सारंगखेडा का विश्व प्रसिद्ध अश्व मेला शुरू ......


गुजरात कि सीमा से महज सौ किलोमीटर दूर पर शहादा --धुले रोड पर महाराष्ट्र में सूर्यकन्या तापी नदी के किनारे सारंगखेडा नाम का गाव है जो मध्ययुगीन काल से कभी रावल परिवार की जागीर का स्थल था। यहाँ मध्यकाल से दत्त जयंती के  पर पावन अवसर पर एक विशाल मेले का आयोजन होता है। इस मेले का एक खास आकर्षण होता है यहाँ का विश्व प्रसिद्ध अश्व मेला ......... .
यहाँ दूर -दूर से अश्वप्रेमी अश्व खरीदने के लिए  आते है ;  राजपूत--मराठा --जाट --सिख ---मुग़ल शासकोने यहाँ से मध्यकाल के समय में  घोड़ो कि खरीदारी कि थी ;प्राचीन समय से यहाँ भगवन एकमुखी दत्त जी का मंदिर है। श्री दत्त जयंती के पावन अवसर पर यहाँ बहुत ही सुंदर मेले का आयोजन होता आया है। विभिन्न नस्लों के घोड़ों के लिए यह मेला दुनिया भर में मशहूर है। प्राचीन समय से भारत वर्ष के राजा-महाराजा; रथी -महारथी यहाँ अपने मन-पसंद घोड़ों की खरीद के लिए आते-जाते रहे है। आज भी देश के विभिन्न प्रान्तों से घोड़ों के व्यापारी यहाँ आते है। 16 दिसम्बर के दिन यात्रारंभ होगा। हर रोज लाखो श्रद्धालु भगवान दत्त जी के मंदिर में दर्शन करते है और यात्रा का आनंद भी लेते है। विभिन्न राजनेता, उद्योजक, फ़िल्मी हस्तिया यहाँ घोड़े खरीदने आते-जाते रहते है।  आज भी देश के कोने-कोने से कई राजपरिवार ; अश्वप्रेमी लोग ; फिल्मी सितारे ; राजनेता यहाँ अपने मनपसंद घोड़ों कि तलाश में आते रहते है।
 इस मेले में कृषि प्रदर्शनी; कृषि मेला; बैल-बाजार; लोककला महोत्सव; लावणी महोत्सव तथा अश्व स्पर्धा आदि का आयोजन होता है।
वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप जी का घोडा "चेतक" तथा छत्रपति शिवाजी महाराज जी घोड़ी "कृष्णा" इतिहास में प्रसिद्ध है। महाराणा प्रतापसिंह जी के जीवन में चेतक घोड़े का साथ महत्वपूर्ण रहा था। कृष्णा घोड़ी ने भी छत्रपति शिवाजी महाराज के संघर्ष के काल में अभूतपूर्व योगदान दिया था। चेतक और कृष्णा के नाम से  सारंगखेडा मेले में पुरस्कार दिए जाते है ।  दौड़ में सर्वप्रथम आनेवाले अश्व को चेतक पुरस्कार--11000 रु की नगद राशी .- चेतक स्मृति चिन्ह और रोबीले पण में सर्वप्रथम आनेवाले अश्व को कृष्णा पुरस्कार--11000 रु . की नगद राशी --कृष्णा स्मृतिचिन्ह प्रदान किया जायेगा। इस मेले में दोंडाईचा संस्थान के कुंवर विक्रांतसिंह जी रावल  के अश्व -विकास केंद्र के घोड़े भी मौजूद रहते है। जिनमे फैला-बेला नाम की सिर्फ 2.5 फिट ऊँची घोड़ों की प्रजाति ख़ास आकर्षण का केंद्र रहेगी। सारंगखेडा के भूतपूर्व संस्थानिक तथा वर्तमान  उपाध्यक्ष ( जि .प .नंदुरबार) श्री जयपालसिंह रावल साहब तथा सरपंच श्री चंद्रपालसिंह रावल के मार्गदर्शन में इस मेले की सफलता के लिए स्थानीय पदाधिकारीगन प्रयत्नरत है।

इस अभूतपूर्व अश्व मेले के बारे में अधिक जानकारी के लिए क्लिक करे:
http://www.youtube.com/watch?v=DTi4isKWU-w

http://www.youtube.com/watch?v=CcDlcXaX_hk



क्या है जोधा बाई की एतिहासिक सच्चाई ??

क्या है जोधा बाई  की एतिहासिक सच्चाई ??
आदि-काल से क्षत्रियो के राजनीतिक शत्रु उनके प्रभुत्वता  को चुनौती  देते  आये है !किन्तु क्षत्रिय अपने क्षात्र-धर्म के पालन से उन सभी षड्यंत्रों का मुकाबला सफलता पूर्वक करते रहे है !कभी कश्यप ऋषि और दिति के वंशजो जिन्हें कालांतर के दैत्य या राक्षस नाम दिया गया था ,क्षत्रियो से सत्ता हथियाने के लिए भिन्न भिन्न प्रकार से आडम्बर और कुचक्रो को रचते रहे  ! और कुरुक्षेत्र के महाभारत में जबकि  अधिकांश ज्ञानवान क्षत्रियों ने एक साथ वीरगति प्राप्त कर ली ,उसके बाद से ही हमारे इतिहास को केवल कलम के बल पर दूषित कर दिया गया !इतिहास में भरसक प्रयास किया गया की उसमे हमारे शत्रुओं को महिमामंडित  किया जाये और क्षत्रिय गौरव को नष्ट किया जाये   ! किन्तु जिस प्रकार किसे  हीरे  के ऊपर लाख  धूल डालो उसकी चमक फीकी नहीं पड़ती ठीक वैसे ही ,क्षत्रिय गौरव उस दूषित किये गए इतिहास से भी अपनी चमक  बिखेरता रहा !फिर धार्मिक आडम्बरो के जरिये क्षत्रियो को प्रथम स्थान से दुसरे स्थान पर धकेलने का कुचक्र प्रारम्भ  हुआ ,जिसमे आंशिक सफलता भी मिली,,,,किन्तु क्षत्रियों की राज्य शक्ति को कमजोर करने के लिए उनकी साधना पद्दति को भ्रष्ट करना जरुरी समझा गया इसिलिय्रे अधर्म को धर्म बनाकर पेश किया गया !सात्विक यज्ञों के स्थान पर कर्म्-कांडो और ढोंग को प्रश्रय दिया गया !इसके विरोध में क्षत्रिय राजकुमारों द्वारा धार्मिक आन्दोलन चलाये गए जिन्हें धर्मद्रोही पंडा-वाद ने धर्म-विरोधी घोषित कर दिया ,,इस कारण इन क्षत्रिय राजकुमारों के अनुयायियों ने नए पन्थो का जन्म दिया जो आज अनेक नामो से धर्म कहलाते है ,,,,,ये नए धर्म चूँकि केवल एक महान व्यक्ति की विचारधारा के समर्थक रह गए और मूल क्षात्र-धर्म से दूर होगये, इस कारण कालांतर में यह भी अपने लक्ष्य से भटक कर स्वयं ढोंग और आडम्बर से ग्रषित होगये ! इसके बाद इन्ही धर्मो में से इस्लाम ने बाकी धर्मो को नष्ट करने हेतु तलवार का सहारा लिया ,,,इस कारण क्षत्रियों ने इसका जम कर विरोध किया और इस्लाम के समर्थको ने राज्य सत्ता को धर्म विस्तार के लिए आसान तरीका समझ ,आदिकाल से स्थापित क्षत्रिय साम्राज्यों को ढहाना शुरू कर दिया ! क्षत्रियों ने शस्त्र तकनिकी को तत्कालीन वैज्ञानिक समुदाय यानि ब्राह्मणों के भरोसे  छोड़ दिया तो, परिणाम हुआ क्षत्रिय तोप के आगे तलवारों से लड़ते रहे ,,,,,चंगेज खान से लेकर बाबर तक तो सिर्फ भारत को लूटते रहे किन्तु बाबर ने भारत में अपना स्थायी साम्राज्य स्थापित करने में सफलता प्राप्त कर ली ! किन्तु भारत में पहले ही आचुके अफगानों ने हुमायु से सत्ता छीन ली और  हुमायूँ दर-दर की ठोकरे खाता हुआ हुआ शरण के लिए अमरकोट के राजपूत राजा के यहाँ पहुंचा !अपनी गर्भवती बेगम को राजपूतों की शरण में छोड़ ,अपने राज्य को पुनः प्राप्त करने की तैयारियों में जुट गया !वहीँ  जलालुद्धीनका जन्म हुआ और १३ वर्ष तक उसकी परवरिश राजपूत परिवार में हुयी ! हुमायूँ जब बादशाह बना तब पर्शिया से कुछ परिवारों को अपने साथ भारत लाया था ! जो की मूलरूप से मीनाकारी का कार्य किया करते थे !उनके परिवारों में लड़कियों के विवाह का चलन नहीं था ,,इस कारण उनके कुछ परिवार अमरकोट और उसके आसपास  कुछ पर्शियन लड़कियाँ दासियों का कार्य करती थी! इन्ही में से कुछ दासिया जोधपुर राजपरिवार में भी रहने लगी ! जोधपुर की राजकुमारी की एक निजी दासी जो पर्शियन थी ,जब उसके एक कन्या का जन्म हुआ तब वह रोने लगी की इस बच्ची का कोई भविष्य नहीं है 1 क्योंकि इसका विवाह नहीं होगा ,तब राजकुमारी ने उसे वचन दिया कि मै इसका विवाह किसी राजपरिवार में करूंगी !जब जोधपुर कि राजकुमारी जो कि आमेर के राजा भारमल की रानी बनी ,ने प्रथम मिलन की रात्रि को ही राजा भारमल से वचन लेलिया कि हरखू को मैंने अपनी धर्म बेटी बनाया हुआ है और मै चाहती हूँ कि उसका विवाह किसी राजपरिवार में हो ,,राजा भारमल ने जोधपुर की राजकुमारी को वचन देदिया कि वह उसका विवाह किसी राजपरिवार में कर देंगे ! किन्तु यह आसान कार्य नहीं था क्योंकि किसी भी राजपूत परिवार ने हरखू से विवाह करना उचित नहीं समझा इस कारण उसकी उम्र  काफी होगई! किसी भी राजपरिवार तो दूर साधारण गैर राजपूत हिन्दू परिवार ने भी तत्कालीन परिस्थितियों में हरखू से विवाह करने से मना कर दिया ,,इसकारण रानी का राजा भारमल से अपना वचन नहीं निभाने का उलहना असहनीय होता जारहा था ! इससे पूर्व जलालुद्धीन अकबर जब बादशाह बना तब ढूँढार (आमेर) में नरुकाओं का विद्रोह चल रहा था, इस कारण राजा भारमल ने बाध्य होकर अकबर से संधि करली थी, ताकि नरुकाओं एवं अन्य सरदारों के विद्रोह  को दबाया जासके !और अकबर से राजा भारमल की इस संधि में कोई वैवाहिक शर्त जैसा कि आज दिखाने का प्रयास किया जाता है, कुछ नहीं था !जब अकबर अजमेर शरीफ की यात्रा के लिए जा रहा था,तो रास्ते में राजा भारमल जी ने शिष्टाचार भेट कि तो वह कुछ चिंतित थे ,अकबर ने भारमल जी से चिंता का कारण जाना तो उन्होंने हरखू के के विवाह से सम्बंधित बात सविस्तार बतायी ,,अकबर ने पूंछा कि "महाराज उसका विवाह हिन्दू रीती से होगा या मुश्लिम रीति से?" भारमल जी ने बताया कि हिन्दू रीति से तब अकबर ने पूंछा कि कन्यादान कौन करेगा ? भारमल जी ने कहा कि हरखू मेरी  धर्म पुत्री है और इस नाते कन्यादान मै ही करूँगा ! तब बादशाह अकबर ने कहा कि "मै  राजपूत नहीं हूँ, किन्तु मेरा  जन्म और परवरिश राजपूत परिवार में हुयी थी ,,,ठीक उसी तरह जैसे हरखू राजपूत नहीं है , किन्तु उसका भी जन्म और परवरिश भी राजपूत परिवार में हुयी है " अतः यदि आपको उसके पिता बनाने में कोई ऐतराज नहीं तो मुझे उसके साथ विवाह करने में भी कोई ऐतराज नहीं है ! इसके बाद हरखू का विवाह अकबर के साथ किया गया ! यह कोई शर्मिंदगी या बदनामी की बात नहीं थी ,बल्कि राजा भारमल की बुद्धिमानी और धर्म और नारी जाति के प्रति सम्मान था,जिसकी सर्वत्र प्रशंसा की गयी,खासतोर पर पर्शिया के धर्म गुरुओं ने राजा भारमल को पत्र लिखकर एक पर्शिया लड़की के जीवन को संवारने के लिए  प्रशंसा पत्र भेजा !सिक्खों के गुरुओं ने भी इसकी प्रशंसा की और राजा भारमल की बुद्धिमानी के लिए साधुवाद दिया ! यह कहना गलत है कि यह हरखू जीवन भर हिन्दू रही,, ,वह कभी भी हिन्दू नहीं थी ,,,हां जब वह आमेर में रहती थी तब आमेर राजपरिवार के इष्ट देव श्री गोविन्देव जी की पूजा किया करती थी, इस कारण वह गोविन्द देव जी की पुजारी जरुर थी वरन तो वह फिर कभी भी जीवन में हरखू नहीं कहलाई उसका नाम मरियम बेगम पड़ गया और उसे बाकायदा इस्लाम रीति से ही कब्र में दफनाया गया था !जहाँगीर उसी मरियम उज्जमानी का बेटा था  ! जोधा नाम से जो प्रसिद्द थी वह जोधपुर की एक दासिपुत्री जगत गुसाईं (जो कि हरखू के ही भाई कि बेटी थी), जिसका निकाह जहाँगीर के साथ हुआ था और शाहजहाँ की माँ थी ,वह चूँकि जोधपुर से सम्बंधित थी और उसका कन्यादान मोटा राजा उदय सिंह जी ने किया था , इस कारण जोधा भी कहलाती थी ! रही बात आज लोग उस जगत गुसाईं उर्फ़ जोधा को अकबर से क्यों जोड़ बैठे ??तो यह तो सिर्फ फ़िल्मी जगत की उपज है ,जब पहली बार हरखू को जोधा बाई बना दिया गया, वह थी मुगले-आजम फिल्म ,,उस समय फिल्मों को कोई गंभीरता से नहीं लेता था !इस कारण फिल्म की प्रसिद्धि के बाद जोधा का नाम अकबर से जुड़ गया !और इस फिल्म के बाद जो छोटे मोटे इतिहासकार हुए उन्होंने भी अकबर के साथ जोधा का नाम जोड़ने का ही दुष्कृत्य किया है ! और रही सही कसर पूरी कर दी आशुतोष गोवोरकर ने "जोधा-अकबर" नाम से फिल्म बनाकर !अब इसे आगे बढ़ा  रही है ,नारी के नाम पर धब्बा ,एकता कपूर जो एक बदनाम सीरियल को जी टी वी पर प्रसारित लगातार प्रसारित किये जारही है ! अब हम बात करते है कि यह सब अनायास हुआ या किसी साजिश के जरिये ???? बहुत सी डीबेटों में हम से यह भी पूंछा गया गया कि आखिर फिल्म ,टी.वी.और मिडिया ,शासन-प्रशासन और तमाम प्रचार प्रसार के साधन राजपूत -क्षत्रिय संस्कृति के विरोधी क्यों होगये ?? इसका बिलकुल साफ-साफ उत्तर है कि देश के विभाजन से पूर्व तक लगभग सभी स्थानीय निकाय या शासन तंत्र पर क्षत्रियों का ही अधिकार था और यदि राजपूत-क्षत्रियों की छवि को धूमिल नहीं किया जाता तो, हमसे जिन लोगो ने सत्ता केवल झूंठ और लोगो को सब्जबाग दिखाकर प्राप्त की थी, उसे शीघ्र ही क्षत्रिय समाज पुनः वापिस लेलता !और होसकता है कि राष्ट्र को आज तक के ये दुर्दिन देखने ही नहीं पड़ते !इसलिए राजनीतिक षड़यंत्र के तहत क्षत्रिय समाज की संस्कृति ,इतिहास और छवि को मटियामेट करने के लिए समस्त साधन एकजुट होकर हमला करने लगे ,,,,ताकि क्षत्रिय होना कोई गौरव की बात नहीं रहे बल्कि शर्म की बात होजाये,,,,,किन्तु क्षत्रिय समाज ने अपने पुरुषार्थ के बल पर न केवल अपनी प्रसान्सगिकता ही बनाये रखी बल्कि तमाम दुश्चक्रो को तोड़ने में सक्षमता दिखाई है ,,,,,,इस कारण यह समस्त विरोधी शक्ति एक साथ अब पुनः क्षत्रिय स्वाभिमान और गौरव को नष्ट करने में जुट गयी है !जहाँ तक इतिहास का सवाल है तो वर्तमान समय में उपलब्द्ध  इतिहास दो तरह के लोगो के द्वारा   लिखा गया है ,,,,एक तो चारणों ,भाटों और राजपुरोहितों द्वारा  लिखा गया है, इसमें  यह कमी रही है कि यह  या तो अपने स्वामी की प्रशंसा में या अपने स्वामी के शत्रु की छवि को धूमिल करने के लिए लोखा गया था !दूसरी तरफ लिखा गया इतिहास  विदेशी आक्रान्ताओं और हमारे राजनितिक शत्रुओं ने अपने स्वामी मुगलों और आतातायियों के पक्ष में इतिहास लिखा और हमारे चारणों और भाटों ने  हमारे लिए इतिहास लिखा किन्तु देश के विभाजन के बाद पंडित नेहरू जैसे लोगों ने हमारे राजनितिक शत्रुओं और विदेशी आक्रान्ताओं  के लिखे इतिहास को मान्यता  दी ताकि क्षत्रियो की छवि को धूमिल किया जासकें और हमारे परम्परागत इतिहासकारों के इतिहास को ख़ारिज कर दिया ताकि क्षत्रियो में स्वाभिमान के पुनर्जीवन का अवसर ही नहीं मिल पाए ! !,,,,,फिर भी लोकगीतों,भजनों,लोक-कथाओं,स्वतन्त्र  कहानीकार और साहित्यकार मुंशी प्रेम चंद जैसे लोगों, मंदिर के शिलालेखो,के जरिये आमजनता के समक्ष क्षत्रिय गौरव पहुँच गया है !इसलिए शिक्षा के नाम पर जो इतिहास पढाया जाता है ,और मनोरंजन के नाम पर टी.वी. पर जो दिखाया जाता है वह असत्य के आलावा और कुछ नहीं है !!!! ऐसे में हम क्षत्रिय जो समस्त चर-अचर ब्रह्मांड के रक्षक है, क्या केवल अपने धर्म ,संस्कृति और गौरव की रक्षा के लिए भी नहीं जागेंगे ???? तब धिक्कार है ऐसे कायरता और नपुंसकता भरे जीवन को ,,,,,,,,,


"जय क्षात्र-धर्म"
कुँवरानी निशा कँवर चौहान  

हम आप सभी से निवेदन करते ही कि आप सभी जोधा-अकबर नामक कथित धारावाहिक का विरोध करे …। यह इतिहास कि तोड-मरोड कर मन-गढत रची -रचाई झुटी कहानी है जो हमारा राष्ट्रप्रेमी समाज बर्दाश्त नही कर सकता है.…. जोधा नाम के पात्र को इतिहास मे पुष्टी नही है ! वह जयपूर के राजा कि दासी कि पुत्री थी जिसका नाम हरका था……जिस तथ्य को इतिहास में प्रमाण न हो .... जो कहानी आधारहीन तथा विवादस्पद हो उसका समर्थन क्यों किया जा रहा है? किवदंतियों को प्रमाणित इतिहास मत बनाओ .......आप राजपूताने के धधकते जौहर की ज्वालाओं को क्यों नजर-अंदाज कर रहे हो .......? स्वयं प्रिंस तुसी जी (हैदराबाद) ने भी इस बात का विरोध जताया था ! यह कोई जात-धर्म के सांप्रदायिक आधार पर संकीर्ण विचार-धारा फ़ैलाने का प्रयास बिलकुल नहीं है ....लेकिन मन-गढ़त कल्पनाओं का और झूटी कहानियों का स्वीकार क्यों करे???? चाटुकार लोगो ने ही ऐसी काल्पनिक किवदंतियों को जन्म देकर लोगों में भ्रम पैदा करने की कोशिश की है जो आज की बुद्धि को प्रमाण माननेवाली पीढ़ी कदापि स्वीकार नहीं करेगी। ऐसी कई धारावाहिक तथा फिल्मे भी अक्सर आती-जाती रहती है जिसमे ठाकुरों को खलनायक की भूमिका में दिखाया जाता है हम सबको इस बात का भी कड़ा विरोध करना चाहिए ..........हजारो साल तक इस राष्ट्र- संस्कृति की रक्षा के लिए अपने सर्वस्व को न्योछावर कर .....प्राणों का बलिदान देनेवाले नायकों की कौम को खलनायक बतानेवाली तमाम साजिशे हम सबको रोकनी चाहिए .....! उन तमाम निर्माता-दिग्दर्शकों को हमारा गौरवशाली इतिहास तथा अनुपम त्याग का अध्ययन करने की सख्त जरुरत है .....पश्चिमी सभ्यता और संस्कृति की चकाचौंध में रहनेवाले ये लोग क्या जाने उस महान विरासत का महत्त्व?
हम अभिव्यक्ति की आज़ादी का अत्यंत सन्मान करते है लेकिन कला और अभिव्यक्ति के नाम पर किसी समुदाय को आहत करने के प्रयास की कड़ी निंदा भी करते है ....!
हम सब लोकतान्त्रिक एवं शांतिपूर्ण मार्ग से इस प्रयास का विरोध करे .....यह हम सबका मुलभुत अधिकार है ....! ख्याल रहे ----उचित शब्दों का आधार लेकर ही अपनी राय दे .......गलत भाषा या तरीका इस मिशन को गलत राह्पर ले जाता है ......सावधानी जरुर बरते .....इस मिशन में सभी राष्ट्रप्रेमी नागरिक तथा संघटन अपनी यथार्थ भूमिका निभाए ..........

SOME FACTS:

1) अकबरनामा में जोधा बाई का उल्लेख नहीं है।

2) तजुक ए जहांगीरी जिसमें जहांगीर की आत्मकथा है उसमें जोधा बाई का उल्लेख नहीं है।

3) अरब की कई सारे किताबों में ऐसा वर्णित है "ونحن في شك حول أكبر أو جعل الزواج راجبوت الأميرة في هندوستان آرياس كذبة لمجلس" (हमें यकिन नहीं है इस निकाह पर)

4) ईरान के " Malik National Museum and Library" की किताबों में भारतीय मुगलों का दासी से निकाह का उल्लेख मिलता है।


5)अकबर ए महुरियत में स्पस्ट रूप से लिखा है,"ہم راجپوت شہزادی یا اکبر کے بارے میں شک میں ہیں" (हमें राजपुत विवाह पर संदेह है क्योंकि राजभवन में किसी की आँखों में आँसु नहीं था तथा ना ही हिन्दु गोद भराई की रस्म हुई थी )

6) सिख धर्म के गुरू अर्जुन देव जी तथा हरगोविन्द जी ने ये बात स्वीकार किया था कि छत्रियों ने आज अपने बुद्धि का सदुपयोग करना सिख लिया है, “ਰਾਜਪੁਤਾਨਾ ਆਬ ਤਲਵਾਰੋ ਓਰ ਦਿਮਾਗ ਦੋਨੋ ਸੇ ਕਾਮ ਲੇਨੇ ਲਾਗਹ ਗਯਾ ਹੈ “ ( राजपुताना अब तलवार तथा बुद्धि दोनों का प्रयोगकरने लग गया है। )

कृपया आप निम्नलिखित मेल कॉपी कर bccc@ibfindia.com , response@zeenetwork.com , ibf@ibfindia.com , media@zeenetwork.com , jairajputanasangh@gmail.com इन पते पर भेजे …….


Respected Sir;
The Rajput Community is strongly opposing the serial named JODHA-AKBAR. This serial is based on the fake story which had no strong evidence. It is based on some baseless and imaginary literature. The eminent historians hadn't proved it. Rajputs had shaded their blood to protect the motherland from the foreign invaders. This serial dishonours our pride so it is our birth right to oppose it. We request you on the behalf of Rajput community and the Rajput organzations to stop making and broadcasting this serial. Rajput community is one of the major community in this Nation and so their feelings should be regarded and respected. The warrior race couldn't bear the distorting with their history.
We hope that the concerned authorities should understand our feelings and stop this effort.
THANKING YOU.......

जागो मेवाड़ .....!

       भीलवाडा (राजस्थान) में कल (ता:14) एक कार्यक्रम सम्पन्न हुवा। उस कार्यक्रम में राजस्थान भारतीय जनता पार्टी के एक वरिष्ठ नेता शिरकत कर रहे थे जो मेवाड़ की ऐतिहासिक भूमि का प्रतिनिधित्व करते है। अपने भाषण में सन्माननीय नेता महोदय (जो पार्टी वुईथ डिफ़रन्स के इमानदार लोकसेवक है) कई मुद्दों पर मार्गदर्शन किया। हमें उनसे कोई शिकायत नहीं है। शिकायत करे तो ऐसी एक बात उन्होंने वहा कही जिसे लेकर दुःख है। उन्होंने कहा; "हम जो लढाई आज लड़ रहे है; वह राजा -महाराजाओं के कार्यकाल में भी लड़ रहे थे। वह काल किसी राक्षस राज से कम नहीं था।"

मित्रो; सन्माननीय नेताजी उस भूमि का प्रतिनिधित्व कर रहे है जिन्होंने अपने ऐसे बयान से उस भूमि के इतिहास के प्रति अपना अज्ञान दर्शाया है। मेवाड़ के वीरों ने सदियों तक प्राणों की बाजी लगाकर हिंदुत्व ; संस्कृती; मानवता और भारतीय स्वतंत्रता जैसे महान मूल्यों की रक्षा की है। विद्रोही विश्वासघाती बनवीर को छोड़ ऐसा कोई शासक नहीं हुवा जिसपर ऊँगली उठाई जा सके ! क्या वे नेता महोदय महाराणा सांगा ,महाराणा प्रताप के प्रण को भूल गए? उनके अपूर्व त्याग और बलिदान से ही मेवाड़ की धरा दुनिया भर में मशहूर हुई और स्वाधीनता के मन्त्र की प्रेरणा स्थली बनी रही है। हम पूछना चाहते है की है ;राजा-महाराजाओं के खिलाफ उनकी ऐसी कौनसी लड़ाई थी? उन्होंने उनका क्या बिगाड़ा था? और ऐसा कौनसा वर्तन था जिसे ये महोदय राक्षस राज कह रहे है? क्या ये हाड़ी राणी का बलिदान; पन्ना का त्याग भूल गए? क्या उसे यह भी नहीं मालूम की मेवाड़ के रणसंग्राम में राजा के साथ उनकी प्रजा भी लड़ी थी ....! ;अपने राजा के साथ जनता ने भी सुख त्याग दिए थे ....!

        यह दुर्भाग्यपूर्ण टिपण्णी है। सदियों तक क्षत्रियों ने प्राणों की बाजी लगाकर हिंदुत्व की रक्षा है। अगर क्षत्रिय न होते तो यह महान संस्कृति भी बच नहीं पाती। उनकी अलग ही पहचान होती जिसे लेकर ये लोग वर्तमान में घूम रहे है। क्षत्रियों का हिंदुत्व पाखंडी हिंदुत्व नहीं था; जो केवल सत्ता पाने के लिए इस्तेमाल किया जाये। मेवाड़ का इतिहास केवल राष्ट्र के लिए ही नहीं अपितु विश्व के लिए प्रेरक रहा है! भारत भूमि ; हिन्दू धर्म ; संस्कृति; मानवता की रक्षा हेतु मेवाड़ के वीरों ने जो अद्वितीय त्याग किया है जिसकी तुलना नहीं की जा सकती। एक समय था की सम्पूर्ण भारत में केवल मेवाड़ ही बचा था जिसने स्वाधीनता के मन्त्र को जीवित रखा था।



       आदरणीय नेता जी ऐसी महान भूमि का प्रतिनिधित्व करते है जिसपर उन्हें गर्व होना चाहिए। केवल जाती-पाती की क्षुद्र राजनीती और चंद लोगों को खुश करने के लिए कुछ भी उल्टा-पुल्टा बयान देना आजकल नेताओं की प्रवृत्ति हो गयी है। मेवाड़ की जनता अब गंभीरता से सोचे की वह कैसे लोगों को अपना प्रतिनिधित्व सौपती है! राजा-महाराजों के समय उनकी प्रजा कभी रोजगार के लिए अपना वतन छोड़ कर नहीं जाती थी जो इन के ज़माने में और शासन के कार्यकाल में रोजी-रोटी के लिए बाहरी मुल्कों में वतन छोड़ कर जा रही है। जो जनता अपनी भूमि के गौरव के खातिर बलिदान की होड़ लगाती थी उस जनता के बिच जाती-पाती की दीवारे किन्होने खड़ी की? राजा-महाराजा के प्रति आज भी सर्व सामान्य जनता के दिल में अभूतपूर्व सन्मान है जिस कारन ये नेता लोग दुखी रहते है। शायद इन्हें अक्सर भय भी होता हो की कही राजपरिवार की लोकप्रियता उनकी कुर्सी न छीन ले .....! और ऐसे बयान देने वाले महोदय को मेवाड़-केसरी जैसी उपाधि से भी कुछ मान्यवरो ने शब्द-अलंकृत किया! यह विधि की विडम्बना ही है। नेताजी से ऐसी उम्मीद नहीं थी जो किसी भूमि के सन्मान को ठेंच पहुचाये।

पूर्व सेना प्रमुख जनरल वी .के सिंह जी का देश के युवाओ से एक अपील...

(न्यूज) 
देश के वर्तमान हालात पर कटाक्ष करते हुए पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल वी.के.सिंह ने कहा कि व्यवस्था का...ले अजगर की तरह है और हम इसे दूध पिला रहे हैं !


जनरल सिंह ने कहा कि हमारा देश युवा है ! युवाओं की आबादी 71 फीसदी के लगभग है !जिस तरह पतझड़के बाद वसंत आता है और पेड़ों पर नई कोंपले फूटती हैं, उसी तरह जब तक युवा आगे नहीं आएंगे, पुराने लोग नहीं जाएंगे
अत: युवा आगे बढ़कर देश के लिए काम करें !अब प्रजातंत्र संविधान से हटकर दिखाई दे रहा है ! संविधान 'बी द पीपल' के लिए बना था, लेकिन अब संविधान का बीज पीपल खो गया है
उसे वापस लाना होगा !

उन्होंने कहा कि हम चिंतन करते रहेंगे और देश पीछे खिसकता रहेगा ! ऐसा नहीं होना चाहिए !ऐसा न हो कि देश की बोली लगने लगे !सिंह ने कहा कि सबके भीतर 'देश सर्वोपरि' की भावना होनी चाहिए ! जब सबके भीतर यह भावना होगी तभी हम देश को आगे बढ़ा पाएंगे !देश की आंतरिक स्थिति पर जनरल सिंह ने कहा कि इतिहास गवाह है, जब भी हमारा पतन हुआ या विदेशी आक्रांताओं को सफलता मिली वह सिर्फ हमारी वजह से और हमारे लोगों की मदद के कारण ही मिली ! हमें सोचना होगा कि आज हमारी स्थिति क्या है ? यह सोच-विचार का समय है !

कवि की पंक्तियों को उद्धृत करते हुए कहा- वी.के. सिंह जी ने....

'व्यवस्था काले अजगर की तरह है,

हम उसे दूध पिला रहे हैं,

समूचे राष्ट्र को कैंसर हो गया है,

हम टाइफाइड की दवाई देरहे हैं !

उन्होंने कहा कि सबको डॉक्टर बनना होगा और देश को बीमारी से उबारना होगा !जनरल सिंह ने कहा देश में भ्रष्टाचार और सामाजिक असामनता सबसे बड़ी समस्या है ! इसे दूर करने की जरूरत है ! उन्होंने कहा कि वर्ष 2010 में तत्कालीन गृहमंत्री ने कहा था कि नक्सली इलाकों में सेना तैनात करनी चाहिए तब मैंने कहा कि यह आपका मामला है ! इसे आपको सुलझाना चाहिए !उन्होंने कहा कि 1990 में 50 जिलों में नक्सलवाद की समस्या थी, लेकिन अब 272 से ज्यादा जिले नक्सलवाद की गिरफ्त में हैं ! उन्होंने कहा कि इन जिलों की स्थिति वैसी ही है, जैसी 200 साल पहले थी
ऐसी स्थिति में क्या हम उम्मीद कर सकते हैं कि वहां के लोग देश के साथ चलेंगे ??

जनरल सिंह ने कहा कि हम लेंगे तभी देश की विकृतियां और कुरीतियां दूर होंगी .......जिस दिन हम संकल्प के साथ काम करेंगे, सभी चीजें ठीक हो जाएंगी ! उन्होंने कहा कि 'सपने शायद सच नहीं होते, लेकिन संकल्प कभी अधूरे नहीं रहते' ....! बकौल वी.के.सिंह "इस भ्रष्ट सरकार के खिलाफ जितना मुखर विरोध मैंने अब शुरू किया है अगर ये शुरुवात जनरल पद पर रहते हुए किया होता इण्डिया गेट पर लाठियों से पीता नहीं जाता बल्कि इन देश के लुटेरों को संसद में लाठियों से पिटवाता ! अपने इस भूल पर मुझे जिंदगी भर अफ़सोस रहेगा....

लेकिन देर से ही सही शुरुवात मैंने कर दी है अब इस लडाई को देश के युवा आगे बढ़ाएं.....................!



जय हिन्द, जय भारत !!

"पूज्यमा की अर्चना का मै एक छोटा उपकरण हु ........!

"पूज्यमा की अर्चना का मै एक छोटा उपकरण हु ........!


चाहता हु ये मातृभू ...तुझे कुछ और भी दू .......!"

मेरे परिचय के और साथ में काम करनेवाले ऐसे कई अनगिनत समाजसेवी है ; जो स्वयंप्रकाशित होकर भी विनयशील है! ....जो दधिची के भांति अपनी निष्काम अहर्निश सेवा का कार्य कर रहे है ! ......जिनमे किसी स्वार्थ का संचार नहीं होता है और न ही रहता है कोई पुब्लिसिटी स्टंट .....जिनके कभी डिजिटल बोर्ड नहीं लगते है ; न ही किसी अखबार में उनकी तस्बीरे झलकती है .....न ही किसी मंच पर जा कर ये शोभा बढ़ाते है ......! वे किसी जातिगत ;दलगत, प्रांतीय या पंथिय जैसे संकीर्ण विचारधारा के लिए नहीं अपितु राष्ट्र-निर्माण के महान कार्य में अपने आप को नीव का पत्थर बना रहे है। जो व्यक्तिपूजा से दूर रहकर विचारधारा के प्रति अपनी निष्ठां रखते है। उनके रग -रग में भारतीयता की और स्वधर्म निष्ठां की झलक मिलती है .....ह्रदय में उन्नत मानवता के संचार का साक्षात्कार मिलता है। जिंदगी के मोड़ पर कई महान ;शक्तिशाली हस्तियोंकि मुलाकात भी हुई ... अपने कर्म से और धर्म से उन हस्तियों का मन भी जित लिया ......कुछ मांगते तो बहुत कुछ पा भी लेते .....लेकिन कुछ माँगा ही नहीं ....! क्यों मांगे? हमें तो जन-मन में इश्वर का अहसास सदैव होता रहता है .......हमारी कर्मनिष्ठता को देख इश्वर सदैव मुस्कुराता नजर आता है .......अगर कुछ मांगना पड़ा भी तो केवल उस महान प्रभु से उस शक्ति का आवाहन होगा जो इस शरिर ---मन में फिर से उमंग का निर्माण करे जो नीड़ के निर्माण में काम आये।

श्री शिवदास मिटकरी (लातूर) व् निरंजन काले (पुणे) जो स्वयं उच्च विद्याविभुषित होकर भी घरसे कई साल बाहर रहकर अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् के प्रचार एवं प्रसार के लिए जुट गए थे। जिनके सानिध्य में ही मेरी वकृत्व कला का विकास हुवा।

श्री चैतराम पवार (बारीपाडा) जो आदिवासी समाज और आदिवासी गाव का युवा .....जिसने अपनी कर्मनिष्ठा से अपने गाव का चेहरा बदल दिया। जो गाव श्री अन्ना हजारे जी के रालेगन सिद्धि जैसा स्वयंपूर्ण तथा स्वावलंबी आदर्श गाव जाना जा रहा है।

जिस साथी के साथ कार्य का आरम्भ किया था .....जो बचपन से यौवन तक के सफ़र का हमसफ़र रहा .....वह सदाशिव चव्हाण(मालपुर) आज माय होम इंडिया जैसे स्वयंसेवी प्रकल्प के माध्यम से पूर्वांचल के युवाओं को जोड़ने का .....उन्हें राष्ट्रीय प्रवाह में लेन का कार्य कर रहा है। जो युवा राष्ट्र के मूल धरा से दूर जा रहे थे .....उन्हें फिरसे प्रवाह में लेन का महान कार्य कर रहा है।

श्री विनोद पंडित जो राजस्थान के रनवास नाम के छोटे से गाव के रहनेवाले है .....गरीब ब्राह्मण है फिर भी नए लोगों को जोड़ने का .....महान कार्य कर रहे है। राजस्थान के ज्यादातर संस्थानिक उन्हें निजी रूप से जानते भी है और सन्मान भी देते है ......जो गाव-गाव में जाकर एकता के मंत्र की मंत्रणा कर रहे है। वे उस राष्ट्रीय भाव को बढ़ावा दे रहे है जो आजकल लोग भूलते जा रहे है।

श्री प्रशांत पवार (मालपुर) जी ने गौ माता को बचाने के लिए गोशाला शुरू कर निष्काम सेवा का मार्ग दिखाया। वही हमारे साथी हेमराज राजपूत जो सेवाव्रत के माध्यम से अपने सामाजिक उत्तरदायित्व को बखूबी निभा रहे है।

आदरणीय प्रा .डॉ .मधुकर पांडे (नाशिक) ,प्रा .प्रकाशजी पाठक (धुले) और श्री मदनलालजी मिश्र (धुले) हमारे पथ प्रेरक रहे है। उनके साथ बिताये हर एक पल ने हम सबको कई बाते सिखाई।

आदरणीय श्री कांतिलाल टाटिया (शहादा) जी के आदिवासी क्षेत्र के अहर्निश कार्य ने कई बार प्रेरणा भी दी।

हमने भी अध्यापक का पेशा अपनाकर आदिवासी क्षेत्र को अपना कार्यस्थल चुना। जिस क्षेत्र में राष्ट्रीय जीवन की विचारधारा का फैलाव हो ......अच्छी शिक्षा का प्रसार हो .......देशभक्त नागरिकोंका निर्माण हो। विवेकानंद केंद्र के माध्यम से भी कई आयामों का आरम्भ हो चूका है।

मातृभूमि की सेवा ही हमारा लक्ष्य हो .......आओ हम भी जहा है वही से समर्थ भारत के निर्माण का कार्यारम्भ करे। जिस चीज में इश्वर का वास होता है वह कभी नश्वर नहीं होती है। आपका कार्य अगर नेक हो तो उसे सफलता जरुर मिलेगी। इदं न ममं .....जैसी भावना ही उस कार्य को श्रेष्ठ बनाएगी।

क्या किसी गुनहगार को कोई जाती या मजहब होता है ....?



मानव और दानव में फर्क होता है। जो अन्य मानव;पशु-पक्षी-जिव-जंतु तथा प्रकृति के साथ मानवता से व्यवहार करे वही मानव कहलाने का अधिकारी है ....! और जो इस मर्यादा का उल्लंघन करता है वह होता है दानव। दानव का कोई धर्म ;पंथ; प्रान्त या जाती नहीं होती है। दानव हर जगह पनपते है और अपने कुकर्मों से समाज को तकलीफ देते है। दानवों के प्रति हमें कोई भी सहानुभूति नहीं चाहिए।



हाल ही में राजधानी दिल्ली में जो शर्मनाक घटना हुई वह हैवानियत की हद को पार करनेवाली करतूत थी। उन दरिंदो को कड़ी से कड़ी सजा सुनानी चाहिए और तुरंत उसपर अमल हो ताकि कोई भी माई का लाल आगे ऐसी जुर्रत न करे। साथ सभी समाज के लोग आगे आकर माँ-बहनों की सुरक्षा के हेतु यथोचित कदम भी बढ़ाये।



दरिंदगी करनेवाले हैवानों की कोई जात या मजहब नहीं होता है। किसी माँ का एक बेटा संत तो दूसरा खलनायक भी हो सकता है। कुसंस्कारों की वजह से ऐसी दरिंदगी का निर्माण होता है। उन दरिंदों में से एक दरिंदा अक्षय ठाकुर जो बिहार से है। हमें दु :ख होता है की वह जिस कौम से है उस कौम के लोग कभी महिलाओं की रक्षा हेतु अपने प्राणों तक को न्योछावर कर देते थे। महिलाओं की रक्षा के लिए जंग भी होती थी और प्राणोत्सर्ग भी किया जाता था। जो कौम स्री को शक्ति का रूप मानकर पूजा करती आयी है आज उसी कौम से पहचान पानेवाले उस नादाँ अक्षय ने अपनी बर्बरता से शर्म से सर निचा कर दिया। हम उसकी इस घिनौनी करतूत का कड़े शब्दों के साथ निंदा करते है और सरकार से मांग भी करते है की उसे कड़ी से कड़ी सजा दी जाये। देश और दुनिया का समस्त क्षत्रिय समाज इस घटना की कड़ी आलोचना करता है।



आज ही पंजाब से हर्षवीर सिंह पंवार जी का फ़ोन आया ....उन्होंने हमें दी हिन्दू अखबार के खबर बारे में बताया। "दी हिन्दू " नामक अखबार में हमने उस खबर का जायजा लिया। जिस खबर में अक्षय का वर्णन करते हुए उसकी जाती का भी उल्लेख किया है। किसी गुनाहगार की जाती का या मजहब का वार्ता में उल्लेख करना अनुचित है। एक ठाकुर गलत राह पर चला गया तो उसकी कौम गलत नहीं हो सकती है। व्यक्ति गलत हो सकता है .......समाज नहीं। हमने उस पत्रिका के संपादक महोदय को तुरंत इ मेल करवा दिया है और उन्हें अवगत भी करवा दिया है। इस घटना के आधार पर किसी जाती के बारे में समाज में गलत सन्देश देने का यह प्रयास सम्बंधित पत्रकार या संपादक की जातिगत संकीर्णता का परिचय देता है।



निचे LINK पर CLICK कर आप उस खबर को पढ़ सकते है: http://www.thehindu.com/todays-paper/all-accused-in-delhi-rape-case-held/article4227692.ece

सारंगखेडा का विश्व प्रसिद्ध अश्व मेला: 'चेतक और कृष्णा' के नाम से दिए जायेंगे पुरस्कार ....!




गुजरात की सीमा से महज 100 कि .मी . के दुरी पर शहादा --धुले रोड पर महाराष्ट्र में सुर्यकन्या तापी नदी के किनारे बसा सारंगखेडा गाव जो कभी रावल परिवार की जागीर का स्थल था , अपने शानदार अश्व-मेला की वजह से विश्व-प्रसिद्ध है। प्राचीन समय से यहाँ भगवन एकमुखी दत्त जी का मंदिर है। श्री दत्त जयंती के पावन अवसर पर यहाँ बहुत ही सुंदर मेले का आयोजन होता आया है। विभिन्न नस्लों के घोड़ों के लिए यह मेला दुनिया भर में मशहूर है। प्राचीन समय से भारत वर्ष के राजा-महाराजा; रथी -महारथी यहाँ अपने मन-पसंद घोड़ों की खरीद के लिए आते-जाते रहे है। आज भी देश के विभिन्न प्रान्तों से घोड़ों के व्यापारी यहाँ आते है। आनेवाली 27 दिसम्बर के दिन यात्रारंभ होगा। हर रोज लाखो श्रद्धालु भगवान दत्त जी के मंदिर में दर्शन करते है और यात्रा का आनंद भी लेते है। विभिन्न राजनेता, उद्योजक, फ़िल्मी हस्तिया यहाँ घोड़े खरीदने आते-जाते रहते है। इस साल भी अभिनेता शक्ति कपूर , लावणी सम्राज्ञी सुरेखा पुणेकर, ईशा और अभिनेत्री सोनाली कुलकर्णी यहाँ महोत्सव में उपस्थिति दर्ज करने पधार रहे है। इस मेले में कृषि प्रदर्शनी; कृषि मेला; बैल-बाजार; लोककला महोत्सव; लावणी महोत्सव तथा अश्व स्पर्धा आदि का आयोजन होता है।

वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप जी का घोडा "चेतक" तथा छत्रपति शिवाजी महाराज जी घोड़ी "कृष्णा" इतिहास में प्रसिद्ध है। महाराणा प्रतापसिंह जी के जीवन में चेतक घोड़े का साथ महत्वपूर्ण रहा था। कृष्णा घोड़ी ने भी छत्रपति शिवाजी महाराज के संघर्ष के काल में अभूतपूर्व योगदान दिया था। चेतक और कृष्णा के नाम से इस साल सारंगखेडा मेले में पुरस्कार दिए जायेंगे। दौड़ में सर्वप्रथम आनेवाले अश्व को चेतक पुरस्कार--11000 रु की नगद राशी .- चेतक स्मृति चिन्ह और रोबीले पण में सर्वप्रथम आनेवाले अश्व को कृष्णा पुरस्कार--11000 रु . की नगद राशी --कृष्णा स्मृतिचिन्ह प्रदान किया जायेगा। इस मेले में दोंडाईचा संस्थान के कुंवर विक्रांत सिंह जी रावल जी के अश्व -विकास केंद्र के घोड़े भी मौजूद रहते है। जिनमे फैला-बेला नाम की सिर्फ 2.5 फिट ऊँची घोड़ों की प्रजाति ख़ास आकर्षण का केंद्र रहेगी। सारंगखेडा के भूतपूर्व संस्थानिक तथा वर्तमान उपाध्यक्ष (जि .प .नंदुरबार) श्री जयपालसिंह रावल साहब तथा सरपंच श्री चंद्रपालसिंह रावल के मार्गदर्शन में इस मेले की सफलता के लिए स्थानीय पदाधिकारीगन प्रयत्नरत है।

इस अभूतपूर्व अश्व मेले के बारे में अधिक जानकारी के लिए क्लिक करे:



दिमागी संतुलन को बनाये रखे।



पर्यावरण का असंतुलित होता चक्र आज-कल इंसान के भी दिमागी पर्यावरण को घातक साबित होता नजर आ रहा है ......... और ऐसे प्रदूषित दिमाग से प्रदूषित कल्पनाये भी पैदा होकर दुनिया में अपना रंग दिखाने एवं बिखेरनी लगी है .........जैसे हाल ही में जो अमीर बने है वह फुले नहीं समां रहे है वैसे ही कुछ तत्व किसी छुट-फुट दल या संघटन के पद को पाकर हवा में उड़ने लगे है। उन्हें देख हमें उस मानसरोवर के शुभ्र-धवल हंस और एक्क्यावन तरह की उड़ाने उडनेवाले कौवे की कहानी भी याद आ जाती है। किसी सड़क या चौक में डिजिटल फ्लेक्स लगवाना या अख़बारों में छाये रहने की कवायद करना ही कुछ लोगों की जिंदगी का अहम् पैलू हो जाता है। हम उनका मुख-रस-भंग नहीं करना चाहते है फिर भी उनके आत्म-अविष्कारी पाखंड को उजागर करने से हम अपने आप को रोक नहीं पाते है।

फेसबुक पर भी कुछ अल्प-मति महोदय इतने उतावले हो जाते है की मानो औरों की अब खैर ही नहीं। कथित नशे में चूर शराबी जैसे मादकता के आनंद -सागर में गोते लगता है ......वैसे ही ये अल्प-मति महाशय अपने बाल-सुलभ विचारोंकी एवं कल्पनाओं की दुनिया में डूबकिया लगाते रहते है।

कही से भी प्रकाशित या प्रदर्शित विचारोंको चुराकर समाज-उद्धारक के रूप में पोस्ट करना तो कोई इनसे ही सीखे। उनकी नजर में तो सारे राजनितिक दल और नेता तो चोर ही है। और दुनिया में अगर कोई सत्यवादी बचे है तो सिर्फ ये ही महाशय है। लगता है जब दुनिया डूब रही थी तो नोवा की नौका में सिर्फ उन्हीके आदी-पुरुष बच पाए हो। और अब उन आदि-पुरुषों के ये चाणाक्ष वंशज दुनिया में क्रांति की पहल कर रहे है। लेकिन अगर कोई बन्दर शराब का एक घूँट पि ले तो उसकी मर्कट लीला आरम्भ हो जाती है ....वैसे ही ये सज्जन अपनी शब्द-लीला का परिचय देने लगते है। कभी-कभी मदहोशी में ये महोदय आपे के बाहर भी हो जाते है तब उन्हें रोक पाना एक मुश्किल घडी बन जाती है।

उनकी राजनितिक और जातिगत भावनाए इतनी तीव्र हो जाती है की कही ये साक्षात् ब्रह्म देव को न पूछ बैठे की अन्य लोग इस धरती पर क्यों है ? हमें कभी-कभी ऐसी आशंका भी सताने लगती है। कभी एक महोदय ने ऐसी ही टिपण्णी की थी की ,"जो अपनी जात का न हुवा वह अपने बाप का नहीं।" .....हम काफी देर तक उस की ऐसी हरकत पर हसते रहे। उसका उद्देश क्या था उसका अर्थ हमारा अंतर्मन नहीं लगा सका लेकिन हम उस निष्कर्ष तक पहुचने में कामयाब हो गए की ...उस महाशय ने उस दिन एक-दो घूँट ज्यादा ही उतार लिए होगे। वह चाहता था की फेसबुक पर जाती के बजाय  अन्य कोई बात ही ना हो। अज्ञान के अन्धकार में अंधे बनकर दिशा टटोलने का वृथा कष्ट करनेवाले उस बालक की वैचारिक क्षमता पर हमें तरस आया। और हम ने उसे समझाया भी की भाई, "क्षत्रिय केवल एक जाती-विशेष नहीं जो सिर्फ अपनी ही सोचे .....बल्कि ये एक महान व्रत है जो अपने साथ-साथ इस सृष्टि एवं चराचर का भी कल्याण सोचती है।" किसी क्षत्रिय शब्द पर बल देनेवाली सभा का एक सदस्य जिसे क्षत्रिय का अर्थ पता नहीं था और वह क्षत्रिय की बात बड़े ही आक्रमकता के साथ कर रहा था। हमने उस कथित जिज्ञासु की जिज्ञासा का हल निकलने के लिए उन्हें श्री क्षत्रिय वीर ज्योति के मंथन शिबिर में या श्री क्षत्रिय युवक संघ के किसी शिबिर में उपस्थित रहने का निमंत्रण भी दिया लेकिन अपने अहं के आत्म-तुष्टि में मग्न उस महोदय ने उस वक्त अपने भ्रमण-ध्वनी यन्त्र तक को सिमाँपरोक्ष कर के रखा।

हमारा कहने का उद्देश यह है की , सिर्फ अपनी ही परिसीमा को ही विश्व मत समझो .....हर एक नेक विचार का स्वागत करो .....और अपने आप को अगर एक महान विरासत का वंशज मानते हो तो हमें अपनी मर्यादा का उचित ख्याल भी रहे तो अच्छा होगा। हमारी भाषा-व्यवहार-आचरण से ही हमारी संस्कृति महान बनती है और विश्व के आदर के पात्र बनती है। उसे ठेंच न पहुचे। बोलने के बाद सोचने से बेहतर है की सोच कर बोलो। अपने आप को उतावले होकर आपे से बाहर मत करो। हम मध्य-युग में नहीं बल्कि वर्तमान युग में जी रहे है।

वरण गाव (जि .जलगाव ,महाराष्ट्र) के निवासी .......वारकरी संप्रदाय द्वारा दीक्षा प्राप्त बाल अनुरागी ......बाल कीर्तनकार ......जिनकी उम्र केवल 15 साल है  ......जिनकी वाणी से हजारो लोग प्रभावित होकर भजन-सुमिरन और कीर्तन के माध्यम से भक्तिरस  का  आनंद लेने लगे ......संत मीराबाई- संत ज्ञानेश्वर ---संत तुकाराम महाराज के चरित्र से प्रेरणा लेकर --अपने गुरु के मार्गदर्शन के अनुसार ज्ञान प्राप्त कर अब समाज के प्रबोधन एवं भक्ति मार्ग के प्रचार के कार्य में जुट गए -----ह .भ .प .अमरसिंह महाराज राउल जी का कीर्तन हाल ही में हमारे गाव वाठोडा में सम्पन्न हुवा! 


क्या राष्ट्र गौरव के सम्मान की चिंता सिर्फ राजपूत समुदाय को ही करनी चाहिए ?


By - Ratan Singh Bhagatpura
दिल्ली के बादशाह अकबर के साथ अपने स्वातंत्र्य संघर्ष के दौरान महाराणा प्रताप को चितौड़गढ़ छोड़कर वर्षों तक जंगलों व पहाड़ों में विस...्थापित जीवन जीना पड़ा!
उनके उसी संघर्ष से आजादी की प्रेरणा लेकर भारत के लोगों ने अंग्रेज सत्ता से मुक्ति पाई!
आज भी महाराणा प्रताप राष्ट्र में स्वाधीनता के प्रेरणा श्रोत व राष्ट्र नायक माने जाते है!
स्वाधीनता संघर्ष के लिए जब भी किसी वक्ता को कोई उदाहरण देना होता है तब राष्ट्र नायक महाराणा प्रताप का नाम सर्वोपरि लिया जाता है!
देश की राजधानी दिल्ली में इस राष्ट्र गौरव को सम्मान देने व उनकी स्मृति बनाये रखने हेतु कश्मीर गेट स्थित अंतर्राज्य बस अड्डे का नामकरण महाराणा प्रताप के नाम पर किया गया!
साथ ही अंतर्राज्य बस अड्डे के साथ लगे कुदसिया पार्क में महाराणा की एक विशाल प्रतिमा स्थापित की गई! जो उधर से आते जाते हर व्यक्ति को दिखाई देती थी! पर कश्मीरी गेट के पास बन रहे मेट्रो रेल के निर्माण के बीच में आने की वजह से उस मेट्रो रेल ने जिसने एक खास समुदाय की भावनाओं का ख्याल रखते हुए अपना निर्धारित रेल लाइन का रूट तक बदल दिया था---- ने महाराणा प्रताप की इस प्रतिमा को उखाड़ कर एक कोने में रख विस्थापित कर दिया जिसे राजस्थान व देश के अन्य भागों के कुछ राजपूत संगठनों व दिल्ली के ही एक विधायक के विरोध करने के बाद मूल जगह से दूर कुदसिया पार्क में अस्थाई चबूतरा बनाकर अस्थाई तौर पर स्थापित किया!
पर आज प्रतिमा को हटाये कई वर्ष होने के बावजूद मेट्रो रेल प्रशासन ने इस प्रतिमा को सम्मान के साथ वापस लगाने की जहमत नहीं उठाई...................!
जबकि मेरी एक आर.टी.आई. के जबाब में मेट्रो रेल ने प्रतिमा वापस लगाने की जिम्मेदारी भी लिखित में स्वीकार की है साथ ही निर्माण पूरा होने के बाद प्रतिमा सही जगह वापस स्थापित करने का वायदा भी किया पर इस कार्य के लिए मेरे द्वारा पूछी गई समय सीमा का गोलमाल उतर दिया.........!
शहर के विकास कार्यों के बीच में आने के चलते प्रतिमा हटाने में किसी को कोई आपत्ति नहीं पर उसे वापस समय पर न लगाना चिंता का विषय तो है ही साथ ही राष्ट्र गौरव के प्रतीक महाराणा प्रताप का अपमान भी है.....!.
पर अफ़सोस राष्ट्र गौरव के प्रतीक के अपमान के खिलाफ देश के कुछ राजपूत संगठनों के अलावा किसी ने कोई आवाज नहीं उठाई......!
अपने आपको राष्ट्रवादी कह प्रचारित करने वाले संगठन भी इस मुद्दे पर मौन है.....!
लज्जाजनक बात तो यह है राष्ट्रवाद का दम भरने व अपने कार्यक्रमों में महाराणा प्रताप के चित्रों का इस्तेमाल करने वाली भाजपा जो दिल्ली के स्थानीय निकाय दिल्ली नगर निगम में काबिज है और जो इस प्रतिमा के लिए उपयुक्त जगह का इंतजाम कर सकती है एकदम निष्क्रिय है......!
क्या भाजपा व राष्ट्रवादी संगठन सिर्फ अपने कार्यक्रमों में महाराणा का चित्र लगाकर और उनकी वीरता का बखान करने तक ही सीमित है ?
क्या राष्ट्र गौरव के सम्मान की चिंता सिर्फ राजपूत समुदाय को ही करनी चाहिए ?
क्या महाराणा की प्रतिमा को मेट्रो रेल की सुविधानुसार व उसकी मर्जी से पुन: स्थापित करने तक उसे कुदसिया पार्क में विस्थापित स्थित में ही छोड़ देना चाहिए ?

श्री क्षत्रिय वीर ज्योति का पंचम मंथन शिविर (हमीरगढ़ ) संपन्न



श्री क्षत्रिय वीर ज्योति के पंचम मंथन शिविर का आयोजन दिनांक 17/11/2012 से 18/11/2012 तक प्रातः स्मरणीय स्वतंत्रता के दीवाने महाराणा प्रताप की मेवाड़ धरा के हमीरगढ़ (भीलवाड़ा) में किया गया था ! मंथन शिविर हमीरगढ़ के पहाड़ी में स्थित रमणीय स्थल इको पार्क में "मंशा महादेव" मन्दिर के प्रांगन में दिनांक 17/11/2012 को समय क़रीब 03.00 बजे शाम प्रारंभ हुआ !श्री क्षत्रिय वीर ज्योति के अध्यक्ष वासुदेव भगवन श्री कृष्ण की मंगलिक मंत्रोच्चारन के साथ उपासना के उपरांत कार्यक्रम की शुरुआत करते हुए सर्व‌-‌-प्रथम श्री क्षत्रिय वीर ज्योति के संस्थापक सदस्य एवं आधारस्तंभ ठाकुर साहब जयपालसिंह गिरासे,शिरपुर (शिशोदिया) ने श्री क्षत्रिय वीर ज्योति की प्रस्तावना उपस्थित क्षत्रिय एवं क्षत्रानियो के समक्ष रखी ! इसके बाद प्रमुख मार्गदर्शक कुँवर राजेंद्र सिंह नरुका (बसेट) ने क्षत्रिय वीर ज्योति के लक्ष्य एवं उसे हासिल करने के लिए आगामी 46 वर्षों का कार्य-क्रम क्रमवार विस्तार से बताया ! मिशन के लिए धन एवं साधनों के स्रोत्रो पर भी विस्तार से बताया गया ! गुजरात से पधारे श्री मुक्तेश सिंह जी मन्हार ने पिछले 4 वर्षों तक के संस्थान के द्वारा लक्ष्य की दिशा में तय की गयी दूरी एवं क्रियाकलापों के बारे में बताया !गुजरात से ही पधारे श्री जयदीप सिंहजी झाला ने श्री क्षत्रिय वीर ज्योति के मिशन में अपने द्वारा किए गए कार्यों के बारे में बताया ! संस्थान के संस्थापन में अग्रणी भूमिका निभाने एवं मध्य-भारत में क्षत्रिय धर्म जागरण रत श्री डॉक्टर साहब प्रल्हादसिंहजी सिकरवार(गुना) ने आज के परिवेश में क्षत्रिय वीर ज्योति के मिशन की अवश्यकता के बारे में बताया ! इसके बाद मंथन शिविर में उपस्थित सभी बंधुओं से अपने-अपने विचार व्यक्त करने को कहा गया !सभी उपस्थित क्षत्रिय बंधुओं ने अपना पूर्ण सहयोग श्री क्षत्रिय वीर ज्योति को प्रदान कराने का वायदा किया ! अपनी शंकाओं को प्रकट किया जिनका समाधान संस्थान की ओर से किया गया ! इस मंथन शिविर में आदरणीय राजाधिराज हेमेन्द्रसिंहजी बनेरा (पूर्व-सांसद ) सहित राजस्थान ,एम.पी.,गुजरात, महांराष्ट्र ,दिल्ली,उ.प्र. से कार्यकर्ताओ ने भाग लिया !शिविर के मेजबान रावतसाहब श्रीमंत युगप्रदीपसिंहजी हमीरगढ़ थे ! मंथन शिविर में राजाधिराज हेमेन्द्रसिंहजी बनेरा ने इस मिशन को क्षत्रिय धर्म पुनर्स्थापना के लिए अत्यन्त आवश्यक बताया और अपना पूर्ण सहयोग देने का आश्वासन दिया ,साथ ही वर्तमान सभी प्रकार के राजपुत राजनेताओ से सावधान रहने की सलाह दी ! उद्योजक श्री कुलदीपसिंहजी श्यामपूरा ने भी अपना सहयोग देने का वायदा किया ! मेजबान रावत साहब हमीरगढ़ (श्री युगप्रदीपसिंह जी ) ने सभी का यहा पधारने का आभार व्यक्त किया एवं अपने संगठन जय राजपूताना युवा सेवा संसथान की ओर से इस मिशन के लक्ष्य हेतु पूर्ण सहयोग का आश्वासन दिया ! क्षत्रिय धर्म की पुनर्स्थापना में क्षत्रनियो की भूमिका क्या है, और किस प्रकार आज क्षत्रनियो को इस दूषित होते वातावरण से बचाया जाए ,इस पर कुंवरानी साहिबा निशाकँवरजी ने सभी को विस्तार से समझाया ! इसके बाद सायंकाल श्री चामुंडा भवानी माताजी के मन्दिर में दर्शन किए गए ! रात्रि हमीरगढ़ राजमहल में 08.00 बजे से 12.00 बजे तक पुनः शंका समाधान का दौर हुआ ! इस सत्र में इतिहास, धर्म, रामायण---महाभारत---गीता आदि गहन विषयोंपर भी महत्वपूर्ण चर्चा की गयी। इसके बाद दिनांक 18/11/2012 प्रातः 09.30 बजे सभी श्री क्षत्रिय युवक संघ के बालिका शिविर में देवली गाव के पास ....बनास नदी के किनारे थला माता के मंदिर बिलिया ,खरदा गए एवं ठाकुर जयपालसिंहजी गिरासे (शिशोदिया),रावतसाहब श्रीमंत युगप्रदीपसिंहजी हमीरगढ़ ,डॉक्टर साहब प्रह्लाद सिंहजी गुना एवं कुँवर राजेंद्र सिंह जी नरुका ने विस्तार से बालिकाओं एवं वहा उपस्थित सभी क्षत्रिय एवं क्षत्रनियो को क्षत्रिय धर्म एवं श्री क्षत्रिय वीर ज्योति मिशन के बारे में समझाया ! इसके बाद सायंकाल 03.00 बजे शिविर समापन हुआ एवं सभी ने भाव भीनी विदाई ली ! मेजबान रावतसाहब युग्प्रदिपसिंह हमीरगढ़ ; श्रीमान हर्षप्रदिपसिंहजी हमीरगढ़  का मृदुल एवं मिलनसार व्यवहार प्रशंसनीय रहा !इस मंथन शिविर में भंवर रविराज सिंह मेडी ;युवा नवोदित व्यवसायी कुँवर हेमेन्द्र सिंह जी तंवर (दीपावास) भी उपस्थित रहे ! भँवर् कुश (11 वर्षीय) एवं भँवर बाईसा उत्तम कँवर(13 वर्षीय) ने भी मंथन शिविर में पूरा भाग लिया ! इस मंथन शिविर में जो मुख्य निर्णय हुए वे निम्न प्रकार है :‌-1)अगला मंथन शिविर मध्य प्रदेश में गुना में मार्च 2012 में आयोजित होगा !इसके आयोजक डॉक्टर साहब प्रह्लाद सिंह जी सिकरवार होंगे !2) सन् 2014 तक इस क्षत्रिय वीर ज्योति मिशन में कुल 10000 सक्रिय सदस्य बनाने है !3) अगले मंथन शिविर में तय किया जायेगा कि सदस्यों से सदस्यता शुल्क कब से लेना शुरू किया जाएँ !4)श्री क्षत्रिय वीर ज्योति के मिशन की जानकारी के लिए "क्षत्रिय संसद" ब्लॉग को नियमित किया जाएँ! और ज्ञान दर्पण ,राजपूत वर्ल्ड , पर भी लगातार इसकी जानकारी उपलब्ध करवायी जायेगी !5) पति के साथ चिता में बैठकर स्वर्ग गमन करने वाली क्षत्रनियो से ज्यादा वे क्षत्रनियो महान मानी जाएँ जो विधवा रहकर अपने पति के परिवार का सहारा बनती है ! और उनके पति के लक्ष्य में अपना पूरा जीवन समर्पित करती है! अतः विधवा क्षत्रनियो को तपस्विनी और देवी का रूप मानकर उनका भरपुर सम्मान किया जाये ! 6)क्षत्रिय युवक संघ के दोनों घटकों से दंपती शिविर के जरिये क्षत्रिय वीर ज्योति के स्थापित होने वाले गुरुकुलों के लिए क्षत्रिय एवं क्षत्रनियो के संस्कारित परिवारों को चिह्नित कराने का निवेदन किया जायेगा ! "जय क्षात्र-धर्म" !!!



प्रचार प्रमुख



श्री क्षत्रिय वीर ज्योति

हमीरगढ़ में राजपूताना युवा सेवा संस्थान द्वारा वार्षिकोत्सव का सफल आयोजन.....!

श्री राजपुताना युवा सेवा संस्थान द्वारा हमीरगढ़ (जी.भीलवाडा,राजस्थान) में ता.२८ अक्टूबर के दिन दूसरा वार्षिकोत्सव दिवस मनाया गया! इस अवसर पर क्षत्रिय महाकुम्भ का सफल आयोजन किया गया था! हमीरगढ़ की पवित्र भूमि पर बड़े ही उत्साह से क्षत्रिय महाकुम्भ में सम्मिलित होने के लिए मेवाड़, मारवाड़,शेखावाटी, हाडोती सहित देश के कोने-कोने से सक्रिय क्षत्रिय कार्यकर्ता उपस्थित रहे!  विशाल शामियाने में रणवाद्यों के साथ  आनेवाले अतिथियों का स्वागत किया जा रहा था!  समारोह के शुरुवात माँ अम्बा भवानी  , वीरशिरोमणि महाराणा प्रताप और छत्रपति शिवाजी महाराज की प्रतिमा पूजन से हुई! माँ भवानी की सामूहिक आरती कर शक्ति की उपासना की गयी! राजपुताना युवा सेवा संस्थान के द्वारा और हमीरगढ़ के रावत श्री युग्प्रदिप सिंहजी द्वारा उपस्थित अतिथियों का स्वागत किया गया! समारोह की अध्यक्षता मंडलगढ़ के विधायक श्री प्रदीप कुमार सिंह  सिंगरौली ने की!  मुख्य अतिथि श्री लोकेन्द्रसिंह कालवी (शीर्ष संस्थापक: श्री राजपूत करणी सेना) ने इस अवसर पर मार्गदर्शन करते कहा की , शिक्षा ही अब समाज का विकास कर सकती है! आज इस समारोह से संकल्प लेकर नशामुक्ति; स्री-भ्रूण हत्या; दहेज़ प्रथा का त्याग कर शिक्षा के प्रति नवयुवकों को बढ़ावा दे ! राजनीती की दीवारे गिराकर समाज के लिए हमें एक ही मंच पर आना चाहिए.....उन्होंने यह भी कहा की अब सर गिराने की नहीं अपितु सर गिनाने की सक्त जरुरत है! लोकतंत्र में मजबूत समाज-शक्ति का निर्माण ही राष्ट्र को सही दिशा दे सकता है!  सिरोही संस्थान के भूतपूर्व महाराजा श्री रघुवीरसिंह जी ने इतिहास के प्रेरक प्रसंग बताकर उपस्थित कार्यकर्ताओं को क्षात्र-धर्म के पुनर्जागरण का आवाहन किया! जौहर स्मृति संस्थान के अध्यक्ष श्री राज ऋषि उम्मेदसिंह जी धौली ने मेवाड़ी भाषा में भाषण कर उपस्थित लोगोंका दिल जीता! उन्होंने आज के युवाओं से समाज के लिए समर्पित होने की आवश्यकता जताई! ठाकुर श्री मनोहरसिंह जी कृष्णावत ने समाज कार्य के लिए हर एक घर से नई पीढ़ी को प्रेरणा मिले और आगे आये तब ही हम गति से आगे बढ़ेंगे.....अपने आवेश से उन्होंने सभी को प्रेरित किया! इस समारोह का खास आकर्षण रहा कुमारी धनश्री चौहान का अभिभाषण....! अपनी मृदु वाणी से ...वीररस युक्त काव्य-पंक्तिओं के सहारे....स्री-भ्रूण हत्या, दहेज़, नशापानी आदि कुरीतिओं पर प्रकाश डालकर समाज का प्रबोधन किया.....साथ ही नारी-शक्ति को समाज में परिवर्तन लाने के लिए कटिबद्ध होने का आवाहन किया! श्री प्रदीप कुमार सिंह; श्री कुलदीपसिंह शामपुरा ,श्री सुरेन्द्रसिंह मोत्रास ; श्री भूपेंद्र चौहान, श्री सुरेन्द्रसिंह ; रावत श्री युग्प्रदिप सिंहजी हमीरगढ़; भा.ज.प्. के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष श्री नाहरसिंह जोधा जी ने भी समारोह को संबोधित  किया! राजस्थान विधान सभा के पूर्व उपाध्यक्ष श्री देवेन्द्रसिंह जी बद्लियास जी के पोते श्री प्रदयुम्न सिंह बद्लियास ने संस्थान को एक लाख रुपये की राशी प्रदान की! इस अवसर पर उपस्थित युवा वर्ग ने उत्स्फूर्त रक्तदान कर ६५ यूनिट रक्त संकलित किया! समारोह में आये सभी महानुभावों के लिए विशाल भोज का भी सुन्दर आयोजन रहा! समारोह में समाज के प्रतिभाशाली व्यक्तिओं का विशेष सन्मान किया गया! इस समारोह के लिए  मुख्य अतिथि हिज हायनेस महाराव श्री रघुवीरसिंह जी (सिरोही संस्थान), श्री राजपूत करणी सेना के शीर्ष संस्थापक- श्री ठा. लोकेन्द्रसिंह जी कालवी; राज ऋषि श्रीमान ठाकुर उम्मेदसिंह जी धौली(अध्यक्ष:जौहर स्मृति संस्थान, चित्तोड़) , समारोह के अध्यक्ष: श्रीमान सुरेन्द्रसिंह जी सिंगरौली(विधायक,मंडलगढ़ ),श्रीमान भैरूसिंह जी चौहान (पूर्व अध्यक्ष: जि.प.चित्तोड़), श्रीमान ठा. मनोहरसिंह जी कृष्णावत(भूपाल नोबल्स,उदयपुर), श्रीमान रावत युग्प्रदिप सिंघजी हमीरगढ़, श्री शक्तिसिंह जी कारोही; श्री प्रद्युम्न सिंहजी बदलियास; श्री गजराज सिंह जी हाथीपुरा; श्री.मेघसिंहजी ,श्री.भूपेंद्रसिंहजी चौहान, आगरा; विपक्ष नेता श्री कमलसिंह पुरावत, उपप्रधान श्री भोपालसिंह पुरावत; श्री नाहरसिंह जी जोधा (राष्ट्रीय उपाध्यक्ष:भारतीय जनता पार्टी) ;श्री जयपालसिंह गिरासे(शिरपुर); श्री. भंवर खंगारोत रेटा (जय राजपुताना) ;श्री जसवंतसिंह बावलास; श्री इन्द्रपाल सिंह करेडा; श्री जितेन्द्रसिंह कारंगा (प्रदेक्षाध्यक्ष:श्री राजपूत करणी सेना); श्री कुलदीपसिंह श्यामपुरा; श्री नरपतसिंह, श्री मनिराज सिंह, श्री सिकरवार,श्री परमार, श्री गहलोत, श्री धनसिंह जी,श्री मंगलसिंह जी,श्री संदीपसिंह जी आदि. उपस्थित थे! बहुत ही सुन्दर तरीके से समारोह का सञ्चालन अनिताकुंवर कृष्णावत बाईसा ,उदयपुर   ने किया! इस समारोह की यशस्विता के लिए रावत श्री युगप्रदिप सिंह जी हमीरगढ़; श्री हर्षप्रदीपसिंहजी हमीरगढ़; श्री कुलदीपसिंह जी श्यामपुरा,श्री विनोद पंडित  और राजपुताना युवा सेवा संस्थान के कार्यकर्ताओ ने परिश्रम लिए! अगले वर्ष यह समारोह करेडा गाव में आयोजित करने की श्री इन्द्रपाल सिंघजी ने उदघोशना की!

समाज हित में कडुवी बात....!

किसी भाई ने आरक्षण के मसले पर तमाम समाज को एक साथ आने की और व्यवस्था के खिलाफ कड़ी जंग का ऐलान करने की बात फेसबुक पर हाल ही में कही है.....हम ने उस भाई के साथ अभी-अभी ही चर्चा की और उन्हें समझाने की कोशिश भी की! क्या रस्ते पर उतर कर सरकार या व्यवस्था से जंग का ऐलान कर यह संभव है? रस्ते पर उतर कर या लम्बा-चौड़ा भाषण देकर कोई क्रांतिकारी नहीं हो जाता है! हमारी बाते कुछ भी नहीं कर सकती है उल्टा आज की पीढ़ी के दरम्यान अराजकता का निर्माण कर सकती है और हमारी कौम की प्रतिमा राष्ट्रीय स्तर पर ख़राब कर सकती है! किसी भी प्रयास को आजकल सरकार के द्वारा कुचल दिया जाता है! समाज को भड़काकर कोई नेता भी बन जाता है या सत्ता की मंझिल तक का सफ़र भी कर लेता है और बाद में समाज को भी भूल जाता है! हालात ख़राब होते है आम आदमी के! वह कही का नहीं रहता....! किसी भी उपद्रव का पहला शिकार होता है आम आदमी.....! समाज के झंडे तले अगर किसी मोर्चा का गठन भी होता है तो उसमे हमारा नुकसान ही नुकसान होता है! जातिगत विद्वेष की भावना झेलनी पड़ती है आम आदमी को ही! या सबसे पहले कानून का शिकंजा भी आम आदमी के गले में ही फसाया जाता है! किसी पार्टी या अपने समाज के नेता को केवल दोष देकर या फिर फिर नए संघटन बना -बना कर यह कार्य संभव नहीं होगा.......!


सबसे पहले हमारे लोगों के बिच एक अदम्य विश्वास का निर्माण करना होगा !जो विश्वास उन्हें कार्यरत रहने की प्रेरणा देगा.....भिकारी लोग झगड़ते है....निर्बल और कायर लोग कटोरा लेकर किसी से उम्मीद रखते है.......अगर हम खुद को शेर मानते है तो हमें एक दुसरे की सहायता कर .....अपनी निजी आदते बदलकर.......स्वयंपूर्ण होकर फिर से आदर्श विश्व का निर्माण करना होगा......व्यवस्था को बदलने से पहले हम खुद बदले.........इस दिशा में कदम रखने के लिए कई तरीके है जो समाज को कई बार बता चूका हु.....सिर्फ राजनीती या सत्ता ही हमारा लक्ष नहीं हो सकता....सत्ता के लिए धर्म की सहायता लेनेवाले भी सत्ता पर जाकर अपना धर्म भूल जाते है......सत्ता एक विष के सामान है.....जो कलि की तरह व्यक्ति को पद्भ्रष्ट भी कर देती है ! क्या अम्बानी ने झगड़ने की बाते की थी? या आरक्षण के लिए वह रस्ते पर उतरे थे? आज अम्बानी कई लाख लोगों के घर चलते है...! अम्बानी जैसी कई हस्तिया इस देश में हर जगह हर समाज में मौजूद है.....! हमारे सामने मारवाड़ी,सिन्धी और सिख समाज के अच्छे उदाहरण है जिन्होंने सामूहिक योगदान से अपने ही हर एक भाई की सहायता कर उसे खड़ा किया है!आज इस कौम के लोग हर क्षेत्र में प्रभावशाली है ! हमें उनसे प्रेरणा लेनी चाहिए! जो आमिर है वह अपनी ही मस्ती में और शान में खोया है उसे अपने ही भूके-प्यासे भाई की तड़प नहीं दिखती! जो नेता है उसे सिर्फ अपने ही चंद रिश्तेदारोंकी फ़िक्र है......उसकी नजर में तो समाज को मारो गोली....! कोई भाई इस दिशा में कदम भी रखता है तो समाज के ही कुछ स्वार्थी तत्व उसके अहित के लिए शक्ति लगते है! क्या हम उद्योग के विश्व का निर्माण कर अपने आर्थिक हालत पर हल नहीं निकल सकते है? क्या हम शिक्षा के आधुनिक शिखर को प्राप्त कर अपने भविष्य का निर्माण नहीं कर सकते है? क्या हम अपने ही निर्बल भाई का सहारा देकर उसमे फिर से स्वाभिमान से जीने की उम्मीद नहीं दे सकते है? संयुक्त कुटुंब व्यवस्था कई समस्यओंका हल है! आज वह व्यवस्था डूबने की कगार पर खड़ी है !!! हम अपने ही महान मुल्योंको भुलाने लगे है!पुना-मुंबई या दिल्ली-बेन्गालोरू की चकाचुन्ध में रहने वाले युवा आजकल अपने माँ-बाप तक को घर से बाहर निकालने लगे है....वो समाज की भलाई में क्या योगदान दे सकते है....? जो सिर्फ गाड़ी-बंगला-पार्टी और दौलत के पीछे भाग रहा हो राष्ट्र का निर्माण कैसे कर सकता है.......पैसा जरुर प्राप्त करो....लेकिन उसका विनियोग ऐसा करो की तुम्हारी आनेवाली पुश्ते उस धन-राशी का सदुपयोग करे....और न की दुरुपयोग.....! पैसा केवल साधन हो सकता है.......साध्य नहीं! जो लोग अपने आत्मविश्वास को खो बैठते है वे लोग नीड़ का निर्माण नहीं कर सकते है......जरुरी है की अपने समाज के खोये हुए आत्मविश्वास को जगाओ........फिर से भेदभाव भुलाकर उदार दिल से हमें फिर से एक ही मंच पर एक ही सूत्र में समाज को बाँधने के लिए एक होना होगा! आपसी सहयोग ....सामाजिक राशी....सामाजिक शक्तिकेंद्र का निर्माण करना होगा.....जो केंद्र अस्थिपंजर समाज को फिर से शक्तिशाली बननेकी उम्मीद देगा......और भविष्य के अंधकार में खोनेवाले हमारे भाई-बहनोंको फिर से प्रकाश की किरण दिखायेगा.....आनंद----उल्हास का निर्माण फिर से होगा! जब फेसबुक जैसे साधन हमारे पास है तो उसका विनियोग नफरत फ़ैलाने के लिए नहीं अपितु चेतना जगाने के लिए करो.....उम्मीद के निर्माण के लिए करो....एक दुसरे के मार्गदर्शन के लिए करो! ख्याल रहे की किसी की निंदा से हमारा भला नहीं हो सकता ........हम ही एक आशा की ऐसी किरण बने जिसकी रौशनी इस जगत में जगमगाए.....जो पथ-दर्शी बने जो अँधेरे को टटोल रही है!

आपका हितैषी: जयपालसिंह विक्रमसिंह गिरासे(शिरपुर)

समाज हित में एक कडुवा सच !

किसी भाई ने आरक्षण के मसले पर तमाम समाज को एक साथ आने की और व्यवस्था के खिलाफ कड़ी जंग का ऐलान करने की बात फेसबुक पर हाल ही में कही है.....हम ने उस भाई के साथ अभी-अभी ही चर्चा की और उन्हें समझाने की कोशिश भी की! क्या रस्ते पर उतर कर सरकार या व्यवस्था से जंग का ऐलान कर यह संभव है? रस्ते पर उतर कर या लम्बा-चौड़ा भाषण देकर कोई क्रांतिकारी नहीं हो जाता है! हमारी बाते कुछ भी नहीं कर सकती है उल्टा आज की पीढ़ी के दरम्यान अराजकता का निर्माण कर सकती है और हमारी कौम की प्रतिमा राष्ट्रीय स्तर पर ख़राब कर सकती है! किसी भी प्रयास को आजकल सरकार के द्वारा कुचल दिया जाता है! समाज को भड़काकर कोई नेता भी बन जाता है या सत्ता की मंझिल तक का सफ़र भी कर लेता है और बाद में समाज को भी भूल जाता है! हालात ख़राब होते है आम आदमी के! वह कही का नहीं रहता....! किसी भी उपद्रव का पहला शिकार होता है आम आदमी.....! समाज के झंडे तले अगर किसी मोर्चा का गठन भी होता है तो उसमे हमारा नुकसान ही नुकसान होता है! जातिगत विद्वेष की भावना झेलनी पड़ती है आम आदमी को ही! या सबसे पहले कानून का शिकंजा भी आम आदमी के गले में ही फसाया जाता है! किसी पार्टी या अपने समाज के नेता को केवल दोष देकर या फिर फिर नए संघटन बना -बना कर यह कार्य संभव नहीं होगा.......!


सबसे पहले हमारे लोगों के बिच एक अदम्य विश्वास का निर्माण करना होगा !जो विश्वास उन्हें कार्यरत रहने की प्रेरणा देगा.....भिकारी लोग झगड़ते है....निर्बल और कायर लोग कटोरा लेकर किसी से उम्मीद रखते है.......अगर हम खुद को शेर मानते है तो हमें एक दुसरे की सहायता कर .....अपनी निजी आदते बदलकर.......स्वयंपूर्ण होकर फिर से आदर्श विश्व का निर्माण करना होगा......व्यवस्था को बदलने से पहले हम खुद बदले.........इस दिशा में कदम रखने के लिए कई तरीके है जो समाज को कई बार बता चूका हु.....सिर्फ राजनीती या सत्ता ही हमारा लक्ष नहीं हो सकता....सत्ता के लिए धर्म की सहायता लेनेवाले भी सत्ता पर जाकर अपना धर्म भूल जाते है......सत्ता एक विष के सामान है.....जो कलि की तरह व्यक्ति को पद्भ्रष्ट भी कर देती है ! क्या अम्बानी ने झगड़ने की बाते की थी? या आरक्षण के लिए वह रस्ते पर उतरे थे? आज अम्बानी कई लाख लोगों के घर चलते है...! अम्बानी जैसी कई हस्तिया इस देश में हर जगह हर समाज में मौजूद है.....! हमारे सामने मारवाड़ी,सिन्धी और सिख समाज के अच्छे उदाहरण है जिन्होंने सामूहिक योगदान से अपने ही हर एक भाई की सहायता कर उसे खड़ा किया है!आज इस कौम के लोग हर क्षेत्र में प्रभावशाली है ! हमें उनसे प्रेरणा लेनी चाहिए! जो आमिर है वह अपनी ही मस्ती में और शान में खोया है उसे अपने ही भूके-प्यासे भाई की तड़प नहीं दिखती! जो नेता है उसे सिर्फ अपने ही चंद रिश्तेदारोंकी फ़िक्र है......उसकी नजर में तो समाज को मारो गोली....! कोई भाई इस दिशा में कदम भी रखता है तो समाज के ही कुछ स्वार्थी तत्व उसके अहित के लिए शक्ति लगते है! क्या हम उद्योग के विश्व का निर्माण कर अपने आर्थिक हालत पर हल नहीं निकल सकते है? क्या हम शिक्षा के आधुनिक शिखर को प्राप्त कर अपने भविष्य का निर्माण नहीं कर सकते है? क्या हम अपने ही निर्बल भाई का सहारा देकर उसमे फिर से स्वाभिमान से जीने की उम्मीद नहीं दे सकते है? संयुक्त कुटुंब व्यवस्था कई समस्यओंका हल है! आज वह व्यवस्था डूबने की कगार पर खड़ी है !!! हम अपने ही महान मुल्योंको भुलाने लगे है!पुना-मुंबई या दिल्ली-बेन्गालोरू की चकाचुन्ध में रहने वाले युवा आजकल अपने माँ-बाप तक को घर से बाहर निकालने लगे है....वो समाज की भलाई में क्या योगदान दे सकते है....? जो सिर्फ गाड़ी-बंगला-पार्टी और दौलत के पीछे भाग रहा हो राष्ट्र का निर्माण कैसे कर सकता है.......पैसा जरुर प्राप्त करो....लेकिन उसका विनियोग ऐसा करो की तुम्हारी आनेवाली पुश्ते उस धन-राशी का सदुपयोग करे....और न की दुरुपयोग.....! पैसा केवल साधन हो सकता है.......साध्य नहीं! जो लोग अपने आत्मविश्वास को खो बैठते है वे लोग नीड़ का निर्माण नहीं कर सकते है......जरुरी है की अपने समाज के खोये हुए आत्मविश्वास को जगाओ........फिर से भेदभाव भुलाकर उदार दिल से हमें फिर से एक ही मंच पर एक ही सूत्र में समाज को बाँधने के लिए एक होना होगा! आपसी सहयोग ....सामाजिक राशी....सामाजिक शक्तिकेंद्र का निर्माण करना होगा.....जो केंद्र अस्थिपंजर समाज को फिर से शक्तिशाली बननेकी उम्मीद देगा......और भविष्य के अंधकार में खोनेवाले हमारे भाई-बहनोंको फिर से प्रकाश की किरण दिखायेगा.....आनंद----उल्हास का निर्माण फिर से होगा! जब फेसबुक जैसे साधन हमारे पास है तो उसका विनियोग नफरत फ़ैलाने के लिए नहीं अपितु चेतना जगाने के लिए करो.....उम्मीद के निर्माण के लिए करो....एक दुसरे के मार्गदर्शन के लिए करो! ख्याल रहे की किसी की निंदा से हमारा भला नहीं हो सकता ........हम ही एक आशा की ऐसी किरण बने जिसकी रौशनी इस जगत में जगमगाए.....जो पथ-दर्शी बने जो अँधेरे को टटोल रही है!

आपका हितैषी: जयपालसिंह विक्रमसिंह गिरासे(शिरपुर)