको मोती!
लाख कोशिश करो, पर इनकी भी ढेरी कहाँ होती !६२!
जितना पास लाते है,उतने ही दूर होते है भाग कर !
किन्तु वे उदास न थे,विचार दिया स्थिति को भांप कर!६३!
जल धरा जिधर बहना चाहती है, बहाने दो !
मोती जहाँ पड़ा है, उसे वहीँ पड़ा रहने दो !६४!
जगह-जगह जा कर मोती ही में छेड़ करो !
जिस में हो सके न छेड़,उस पर ही खेद करो!६५!
यह काम करेगा "क्षत्रिय युवक संघ " हमारा !
"जय संघ शक्ति"बोल उठी है, जल धारा !६६!
सुई धागा हाथ में लेकर, "क्षत्रिय वीर ज्योति " आयी !
छिद्र पहले से ही थे, इसीलिए यह सबको भायी !६७!
घृणा अश्व, अपमान कवच, वेद ढाल बन गये !
वीरता के अस्त्र, सहस का बना शस्त्र, सब तन गये !६८!
इसी तरह, " क्षत्रिय वीर ज्योति" ने कटक बनाई !
दशहरा ही नहीं, दिवाली, होली भी खूब मनाई !६९!
भारतीयता को पदाक्रांत देख, वीर ज्योति हुंकारी !
पग-पग पर आक्रान्ता, है नेता बनने वाले !
भूमि तुम्हारी ही होगी, लेकिन होंगे डंकल के ताले !७१!
कदम कदम पर बंधन, है प्रजातंत्र यह कैसा !
हमारी "माता" को खरीदता है, विदेशियो का पैसा !७२!
जब पैसे का मद, आँखों में आग भर देता है !
तभी पराया वैभव, मन को पागल कर देता है !७३!
कृषकों के खेतो पर, खाद बीज विदेशियो के चलते है !
बीज स्वयंके ही होगे पर, विदेशियो के आदेश से डलते है!७४!
भेज कर अतंकवादियो को, अमेरिका ने क्षत्रियो को ललकारा !
पाकिस्तान ने कहा, तुम्हारी कश्मीर पर है अधिकार हमारा !७५!
पाक ध्वज के नीचे, कश्मीरियो को रहना होगा !
मै नेता हूँ मेरा अन्याय, तुम को सहना होगा !७६!
धधक उठी भारत पर, एटम बम की ज्वाला !
मानो तूफान आया हो, तम छा गया काला !७७!
ऐसे में भारत के पतियो ने, चुप्पी साधी जान प्यारी थी !
चीर-हरण हो रहा था जिसका, वह क्षत्रियो कीभी नारी थी !७८!
प्रजातंत्र प्रजा को हो कर भी, क्यों जीवन का प्यारा है !
यह कैसा तंत्र है , इसका सिद्धांत सबसे न्यारा है !७९!
स्थिति अनुकूल जान कर, क्षत्रिय वीर ज्योति बढ़ी अगाड़ी !
बम बनाना सीख रहे थे, संघ में क्षत्रिय खिलाडी !८०!
हमें पराधीनता नहीं चाहिए, जीवन की कीमत पर !
रहना नहीं सिखाया क्षत्राणी ने, जंजीरों में बंध कर !८१!
हम तढ़फे तुम कड्को तद्फन पर, कब तक ऐसा होगा !
प्रजतान्त्रियो के बहकावे में, भारत ने बहुत दुःख भोगा !८२

-----कुंवरानी निशा कँवर नरुका {राजस्थान}

!! क्षात्रधर्म !!

!! क्षात्रधर्म !!
"क्षति से जो समाज की रक्षा करता है ; वही क्षत्रिय कहलाता है..!"
वैदिक सनातन धर्मं में क्षत्रिय धर्म का एक महत्वपूर्ण स्थान है! प्रजापति ब्रह्मा ने सृष्टि की उत्पत्ति करते समय क्षत्रिय को अपने भुजाओं से उत्पन्न किया था ! महर्षि याश्क ने अपने ग्रन्थ 'निरुक्त' में क्षत्रिय शब्द का अच्छा विवेचन किया है! वे कहते है , "क्षतात त्राय ते इति क्षत्रिय: " अर्थात क्षति (याने पाप, अधर्म, कष्ट, शत्रु आदि सर्व प्रकार की क्षति) से रक्षा करना सच्चे क्षत्रिय का परम कर्त्तव्य होता है! महात्मा मनु ने भी प्रजाओं का पालन ही क्षत्रियों का श्रेष्ठ धर्मं बतलाया है ! (आधार: मनुस्मृति: अध्याय ७, श्लोक क्रमांक १४४)
क्षत्रिय के स्वाभाविक कर्म के बारे में भगवन श्री कृष्ण ने श्रीमद भगवद्गीता में कहा है;
" शौर्य तेजो ध्रुतिर्दाक्ष युद्धे चाप्य पलायनम !
दान्मिश्वर भावश्च क्षात्र कर्म स्वभावजम !!" (गीता अध्याय १८, श्लोक ४३)
शूरवीरता ,तेज, धैर्य, चतुरता और युद्ध में न भागने का स्वभाव एवं दान और स्वामिभाव ये सब क्षत्रिय के स्वाभाविक कर्म है !
क्षत्रिय धर्मे के बारे में विस्तृत विवरण कई ग्रंथों में मिलता है जिसका जिक्र हम यथावकाश करते रहेंगे !
राजस्थान के रजवट साहित्य में भी क्षत्रिय धर्म का सुन्दर चित्रण मिलता है!
"सीधो रजवट परखनो, ऐ रजवट अहनान!
प्राण जठेई रजवट नहीं; रजवट जठे न प्राण !!"
इस सोरठे का अर्थ है की क्षत्रिय सुख,भोग की लालसा नहीं रखता है; वह तो संघर्ष का अधिकारी होता है! जो सुख या भोग के प्रति शरण जाते है ..वे क्षत्रिय नहीं होते है!
क्षत्रिय केवल जाती नहीं, केवल धर्मं नहीं बल्कि एक व्रत है; जिसे जीवन भर हमें समर्पित होना चाहिए! समर्पण के भाव से जीना चाहिए! क्षत्रिय की आँख एक-दुसरे में फर्क नहीं करती है! पुराण कालीन क्षत्रिय सभी जनता को एक ही दृष्टी से देखते थे! क्षत्रिय हमेशा न्याय के पक्ष में रहता है! आज भी हमें वही गौरवशाली आचरण का अवलंब करना होगा! क्षत्रियों का धर्मं कोई संकीर्ण विचारधारा वाला या आचरण वाला धर्म नहीं था; वह विशाल मानवता की दृष्टी रखने वाला धर्मं था! भौतिक और अध्यात्मिक जीवन में उच्च कोटि की नैतिकता वे धारण करते थे! मर्यादा पुरुषोत्तम प्रभु "रघुकुल रित सदा चली आयी; प्राण जाई पर वचन ना जाई!" परंपरा का यह दाखिला यहाँ प्रस्तुत करते समय हमें गर्व महसूस होता है! अनगिनत उदाहरणों से हमारा इतिहास भरा पड़ा है! उपर्निर्दिष्ट विचार केवल मध्य युग के क्षत्रियों के बारे में लागु नहीं पड़ते है बल्कि आज के युग में भी अनुकरणीय है! आज युद्ध का जमाना नहीं रहा है! समाज या देश की रक्षा के लिए वर्तमान शासन ने सुसंगठित सेना रखी है! आज हमें रण पर जाने की जरुरत नहीं है; आज शांति का समय है....गणतंत्र राज्य व्यवस्था के हम नागरिक है! महान क्षात्र धर्मं ने इस महान सभ्यता और संस्कृति का रक्षण सदियों तक किया है! संवर्धन किया है! आज समाज की रक्षा करने के लिए तलवार पकड़ कर रण में जाने की जरुरत नहीं है! समय बदल गया....राजपाट और तख़्त बदल गए.....कर्त्तव्य की सीमा बदल गयी....लेकिन फिरभी हमारे संस्कार....हमारे कर्म तो शास्वत है ......सनातन है! आज शांति है ;तो सेवा ही हमारा धर्म होगा ! सेवा ही हमारा कर्म होगा! संस्कृति,मानवता,देश,धर्मं और गरीब की सेवा ही हमारा कर्म होना चाहिए! क्षत्रिय ने हमेशा असहाय को सहायता की है; इसलिए क्षात्र धर्मं मानव धर्मं का रक्षक कहा गया है! ऐहिक जीवन में समष्टिवाद तथा व्यक्तिवाद होते है! क्षत्रिय हमेशा समष्टिवादी रहे है! व्यक्तिवादी होना यानी अपना अंत करना होता है! हम विचारों की; सत्कर्मों की पूजा करते है.....केवल अंधी आँखों से किसी व्यक्ति मात्र की नहीं! जिसमे ईश्वर नहीं होता है....वह नश्वर बतलाया जाता है! और क्षत्रिय कभी नश्वर के पुजारी नहीं हो सकते! "सर्वजन- हिताय: सर्व- जन सुखाय" ...ऐसी सर्वव्यापी महान दृष्टी के तारणहार क्षत्रिय जाती रही है!समाज...संस्कार....सुव्यवस्था की रक्षा एवं स्थापना हेतु क्षत्रियोंकी उत्पत्ति हुई है ...ऐसा पुराण में बताया जाता है! या तो समाज के एक वर्ग ने समाज रक्षा का प्रण किया; वे क्षत्रिय माने जाने लगे! इसी वर्ग ने सदियों तक इस भूमि पर होने वाले आक्रमनोंका सामना किया...त्याग और बलिदानकी कई गाथाये यहाँ प्रकट हुई! क्षत्रिय वीर एवं वीरांगनाओं के त्याग की ऐसी मिसाल विश्व के इतिहास में शायद ही कई हो...! हमें हमारे गौरवशाली अतीत पर गर्व होना चाहिए...आज के वर्तमान में भी बीती सदी की कहानिया हमें नई दिशाए...नई प्रेरणाए देती है! एक अच्छा...तेजस्वी...ताकदवर...स्वाभिमानी राष्ट्र निर्माण के लिए सुसंस्कृत नागरिकों की आवश्यकता होती है ! क्षत्रिय इतिहास ऐसे देशभक्त नागरिक तैयार करने में मदतगार साबित हो सकता है!
इस कड़ी में हम समय समय पर यथावश्यक उपलब्धिया जरुर करवाएंगे ! जय क्षात्र धर्मं !
------जयपालसिंह विक्रमसिंह गिरासे (सिसोदिया)
५०, विद्याविहार कालोनी ,शिरपुर जी:धुले {महाराष्ट्र}
मोबाइल :०९४२२७८८७४० jaypalg@gmail.com

स्वधर्म

स्वधर्म
मै क्षत्रिय रहा  हूँ, मुझे झूंठी प्रगति से क्या लेना है?
मै कर्म वादी हूँ, किसी को मुझे क्या लेना है ?
क्षात्र-धर्म के पथ पर, मुझे तो आगे बढ़ते रहना है !
कमलरुपी लक्ष्य के पीछे, सरिता में आगे बढ़ते रहना है !!...
मै धीर-रणधीर की तरह, आगे ही बढ़ता चलूँ !
क्षत्रिय हूँ इसीलिए, ईश्वरीय कर्म कोही करता चलूँ !!
अवरोध रह में बनसके, किसी में कहाँ दम है ?
देवराज इन्द्र व् कुबेर भी, क्षत्रिय के आगे कम है !!
जिन्दगी को ही, संघर्ष मानते ही जीना है !
जग में हो जहर कितना ही, मुझे हीतो पीना है !!
मेरी रह काँटों की है, इसीलिए सबसे न्यारी है !
मेरी दुनिया काली है, पर मुझे तो प्राणों से प्यारी है !!
कष्ट कितने ही हो, किन्तु क्षात्र-धर्म हमारा है !
मरण पर मंगल गीत होते, यही इतिहास हमारा है !!
फूल नजर आते काँटों में, यह सिद्धान्त हमारा है !
हो कैसा भी, स्वधर्म प्राणों से भी प्यारा है !!
--- कुंवर राजेन्द्रसिंह नरुका [राजस्थान ]